सुश्री श्रद्धा जलज घाटे
(साहित्यकार सुश्री श्रद्धा जलज घाटे जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. अल्प परिचय स्वरुप – आपने भारतीय स्टेट बैंक में 34 वर्ष सेवाएं देने के पश्चात स्वैच्छिक सेवानिवृति ली। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। साहित्य साधना सतत जारी। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम लघुकथा रिश्तों की आस।)
☆ लघुकथा – रिश्तों की आस ☆ सुश्री श्रद्धा जलज घाटे ☆
“मम्मी! नानी हाउस कब चलेंगे? अब तो राखी भी आने वाली है।”
“बेटा! नाना-नानी तो रहे नहीं। आप उसे अब मामा हाउस कहा करिए।”
इतना कहते ही मैं चार माह पहले की स्मृति में खो गई। माँ को दुनिया छोड़े अभी दो माह ही हुए थे, कि पिताजी भी हमें छोड़कर चले गए। भरा घर एकदम से सूना हो गया।
चलते समय भाभी ने बहुत अपनत्व से कहा कि “दीदी! ये माँ के सभी आभूषण हैं। जो मन करे लेते जाइएगा।”
“भाभी! मुझे तो बस ताउम्र पीहर की शीतल बयार चाहिए।’’ रुंधे गले से यह कहकर मैं माँ और पिताजी की एक सुंदर सी तस्वीर ले आई।
आज सुबह भाई का फोन आया। “प्रिया! ये मेरा और तुम्हारी भाभी का राखी पर बुलावा है। तुम्हारे आने की मैंने टिकिट्स करवा दी हैं।’’
स्नेह की पहली शीतल बयार से मन में बड़ा सुकून मिला।
तभी भाई आगे बोले- “इस बार दो-चार दिन रुककर जाना। कुछ पेपर्स, सर्टिफिकेट वग़ैरह हैं जिन पर तुम्हारे साइन होना हैं।’’
” ठीक है भाई।”
पर साइन की बात सुनकर मेरे हृदय को ज़ोर का धक्का लगा। मन कई प्रकार की आशंकाओं से घिर गया।
भाई आगे बोले- ‘’प्रिया! दरअसल माँ-पिताजी की स्मृति में मेधावी छात्रों के इनाम और कुछ प्रतियोगिताएं रखी हैं। सर्टिफिकेट माँ -पिताजी के नाम से ही रहेंगे, पर संस्था चाहती है कि “सौजन्य से” में मेरा भी नाम हो, पर मैं चाहता हूँ कि मेरे साथ तुम्हारा भी नाम हो।’’
“प्रिया! आखिर हम एक ही वृक्ष की दो टहनियां हैं। वे जितने मेरे थे उतने ही तुम्हारे भी थे।’’
” बस! अब जरा जल्दी से आ जाना। बच्चों को भी बुआ का इंतजार है।” कहते हुए भाई भावुक हो गए। उनकी बातें सुनकर मेरी आँखें भी भर आईं।
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© सुश्री श्रद्धा जलज घाटे
संपर्क – द्वारा डॉक्टर पदम घाटे, अरिहंत पैथोलॉजी लैब, वेदव्यास कॉलोनी रतलाम-457001 (म. प्र.)
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





बहुत अच्छी लघुकथा । श्रद्धा जी घाटे को हार्दिक बधाई एवं शुभ कामनाएँ