श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – विद्या।)

☆ लघुकथा # ९८ – विद्या श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“तुम्हारा नाम क्या है?” गायत्री जी ने मुस्कुराते हुए कहा।

“दीदी हमें हमारा नाम नहीं पता, कोई काली कह देता है, कोई गुड़िया कह देता है, कोई मुनिया कह देता है, कोई कहता अरे ओ सुन, लेकिन दीदी ज्यादातर लोग कामवाली बाई कहते हैं।”

“ठीक है, ठीक है, ज्यादा बातें मत कर, सीधे काम पर लग जाओ, जल्दी से मुझे रोटी सब्जी बना दो। रसोई में राजमा भीगा पड़ा है, दोपहर में चावल बना लेना। राजमा रोटी मुझे दे दो, बच्चे स्कूल से आएंगे उन्हें खाना खिला देना। रोज के काम की लिस्ट मैं सामने टेबल पर रख चली जाऊंगी पढ़ी-लिखी हो ना।”

“जी दीदी वैसे पांचवी क्लास तक पढ़ी हूं। थोड़ा-थोड़ा जोड़ के अक्षरों को पढ़ लेती हूं आप चिंता मत करो मैं खाना अच्छा बनाती हूं। आपके यहां जो पहले काम करती थी झुमरी वह मेरी मौसी है उसी से मैंने सारा घर का काम खाना बनाना सीखा है, आप किसी बात की चिंता मत करो।”

“मेरे घर से जाते ही तुम अकेली घर में रहोगी ध्यान रखना कोई भी आए दरवाजा मत खोलना। बगल में शर्मा जी का नौकर बहुत तेज है वह जरूर आएगा। ज्यादा किसी से बात मत करना दोपहर में बच्चे आएंगे उन्हें खाना खिला देना शाम को मैं आऊंगी तब तुम्हें घर जाने की छुट्टी मिलेगी। अभी शुरू में तुम्हें ₹5000 दूंगी। काम देखूंगी, फिर पैसे बढ़ाऊंगी।”

“दीदी, स्कूल के बहार तो बहुत भीड़ लगी थी। सब लोग वोट डालने गए हैं क्या आप वोट नहीं डालते?”

“मैं ऑफिस से आते हुए वोट डालते हुए आऊंगी। चलो कोई बात नहीं मैं भी तुम्हारा वोटर आईडी बनवा दूंगी और धीरे-धीरे सारी चीज सिखा दूंगी।”

“दीदी एक बात तो सुनो  हमारे मोहल्ले में कुछ लोग आते हैं। वह हमें बड़ी सी गाड़ी में भरकर ले जाते हैं एक पर्चा देते हैं उसमें बहुत सारे चित्र बने रहते हैं, हमें एक चित्र की ओर इशारा कर देते हैं, हम उस पर ठप्पा लगा देते हैं और हमें पैसे भी मिलते हैं, दीदी साड़ी और रुपया मिलता है। खाना भी बन रहा है मैंने अपने आदमी से कहा कि शाम को घर लेते आना खाने को।”

“कोई बात नहीं अब तुम हमारे यहां काम करने लग गई हो धीरे-धीरे तुझे मैं पढ़ना लिखना और बातें सिखा दूंगी अभी मुझे ऑफिस जाने दें।”

“मैं रविवार को एक बस्ती में गरीब  महिला और बच्चों को पढ़ाने जाती हूं। तुझे भी साथ लिए चलूंगी। तब तो किसी भी कागज में क्या लिखा है खुद पढ़कर समझ सको। अब से तुम्हारा नाम विद्या और अपने विद्या नाम को सफल कर सकोगी। शाम को बढ़िया खाना बना कर रखना।”

मुस्कुराते हुए गायत्री जी अपने कर को स्टार्ट करके ऑफिस चली जाती हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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