डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ आलेख ☆ प्यार से आगे भी एक जिंदगी है ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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“माँ, आपने मेरी शादी के लिए हाँ क्यों नहीं की?”
“क्योंकि मुझे तुम्हारी खुशी चाहिए, सिर्फ तुम्हारी जिद नहीं।”
“लेकिन मैं निखिल से प्यार करती हूँ।”
“जानती हूँ। पर क्या तुमने कभी यह सोचा है कि प्यार के बाद की जिंदगी कैसी होगी?”
“माँ, आप भी न! आजकल कौन इतनी बातें सोचता है? हम दोनों एक-दूसरे को समझते हैं।”
“मैं भी तुम्हारी उम्र में यही सोचती थी, अनन्या।”
“फिर?”
“तुम्हारे पिता और मैंने भी बहुत प्यार किया था। घंटों बातें होती थीं, एक-दूसरे के बिना रहने की कल्पना तक नहीं कर सकते थे। लेकिन शादी के बाद बातें कम और जिम्मेदारियाँ ज्यादा हो गईं।”
“तो क्या प्यार झूठा था?”
“नहीं। प्यार सच्चा था… शायद हमारी समझ अधूरी थी।”
“आप कहना क्या चाहती हैं?”
“बस इतना कि शादी से पहले यह मत देखना कि वह तुम्हें कितना चाहता है। यह भी देखना कि तुम्हारे ‘न’ कहने पर उसका व्यवहार कैसा होता है, तुम्हारी असहमति का वह कितना सम्मान करता है, तुम्हारे सपनों के लिए कितनी जगह रखता है।”
अनन्या कुछ देर चुप रही।
“माँ, अगर निखिल इन सब बातों में अच्छा निकला तो?”
माँ ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा-
“तब क्या तुम उससे सिर्फ इसलिए शादी करोगी कि वह तुम्हें प्यार करता है… या इसलिए भी कि उसके साथ तुम अपने आपको सुरक्षित, सम्मानित और स्वतंत्र महसूस करती हो?”
अनन्या ने कोई उत्तर नहीं दिया।
माँ भी चुप रहीं।
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© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





