🟢 शिक्षाविद्, लोक-विज्ञानी स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव 🟢☆ श्री प्रभातचंद श्रीवास्तव ☆
(1 सितम्बर 109वें जन्मोत्सव “बुन्देली दिवस” पर विशेष)
लोक विज्ञान के मूर्धन्य, आधिकारिक विद्वान डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव का अवतरण 1 सितम्बर 1916 को कटनी-कन्वारा-विजयराघवगढ़ मार्ग पर ग्राम पिपरहटा, जिला कटनी में एक सामान्य कृषक परिवार में हुआ। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा ग्रामीण परिवेश में हुई, पहले ग्राम कन्वारा में शिक्षा ली फिर साधूराम स्कूल, कटनी से मैट्रिक पास किया। कालांतर में आपने जबलपुर का रुख किया। उन्होंने अपनी जीविका एक स्कूल शिक्षक के रूप में हितकारिणी सभा से प्रारम्भ की और उत्तरोत्तर प्रगति करते हुए एम. ए. हिंदी नागपुर विश्वविद्यालय से मैरिट में स्थान बनाते हुए किया। हितकारिणी महाविद्यालय में क्रमशः शिक्षक, असिस्टेंट प्रोफेसर, रीडर, प्रोफेसर और महाविद्यालय के प्राचार्य के रूप में कार्य किया। आपने विश्वविद्यालय के अनेक शोधार्थियों के निर्देशक के रूप में भी कार्य किया।
सम्पूर्ण जीवन लोक साहित्य के लिए समर्पित रहे डॉ. श्रीवास्तव ने जबलपुर विश्वविद्यालय से “बुन्देली का भाषा विज्ञान और आलोचनात्मक अध्ययन” विषय पर शोध किया जो बुन्देली पर किया गया प्रथम शोध रहा। बुन्देली के शब्द भंडार का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन, शब्दों के स्रोत एवं शब्दकोष पर काम किया तथा पर्यावरण, पेड़-पौधों की पूजा आदि पर पांडित्यपूर्ण लेखन किया। विभिन्न विषयों पर आपके लेख देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित और आकाशवाणी व दूरदर्शन केंद्रों से प्रसारित होते रहे। आपने चेतन का बोध कराने वाली आत्मकथाएं जैसे तुलसी, सातवां मील, वर्षा मेघ, चिड़ियाँ, सठिया कुँआ आदि लिखीं जो अपनी जीवन कथा स्वयं कहते हैं। शिक्षण काल के दौरान उन्होंने सामान्य भू ज्ञान, प्राकृतिक भू ज्ञान, आर्थिक भू ज्ञान एवं सामाजिक अध्ययन पर छात्रोपयोगी पुस्तकें लिखीं जिनमें से कुछ का महाराष्ट्र के लिए मराठी में भी अनुवाद हुआ।
डॉ. श्रीवास्तव के बहुउपयोगी साहित्य सृजन और हिंदी-बुन्देली की मधुर सन्देश प्रधान कविताओं को देखते हुए अनेक साहित्यिक, सामाजिक संस्थाओं ने इनका नागरिक अभिनन्दन किया जिनमें प्रमुख हैं- मिलन, गुंजन कला सदन, सेठ गोविन्ददास आयोजन समिति, हमसी, रानी दुर्गावती बलिदान दिवस पर म. प्र. के तत्कालीन मुख्य मंत्री अर्जुन सिंह द्वारा संग्रामपुर में, म. प्र. आंचलिक साहित्यकार परिषद् द्वारा कटंगी में आदि।
डॉ. श्रीवास्तव के साहित्य में ग्राम्य जीवन का सजीव चित्रण है। उनकी जन्म स्थली ग्राम पिपरहटा उस समय पूर्णतः नदी-नालों और पहाड़ियों के वेष्टिक परिवेश वाला गांव था। उनकी एक लम्बी बुन्देली कविता “भौंरहा पीपर” में गांव का पीपल स्वयं अपनी और बदलते युग की कहानी सुनाता है-
मैं पीपर को बिरछ-
गांव में अब लौं एक खड़ो हों,
बहुत दिना भए बीरन सें-
अकबर सें तनक बड़ो हों।
बड़ी डारैयाँ लाखन कनखा, लाखन के लाख-लाख पत्ता,
गीधन के दो सौ आठ घोंचुआ,
डार-डार भौंरन छत्ता।
इतना ही नहीं डॉ. श्रीवास्तव की लेखनी गांव के तत्कालीन व्यक्तियों और परिस्थितियों का उल्लेख भी करती है-
अब तौ करिया चैतू कुम्हार है
ई खेरे को ठाकुर,
थानेदारन सें मिलजुर बो,
खाय-खबाय घी-गुर।
परमोला रतनसींग कारिंदा की
पांचउ अब घी में,
पंडा बाबा छिरिया लैकें,
नित जाओ करत पहरैं,
ढारैं महादेव मुरलीधर,
चौथे पहर सकारें।
जिरिया दाई मंहतैंन सयानी,
दांत घुरे से जी के,
मालगुजारन कक्को सबकी,
दएं गुदनहा टीके।
इसी प्रकार बैलों एवं बैलगाड़ी को संबोधित एक बुन्देली गीत में पर्यावरण परिवेश का वर्णन दृष्टव्य है- (इसमें बैलों को छैल-छबीले कहा गया है)
चले चलौ रे छैल-छबीले
थोड़ी और कसर है।
रपटा चढ़ें मुरें पूरब खों,
होय सड़क जा आड़ी,
पटपर-पथरा पै मचकै फिर
जजर-मजर जा गाड़ी।
खैर-करौंदा और मकुइया-
के जरवा दोई बगलें,
क्विइल तलैया बड़ी पुरानी,
बढ़ें पार पै लगलें।
आंगें तनक चलें फिर पर है
चित्तावर की मढ़िया,
बिजराघोगढ़ के राजा की
गिरी-परी सी गढ़िया।
“पीपर बारो गांव हमारो”, डॉ. श्रीवास्तव की एक लंबी कविता है जिसके प्रारम्भ में उन्होंने लिखा है-
पीपर बारो गांव हमारो
कुल तीनक सौ घर बारो
पिपरहटा कहाउत है
कभऊं उतै पीपरई- पीपर हते
अब पीपर-ईपर नैयां।
डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव ने 1950 के आसपास श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं “युगारम्भ” एवं “धरती” का संपादन भी किया। इनमें उन्होंने “पूर्णेन्दु” नाम से अनेक लेख और कविताएं लिखीं। वे एक अच्छे चित्रकार भी थे, उन्होंने अनेक पत्रिकाओं और पुस्तकों की लिए चित्र और रेखा चित्र बनाए। “देशबंधु और “स्वतंत्रमत” समाचार पत्रों में उन्होंने बुन्देली में वर्षों “अपनी बोली में अपनी बात” शीर्षक से एक कॉलम लिखा को काफी लोकप्रिय हुआ। “बुन्देली लोकायन में राम” में उनके सृजित पद अद्भुत हैं-
अकल-विकल हैं प्रान राम के,
बिन संगिनि बिन गुंइयां।
फिरैं नाँय सें माँय बिसूरत,
करैं झांवरी मुइयाँ।
पूँछत फिरैं सिंसुपा साल्हें,
बरसज साज बहेरा।
धवा सिहारू महुआ-कहुआ,
पाकर बाँस लमेरा।
डॉ. श्रीवास्तव ने बुन्देली में एक खंड काव्य “वीरांगना रानी दुर्गावती” का सृजन भी किया, जिस पर देश के सभी आकाशवाणी केंद्रों से लगभग 1 घंटे का संगीत रूपक प्रसारित किया गया। रानी दुर्गावती की वीरता का एक शब्द चित्र-
चली प्रलय सें जूझन रानी,
रन चण्डी अकुलाई।
गंग जमुन उत उठीं हिलोरें,
इत रेवा उमड़ाई।
“डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव लोकविज्ञान शोध संस्थान” द्वारा डॉ. श्रीवास्तव रचित पुस्तकों के द्वितीय/तृतीय संस्करणों के प्रकाशन भी किए जा रहे हैं। प्रति वर्ष 1 सितम्बर को स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव का जन्मोत्सव समारोह जबलपुर व आसपास के क्षेत्रों में “बुन्देली दिवस” के रूप में आयोजित किया जाता है। इस दिन देश के विविध क्षेत्रों के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वानों को सम्मानित किया जाता है। बुंदेलखंड के साहित्य, कला, संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम होते हैं। उन्हें सादर श्रद्धान्जलि।
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© श्री प्रभातचंद श्रीवास्तव
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





