डॉ. रामेश्वरम तिवारी
ई-अभिव्यक्ति में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामेश्वरम तिवारी जी का स्वागत.
संक्षिप्त परिचय
- हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
- नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय लघुकथा पुनः मूषको भव।
☆ लघुकथा – पुनः मूषको भव ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
एक दिन बैठे-बिठाए सुबह सवेरे गौरीनंदन गणेश को न जाने क्या झख सूझी कि उन्होंने अपने वाहन मूषक की सेवा से प्रसन्न होकर, उसको मनुष्य होने का वरदान प्रदान कर, चंद दिनों के लिए मृत्युलोक की सैर करने के लिए भेज दिया।
मृत्युलोक में भ्रमण करते हुए मूषक महाशय आर्यावृत में स्थित अवंतिका के परम प्रतापी, लोकप्रिय, न्यायप्रिय सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी और महाकाल की पुण्य नगरी पहुँच गया। अपनी उदार मानवतावादी दृष्टिकोण और चारित्रिक विशेषता का निर्वहन करने वाले सम्राट को जब इस बात का पता चला कि मूषक उसके आराध्य शिव के प्रथम पूज्य विघ्न-विनाशक, लम्बोदर का वाहन है, तो उन्होंने उसको अपनी राज्य सभा में उच्चतम पद पर आसीन कर दिया।
मूषक को राज्य सभा में उच्चतम पद मिलते ही वह अपनी असली पहचान को भूलकर अपने आपको सर्वशक्तिमान प्रभु समझने लग गया। उसने पद की मान-मर्यादा और गरिमा को ताक पर रखकर माननीय न्यायालय और अन्य सभासदों के विरुद्ध अनर्गल आरोप लगाना, प्रलाप करना शुरू कर दिया। अपनी औक़ात को भूलकर देश के अशुभ चिंतकों के साथ मिलकर साज़िशों के ताने-बाने बुनने में लग गया। खुद सिंहासन बत्तीसी पर बैठने की दुरभिसंधि और जुगाड़ बिठाने लग गया।
रिद्धि और सिद्धि दाता का वाहन होने के कारण खुद को बुद्धिमान होने का गुमान हो गया। यानी पद का मद इस कदर उसके सिर पर चढ़ा कि कृपालु, दयालु सम्राट विक्रमादित्य को पदच्यूत करने के लिए दुश्मनों के हाथ की कठपुतली बनकर शकुनि की तरह चालें चलने लग गया।
सम्राट विक्रमादित्य थोड़े दिन तो मूषक महोदय की कारस्तानियों को चुपचाप नज़रअंदाज़ करते रहे, पर जब पानी सिर के ऊपर चढ़ने लगा, उसकी दिनों-दिन बेजा हरकतें बढ़ने लगीं, ख़ुफ़िया सूत्रों से उसकी कारगुज़ारियों की खबरें मिलने लगी, तो उन्होंने बगैर आगा-पीछे सोचे एक झटके में पद से त्याग-पत्र देने को मजबूर कर दिया। बेचारा मूषक जो कि खुद विक्रमादित्य के स्थान पर सम्राट बनने का ख्वाब पाले बैठा था, पर तब तक मूषक के मनुष्य बने रहने की अवधि ख़त्म हो चुकी थी। वह धड़ाम से सैंकड़ों किलोमीटर नीची अतल अँधेरी गहरी खाई में जा गिरा और तत्काल ‘’पुनः मूषको भव’’ की नियति को प्राप्त हो गया।
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© डॉ. रामेश्वरम तिवारी
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