श्री विजयानन्द विजय

☆ हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ बोलते चित्र… ☆ श्री विजयानन्द विजय ☆ 

” आपको याद है, वहाँ..उस कोने पर एक बड़ा-सा कार्टूूून लगा करता था। ” – अखबार के पन्ने पलटते हुए उसने दुकानदार से पूछा। 

मोतीझील चौक पर कपड़ों की वह सबसे बड़ी दुकान थी। पच्चीस-तीस साल बाद एक बार फिर इस शहर में आना हुआ, तो इस जगह आने से वह खुद को रोक नहीं पाया था। 

” हाँ, मगर वो तो पच्चीस-तीस साल पहले की बात है साहब। ” – दुकानदार ने उसकी ओर देखते हुए कहा।

” सही कहा। मैं उसी समय की बात कर रहा हूँ ।तब हम जिला स्कूल में पढ़ा करते थे। रविवार को शाम में जब हमें हॉस्टल से छुट्टी मिलती थी, तो हम सीधे यहाँ चले आते थे, बस उस कार्टून को देखने …। ” – स्कूली दिनों की उसकी स्मृतियाँँ सहसा ताजा हो आई थीं।

नजर सामने वाले चौक की ओर गयी। बाप रे ! कितनी भीड़ रहने लगी है अब यहाँ। ऊँचे-ऊँचे जगमगाते मॉल, बड़ी-बड़ी दुकानें और शोरूम्स की लंबी और अंतहीन श्रृंखला। आधुनिकीकरण की आँधी ने शहर के अधिकांश पुरातन अवशेषों को या तो मिटा दिया है, या नयेपन की चादर से ढँक लिया है।

” हाँ बिल्कुल। मुझे भी याद आ रहा है।” – दुकानदार ने बातचीत का क्रम जारी रखा।

” जानते हैं, हॉस्टल में पूरे हफ्ते हमारी चर्चा का एक विषय यह भी हुआ करता था कि इस हफ्ते कल्याणी चौक पर किस राजनीतिक और सामाजिक विषय पर कार्टून लगेगा। ” – दुकानदार से वह अब कुछ ज्यादा ही औपचारिक हो चला था और स्कूली दिनों की भूली-बिसरी यादों में खो गया था…।

” हम्म…! “

” बड़े सटीक, चुटीले और मारक होते थे वे कार्टून। “

” हाँ बिल्कुल। “

” अच्छा, क्या नाम था उस कार्टूनिस्ट का ? ” –  नाम उसे याद नहीं आ रहा था, इसलिए वह दुकानदार से पूछ बैठा।

” मथुरा जी नाम था उनका। वहाँ सामने पान की एक दुकान थी उनकी। उसी की छत पर वे कार्टून बनाकर लगाया करते थे। कमाल के कलाकार थे। कमाल का प्रेजेंस ऑफ माइंड था। मगर दुर्भाग्य है कि उनकी अगली पीढ़ी ने उनकी विरासत को नहीं सँभाला। वरना आज भी वहाँ….। ” –  बोलते-बोलते दुकानदार संजीदा हो गया और उधर ही देखने लगा, जहाँ कभी मथुरा जी के कार्टून लगा करते थे। 

वहाँ आज एक बड़ा-सा फ्लेक्स बोर्ड टँगा था, जिसमें रंग-बिरंगे डिजाइनर कपड़े पहने हुए लड़के और लड़कियों के मुस्कुराते चेहरे थे। लोगों की भूख और माँग अब पूरी तरह बदल चुकी थी।

 ” असल में, जो सच हमें नहीं दीखता या जो हम देखना नहीं चाहते, उसे हमारी आँखों में उँगली डालकर दिखाने का काम करते हैं ये कार्टून। ” – आज अखबार में छपे एक कार्टून की ओर देखते हुए उसने दुकानदार से कहा।

” सही कहा भाई साहब। मीडिया और अखबारों की हालत तो आप देख ही रहे हैं। ये अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं।आज हमें मथुरा जी और आर के लक्ष्मण जैसे लोगों की ही जरूरत है, जो आँखों में उँगली डालकर नहीं, बल्कि कान उमेठकर लोगों को सच दिखा सकें। ” – समाज के चौथे स्तंभ की भहराती स्थिति पर दुकानदार की चिंता स्वाभाविक थी।

” बिल्कुल, आज जरूरत है ऐसे लोगों की, जो हमारी सुन्न होती जा रही चेतना को जगा सकें। वैसे भी, जब शब्द अपना अर्थ और असर खोने लगें, तो कार्टूनों और चित्रों के सहारे एक पीढ़ी को मानसिक रूप से अपाहिज होने से तो बचाया ही जा सकता है। ” उसने कहा। 

उसकी नजरें अभी भी सामने वाली छत पर मथुरा जी के कार्टूनों को तलाश रही थीं..।

© श्री विजयानन्द विजय

आनंद निकेत बाजार समिति रोड पो. – गजाधरगंज बक्सर (बिहार) – 802103

मो. – 9934267166 ईमेल – vijayanandsingh62@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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