डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक शोधपरक आलेख  – पंडवानी लोकगायन की विश्वविख्यात स्वर सम्राज्ञी: तीजनबाई।)

☆ आलेख – पंडवानी लोकगायन की विश्वविख्यात स्वर सम्राज्ञी: तीजनबाई ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

लोकगायन लोककला की आवाज़ है। यदि लोककला दीवारों पर दृष्टिगोचर होती है तो लोकगायन हवा में तैरता है और सीधे दिल में उतरता है। भारत के उत्तर प्रदेश,बिहार का विरहा, राजस्थान का मांड, बंगाल का बाउल, पूर्वी भारत का सोहर, बारहमासा और छत्तीसगढ का पंडवानी आदि प्रमुख लोकगायन के अन्तर्गत आते हैं। छत्तीसगढ की सांस्कृतिक पहचान के रूप में विकसित पंडवानी मूलत: महाभारत की कथाओं का लोकगायन है। इसमें कलाकार तंबूरा हाथ में लेकर कथा का गायन करता है और पात्रों के संवादों, युद्ध प्रसंगों तथा भावनात्मक घटनाओं का अभिनय भी करता चलता है। वेदमती और कपालिक पंडवानी गायन की दो प्रमुख शैलियाँ होती हैं। वेदमती शैली में कलाकार शान्त भाव से बैठकर प्रस्तुति करता है तथा कपालिक शैली में खड़े होकर अभिनय, संवाद, नाटकीयता के साथ ऊर्जावान प्रस्तुति की जाती है। लोकगायिका तीजनबाई ने पंडवानी की इसी कपालिक शैली को अभूतपूर्व ऊँचाइयाँ प्रदान की थीं। आपका जन्म 08 अगस्त 1956 ई० को छत्तीसगढ के दुर्ग जिले के गनियारी ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम हुनुकलाल पारथी और माता का नाम सुखवती देवी था। बचपन में आपको नाना ब्रजलाल पारथी से महाभारत की कहानियाँ सुनने का शौक पैदा हुआ और वे शीघ्र ही पंडवानी ( पाण्डव कथा ) की मुरीद हो गईं। तेरह वर्ष की उम्र में आपने पहली बार सार्वजनिक रूप से पंडवानी में प्रस्तुति दी, जिसकी दर्शकों ने सराहना तो की किन्तु समाज ने इसे स्वीकार नहीं किया। विरोधस्वरूप आपको सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ा लेकिन आपने हार नहीं मानी।

तीजनबाई की सोच थी कि यदि कला ईश्वर का वरदान है तो उसे समाज के डर से छोड़ा नहीं जा सकता। इसी आत्मविश्वास को लेकर आपने कम आयु में ही छोटे-छोटे गाँवों में प्रस्तुतियाँ देना प्रारम्भ कर दिया था। उनकी गायकी में बुलंद और प्रभावशाली स्वर, महाभारत के पात्रों का जीवंत अभिनय, सहज संवाद शैली, लोकभाषा का प्रभावी प्रयोग, भावानुकूल मुख मुद्राएँ, श्रोताओं से सीधा संवाद, तंबूरा का अभिनयात्मक प्रयोग आदि प्रमुख विशेषताएँ थीं। आप तंबूरा को कभी अर्जुन का गाण्डीव, कभी भीम की गदा, कभी दुर्योधन की तलवार तो कभी रथ का प्रतीक बना दिया करतीं थीं। आपकी कला में सहजता, मौलिकता, लोकजीवन की आत्मीयता, अभिनय की प्रखरता, गायन की अद्भुत शक्ति, कथावाचन की विलक्षण क्षमता दृष्टिगोचर होती थी। महाभारत के धार्मिक आख्यानों को आप मानव जीवन के संघर्ष, न्याय-अन्याय, धर्म, साहस, कर्तव्य और नैतिक मूल्यों की कथा के रूप में व्याख्यायित किया करतीं थीं। उनकी प्रस्तुति में भीम केवल बल का प्रतीक न होकर अन्याय प्रतिरोध का स्वर, अर्जुन केवल योद्धा नहीं, कर्तव्यनिष्ठ मनुष्य का प्रतीक, द्रोपदी नारी सम्मान और स्वाभिमान की प्रतिनिधि, कृष्ण नीति,विवेक और धर्म के मार्गदर्शक के रूप में उभरते हैं। इस प्रकार मनोरंजन के साथ-साथ पंडवानी में जीवन दर्शन भी प्रस्तुत किया। अपनी उत्कृष्ट प्रस्तुतियों के कारण ही तीजनबाई की ख्याति राज्य की सीमाओं से बाहर भी पहुँचने लगी। उनकी इस कला को पहचान दिलाने में अनेक सांस्कृतिक संस्थानों, संस्थाओं एवं विद्वानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शनै: शनै: राष्ट्रीय नाट्य समारोहों, संगीत महोत्सवों, लोककला उत्सवों, विश्वविद्यालयों में आकर्षण का केन्द्र बिन्दु बनने लगीं और एक दिन ऐसा आया जब आपने यूरोप, एशिया, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, रूस आदि के सांस्कृतिक समारोहों में प्रदर्शन करके यह प्रमाणित कर दिया कि लोककला भाषाओं की सीमा से परे होती है।

तीजनबाई को कला साधना के लिए 1988 ई०में पद्मश्री, 1995ई०में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2003 ई० में पद्मभूषण, 2018 ई० में फुकुओका प्राइज, 2019 ई० में पद्मविभूषण आदि अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया गया। छत्तीसगढी लोकभाषा को वैश्विक पहचान दिलाने में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। आज अनेक लोग पंडवानी पर शोधकार्य कर रहे हैं, नई पीढ़ी में लोकगायकी के प्रति रुचि उत्पन्न हो रही है, पंडवानी राष्ट्रीय संस्थानों तक पहुँच रही है, युवा कलाकारों को प्रशिक्षित किया जा रहा है, सांस्कृतिक आयोजनों में लोककला को प्रतिष्ठा मिल रही है। इसका एक बड़ा कारण आपकी प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ रहीं हैं। आपका जीवन भारतीय महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। आपने सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा सामाजिक बंधनों से बड़ी होती है। यदि महिलाएँ आत्मविश्वास और परिश्रम के साथ आगे बढ़ें तो वह विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना सकतीं हैं। लोककला, संघर्ष और साधना का पर्याय ‘ तीजनबाई ‘ आज हमारे मध्य नहीं हैं। यह महान कलाकारा 05 जुलाई 2026 ई० को रायपुर के एम्स अस्पताल में सत्तर वर्ष की आयु में हम सबको अलविदा कह गईं हैं लेकिन भारतीय लोक संस्कृति के इतिहास में  सशक्त संवाहिका, इस परम्परा की संरक्षिका के रूप में आप हमेशा ही अजर-अमर रहेंगी।

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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