आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – ग़ज़लिका – श्रमवीर।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८५ ☆
☆ ग़ज़लिका – श्रमवीर ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
☆
दिन भर ईंटें-माटी-गारा बिन बोले जो ढोता है।
चुप रह श्रम-सीकर में भीगे नहीं भाग्य को रोता है।।
.
उससे कोई क्या छीनेगा, नहीं जोड़ पाता जो कुछ।
रोज उगाता फसल काट खा, बेफिक्री से सोता है।।
.
कर्मवीर गीता को जीता कभी न पूजे-पढ़ता है।
रोटी-चटनी भोग लगाता, शांति न मन की खोता है।।
.
है वह पत्थर लगा नींव में उस पर बनते देवालय।
पुजे दूसरा पत्थर विग्रह बन जो निष्क्रिय होता है।।
.
सार्थक किसका जन्म सोचिए, जो सक्रिय या जो निष्क्रिय?
तैर रहा जो ऊपर ऊपर या जो खाता गोता है??
.
भाग्य भरोसे बैठे न सोचो होगा वह जो प्रभु चाहे।
कर्म प्रधान विश्व में कर्ता जो करता वह होता है।।
.
जीव वही संजीव सलिल सम, लगातार जो बहता है।
बूढ़ा बंदर खाय कुलाटी, टें-टें करता तोता है।।
☆
© आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
११.६.२०२६
संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,
चलभाष: ९४२५१८३२४४ ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





