डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ बस एक और… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“माँ, इस बार प्रमोशन मिल जाए, फिर मैं चैन से जीऊँगा,” रवि ने कहा।

एक साल बाद प्रमोशन मिल गया।

“अब क्या बात है?” माँ ने पूछा।

“बस अपना घर हो जाए, फिर कोई चिंता नहीं रहेगी।”

कुछ वर्षों बाद घर भी बन गया।

माँ ने फिर पूछा, “अब तो खुश हो?”

रवि बोला, “सोच रहा हूँ, थोड़ा बड़ा घर ले लूँ।”

माँ अलमारी से उसकी बचपन की तस्वीर निकाल लाई।

“याद है, तब तुम कहते थे—बस एक साइकिल मिल जाए, फिर कुछ नहीं चाहिए।”

रवि तस्वीर को देर तक देखता रहा।

माँ ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, चीज़ें बदलती रहीं, लेकिन तुम्हारा ‘बस एक और’ कभी नहीं बदला।”

रवि के पास कोई उत्तर नहीं था।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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