डॉ. रामेश्वरम तिवारी
संक्षिप्त परिचय
- हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
- नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बाइज़्ज़त…!
☆ लघुकथा बाइज़्ज़त…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
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पागल पाशा दिन-दहाड़े दोपहरी के समय सर पर पाँव रखकर सड़क पर बेतहाशा भागा जा रहा था और साथ में अपनी बुलंद आवाज़ में ज़ोर-शोर से चिल्ला रहा था… ‘चल गई… चल गई…! चल गई…!’
जिसको सुनकर बाजार की दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिरने लगे। सड़कों पर वाहनों की आवाजाही पर ब्रेक लग गए। आबादी के विस्फोट से लावे की तरह फैलते शहर में अचानक सन्नाटा छा गया।
देश के किसी जागरूक नागरिक ने अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुए पुलिस स्टेशन को मोबाइल लगा दिया। सुना है, शहर में चल गई है… आधी-अधूरी सूचना पर पुलिस की गाड़ियाँ सड़कों पर दौड़ने लगी, सायरन बजने लगे, पर किसी भी व्यक्ति ने यह जानने की जरा भी ज़हमत उठाई, न कोशिश की, कि कहाँ और क्या चल गई है…!
पुलिस की बड़ी देर तक चली खोज-बीन और भाग-दौड़ के बाद आखिरकार पाशा पकड़ा गया। उसे पूछताछ के लिए कोतवाली लाया गया। थानेदार के पूछने पर उसने बताया कि कल उसे चलन से बाहर हो चुके चंद अठन्नी के सिक्कों से भरी थैली नाली में पड़ी मिल गई थी जिसे लेकर उसने बॉर से एक पव्वा खरीदा। बगल वाली होटल में बैठकर पीया और साथ में भर पेट बिरयानी खाई। उसके बाद उसे ऐसा नशा चढ़ा कि उसके मुँह से इतना भर निकला… चल गई… चल गई…, लेकिन शहर के दहशतज़दा लोगों ने समझ लिया… गोली चल गई…!
दूसरे दिन शहर की शाँति भंग करने के जुर्म में पुलिस ने पागल पाशा को न्यायाधीश के समक्ष पेश किया। न्यायाधीश ने भूखे पाशा की मनोदशा को ध्यान में रखते हुए सरकार को आदेश दिया कि देश में जितने भी भूखे, नंगे, बेघर हैं उनके लिए खाने, पहनने और रहने का बंदोबस्त किया जाए और पाशा को बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया। अदालत से बाहर निकलते हुए, पाशा रहमान का शेर-
‘’वो जो एक पागल है कहते हैं जिसे पाशा,
गुल-रुख़ों की सोहबत में और भी सनकता है।’’
गुनगुनाते हुए हवा में विलुप्त हो गया।
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© डॉ. रामेश्वरम तिवारी
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