डॉ. सीमा शाहजी
(डॉ. सीमा शाहजी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत. आप महारानी लक्ष्मीबाई कन्या महाविद्यालय इंदौर में सहायक प्राध्यापक अतिथि विद्वान हिंदी के पद पर कार्यरत हैं। रचना यात्रा – करीब डेढ़ दशक से विभिन्न विधाओं में लेखन एवम प्रकाशन।आकाशवाणी से प्रसारण ।कई संस्थाओं से सम्मानित। उल्लेखनीय- आदिवासी संस्कृति व इस संस्कृति में महिलाओं की स्थिति पर आपने व्यापक अध्ययन। भारत सरकार संस्कृति मंत्रालय द्वारा सीनियर फ़ैलोशिप (2016-17) हेतु चयनित. “21 वीं सदी और आदिवासी महिलाओं के विकास की ओर बढ़ते कदम- सन्दर्भ- झाबुआ जिला मप्र”)
लघुकथा – पर्यावरण की हितेषी – जुगनू… ☆ डॉ. सीमा शाहजी
मेरी प्रिय सहेली जुगनू. दूध सा गौरवर्ण. तराशे हुए नैन नक्श. अंडाकार मुख भंगिमा. सुराहीदार गर्दन. आकर्षण उड़ेलते नीले नीले नैन. सचमुच ही वो लावण्य से भरी पूरी थी. उसका विवाह स्थानीय था. मैं जब भी मायके जाती उससे मिलने जरुर जाती. मैंने जैसे ही उसके ड्राइंग रूम में कदम रखा. भव्यता सजावट बहुमूल्य थी. लेकिन मेरा ध्यान सोफे के नजदीक कोने में अटक गया. बैठक के कोने में एक बड़ा सा गोल पिंजरा रखा था. मैं पहले भी आई थी, तब मैंने ये पिंजरा नही देखा था.
जुगनू मेरे लिए स्पेशल चाय बनाने चली गयी. और मैं उस पिंजरे का मुआयना करने लगी. मैंने देखा चारों और जाली लगा पंछियों का नकली घर और उसमें देशी विदेशी तोतों का जमघट. कुल मिलाकर बीस तोते तो होंगे ही. जगह जगह छोटे छोटे पानी के सकोरे, मोटी मोटी लोहे की पट्टियां लगी थी. उन पर तोते अपनी भाषा में राम राम कर रहे थे. कुछ उड़ने का प्रयास कर जाली से टकराकर टकराकर थके जा रहे थे. कभी कोई छोटा तोता टूटे सकोरे पर बैठ कर लालमिर्च के टुकड़े कर आधा खाता आधा पिंजरें में गिरा देता. तो कोई तोता कुतर कुतर कर टाइम पास कर रहा था जैसे, अवश होकर फड़फड़ाना मेरी वेदना के विचलन को बढ़ा गया. चाय आ गयी थी. बेमन से मैंने चाय पी. मेरा ध्यान उन हरे हरे तोतों, उनकी लाल लाल चोंच और उनकी आजादी के बारे में ही केन्द्रित था.
आखिर मुझसे रहा नही गया. और मैंने पूछ ही लिया, “जुगनू तुम तो बड़ी सामजिक कार्यकर्ता हो. पर्यावरण, मानव, पशु पक्षी सभी की आजादी की हामीदार. शहर में कितने ही सकोरों में पानी भरकर पेड़ों पर पंछियों के लिए लगवाती हो गर्मी में. मेरे इतना कहने पर वो गर्व से बोली, ”देखों ! पेड़ पोधों, पशु पक्षी और दु:खी मानव की रक्षा सहायता करना तो मेरे जीवन का उद्देश्य है. मैंने कहा, फिर तुमने इन तोतों को क्यों कैद कर रखा है? अरे छोड़ों प्रभा, यह मुझे मेरे पति अनीश ने मेरे विवाह की वर्षगांठ पर दिया है. उन्हें ऐसे बंधन में बंधे फडफडाते हरे हरे तोते बहुत पसंद है. अब अगली वर्षगाँठ पर चिड़ियों का पिंजरा उपहार में देंगे. तू है ना, नाहक परेशान हो रही है. एक नौकर मैंने इन्ही के लिए रखा है. जो इन्हें नहलाता धुलाता, खाना खिलाता है. मैंने कहा, “ किसी की आजादी छिनना क्रूर कर्म है. अपराध के दायरे में आता है.
मेरी बात सुनकर वो चुप हो गई, मेरे विचार से तोतें के पिंजरे बनाम जुगनू के आलिशान घर के बंद दायरे समानांतर थे. जहाँ पिंजरें में पंछी कैद थे. वहीं जुगनू भी आजादी के दायरे में पति की बंधक ही तो थी. मुझे अपने सवाल का जवाब मिल गया था. पर्यावरण की हितेषी जुगनू के प्रति मोह भंग हो गया था.
थके कदमों से उसकी दहलीज पार की. मुझे लगा की दिखावटी पर्यावरण प्रेम की. . . . . कुंदक गुंजलक. . . . से मैं सुकून की आजाद जमीन पर खड़ी हूँ. जहाँ से मेरे घर का रास्ता सीधा है, सरल है. जहाँ पेड़ पोधों पर पंछी फुदकते है. आजादी के सरमाये में खुली साँस लेते है. चिड़ियों की ची. . ची. . तोतों की राम राम, भंवरों की गुनगुन और कबूतरों से की गुंटर गुं. . कितनी मिठास घोलकर हमें सुकून जिन्दादिली और आजादी से जीने का सबक देते रहते है. उन आजाद पंछियों की आजादी के लिए मैं जुगनू को यह कहने का साहस जरुर करूंगी. कि किसी पंछी को गुलाम बनाकर उसकी आह से वाह लुटने का ढोंग ना करें.
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© डॉ. सीमा शाहजी
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