श्री ओमप्रकाश पाण्डेय
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त. सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “प्रतिकार“.)
☆ कथा कहानी ☆ प्रतिकार — ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆
सुजाता कक्षा नौ की छात्रा थी. गाँव के आसपास केवल लड़कियों के लिए कोई स्कूल नहीं होने के कारण , वह जनता इन्टर कालेज, पथरवा में पढ़ती थी. यह स्कूल लड़के – लड़कियों सबके लिए था और सुजाता की तरह बहुत सी लड़कियां भी विभिन्न कक्षाओं में पढ़ती थी. लड़कों की संख्या लड़कियों से काफी अधिक थी, लेकिन डरने जैसी कोई बात थी नहीं और पढ़ाई भी स्कूल में ठीक होता था. सुजाता के साथ उसकी सहेली आरती, जो कक्षा दस में पढ़ती थी, उसके साथ ही गाँव से आती थी. दोनों खेतों के बीच बने पगडंडियों, छोटे रास्तों से आती थी. यह उनकी नित्य की दिनचर्या थी. रास्ते में कुछ अन्य गाँवों से भी छात्र – छात्राऐं मिलते जाते.
जाते समय सभी के बीच सामान्य पढ़ाई वा अन्य सामान्य बातें लगातार होती रहती थीं. कभी- कभी वे रास्ते में किसी खेत से गन्ना तोड़ कर चूस लिया करते थे अथवा लौटते समय अगर समय है, तो कोई खेल भी खेल लिया करते थे . यह उनकी रोज की दिनचर्या थी. स्कूल में पढ़ाई भी अन्य स्कूलों की तुलना में काफी अच्छी थी. स्कूल में प्रधानाचार्य छात्रों के अनुशासन पर बहुत ही ध्यान रखते थे, इसलिए छात्र भी ढ़ंग से रहते थे. सुजाता का भी स्कूल का दैनिक कार्यक्रम सामान्य गति से चल रहा था और वह मन लगा कर पढ़ाई करती थी.
इधर कुछ दिनों पहले उसके गाँव के ही राम अधार जी, जो बाहर नौकरी करते थे, सेवानिवृत्त होने के बाद गाँव में आ कर रहने लगे. उनका बहुत दिनों से गाँव से कोई खास समबन्ध नहीं था, केवल किसी के शादी- व्याह, या इसी प्रकार के किसी अवसर पर वे आते थे. उनके पास खेती काफी थी, जो उनके आदमी किया करते थे. वे भी बीच – बीच में आ कर खेती का काम देख लिया करते थे. उनका गाँव में बड़ा सम्मान था. लेकिन उनके लड़के- लड़कियों, या परिवार के अन्य सदस्यों के बारे में गाँव वालों को कोई खास जानकारी नहीं थी, क्योंकि पूरा परिवार एक साथ बहुत कम ही आता था. राम अधार जी सामान्यतः अपनी पत्नी जानकी के साथ ही आते थे और वह भी बहुत ही थोड़े समय के लिए आते. राम अधार जी अल्प, लेकिन मृदुभाषी थे.
उनके सभी बेटा- बेटी, बड़े हो चुके थे और उनकी शादियां हो चुकी थी. बेटे सब विभिन्न शहरों में नौकरी करते थे, इसलिए उनके साथ कोई बेटा नहीं आया, केवल पत्नी जानकी और उनका एक नाती संजय, उनके साथ गाँव आया और यही तीन लोग राम अधार जी के घर में रहते थे. संजय शहर छोड़ कर गाँव क्यों रहने आया, फिर अपने माता – पिता को छोड़ कर नाना- नानी के साथ क्यों रह रहा है, इसका कोई निश्चित कारण किसी को नहीं पता था, लेकिन गाँव का माहौल, जितनी मुंह उतनी बातें. कोई कहता कि इसका अपने माँ- बाप से पटता नहीं, इसलिए नाना – नानी के पास रहता है. नाना- नानी के यहाँ रहने से यह और बिगड़ गया है, इत्यादि.
चूंकि राम अधार जी का घर सुजाता के घर के पास ही था तो संजय के बारे यह सारी बातें, सुजाता के कानों में भी पड़ती थी, परन्तु वह इन बातों पर न तो ध्यान देती और न तो कुछ सोचती. अचानक सुजाता ने एक दिन संजय को अपने स्कूल में देखा तो वह चौंक गयी. चूंकि संजय ने कभी सुजाता को देखा नहीं था तो उसने ध्यान नहीं दिया. कुछ दिनों बाद सुजाता को पता लगा कि संजय का उसी के स्कूल में ग्यारहवीं कक्षा में प्रवेश मिला है. एक दिन रास्ते में संजय को उसने देखा भी और संजय की निगाह भी उस पर गयी. कुछ दिनों बाद संजय ने सुजाता को गाँव में भी देखा.
संजय गाँव से स्कूल अपनी सायकिल से आता – जाता था, और आते- जाते समय जोर- जोर से फिल्मी गाने गाता रहता था. पहले लड़के – लड़कियों ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन बाद में सबको बहुत ही खराब लगने लगा . एक दिन सुजाता ने कह ही दिया कि अगर हमेशा गाना गाना इतना ही जरुरी है तो धीरे- धीरे गाओ, सबको क्यों परेशान करते हो ? संजय ने कोई जबाब तो नहीं दिया लेकिन उसके चेहरे के भाव से लगा कि उसे सुजाता की सलाह अच्छी नहीं लगी.
इधर संजय , जिसे इतना तो पता था कि यह लड़की मेरे नाना के घर के आसपास ही कहीं रहती है, और उम्र में मुझसे छोटी है . उसने सोचा कि इसकी इतनी हिम्मत कैसे हुई कि मुझे अन्य लड़कियों के सामने कुछ कहे. संजय, माँ बाप का इकलौता बेटा था, नाना- नानी का दुलारा था और उसे घर में कोई समझाता अथवा डांटता नहीं था. उसे अपने मन का करना ही अच्छा लगता था तथा उसका चरित्र भी कुछ ठीक नहीं था. उसने सुजाता के इस बात को मन में रख लिया. वह सुजाता को सबक सिखाने के लिए अवसर खोज रहा था.
एक दिन सुजाता को घर से स्कूल के लिए निकलने में देर हो गई और उसके साथ जाने वाले लड़के- लड़कियां जा चुके थे उस दिन सुजाता अकेले ही स्कूल जा रही थी. रोज उसी रास्ते वह स्कूल जाती थी, जाने पहचाने रास्ते,खेत, खलिहान व पगडंडियाॅं थी और वह अनेकों बार स्कूल अकेले गयी थी और आयी भी थी. कभी- कभी देर तक पढ़ाई होने के कारण अंधेरे में भी उसे आना पड़ता था. इस कारण उसके मन में भय जैसी कोई बात नहीं थी. वह जानी- पहचानी पगडंडियों पर चली जा रही थी. चारो ओर गन्ना का हरा भरा खेत था, कई खेतों में गेहूँ की पौधे लहरा रहे थे, सरसों की पीली फूलों से खेत रगें थे. सुजाता जल्दी स्कूल पहुँचने की धुन में चली जा रही थी. इतने में पीछे से संजय सायकिल से आ गया और पास आते ही बोला, अपने को तुम क्या समझती हो, मैं चाहे जो कुछ भी करुं, तुम कहने वाली कौन होती हो?
संजय के अचानक आ जाने और इस प्रकार से पिछले घटना के बारे में इस ढंग से बात करना सुजाता को अच्छा नहीं लगा. सुजाता रुक गई और उससे बोली कि तुम्हें जो करना है, वह करो, लेकिन अगर मेरे सामने किया तो ठीक नहीं होगा, मैं मना करुंगी. अभी रास्ते से हटो, स्कूल की देरी हो रही है. संजय ने कहा कि अभी तो ठीक है, लेकिन तुमसे एक दिन इसका बदला मै तो लेकर रहूँगा. सुजाता ने कहा कि जो करना होगा, कर लेना, अभी रास्ते से हटो! और सुजाता तेजी से चलते हुए स्कूल चली गई.
इस घटना का जिक्र उसने किसी से भी नहीं किया और वह भूल गयी. इस घटना को हुए एक सप्ताह बीता था, सुजाता अपनी अन्य सहेलियों के साथ स्कूल जा रही थी. अचानक संजय पीछे से आया और सुजाता को धक्का मार कर आगे तेजी से निकल गया. सुजाता जब तक संभले- संभले, तब तक संजय काफी आगे निकल चुका था. सहेलियों ने कहा कि रहने दो हो सकता है उसको जल्दी रही हो, इस कारण धक्का लग गया हो. लेकिन सुजाता के मन में यह लग गया कि इसने उस समय जो धमकी दी थी, यह उसी कारण हो सकता है. इसके बाद, इस प्रकार की घटना सुजाता के साथ कई बार हुई. एक बार हद्द तब हो गयी, जब संजय ने सुजाता को अकेले पा कर, न केवल उसे धक्का दिया वरन् उसका दुपट्टा भी खींच कर ले गया और कुछ दूर जा कर दुपट्टा फेंक दिया.
सुजाता को अब लगा कि यह तो बहुत ज्यादा हो गया है, उसे इसका प्रतिकार करना ही होगा. उसके मन में एक बार विचार आया कि वह अपने घर पर बाबूजी को बताये. फिर समझ में आया कि कहीं बाबूजी पढ़ाई छोड़ा न दें. फिर आया कि बाबूजी इसके नाना से शिकायत करेंगे, तो नाना की बात या डांट , यह उद्दंड संजय कितना मानेगा कि नहीं मानेगा, ऐसे अनेकों विचार सुजाता के मन में चलने लगा . अन्त में सुजाता ने सोचा कि यह समस्या तो मेरी है, मुझे स्वयं ही इसका समाधान निकालना होगा. क्योंकि आज संजय है, कल कोई दूसरा हो सकता है, और मुझे तो रोज घर से बाहर निकलना ही है, स्कूल आना ही है. सुजाता ने मन ही मन एक निश्चय कर लिया.
इसके बाद सुजाता रोज जानबूझ कर स्कूल के लिए थोड़ी देर से निकलने लगी कि वह स्कूल जाते समय अकेले ही रहे . एक दिन वह अकेले ही खेत के बीच के रास्ते से जा रही थी. एक तरफ गन्ने का खेत था तो दूसरी तरफ गेहूँ की खेती थी. दूर कहीं पर गन्ने के रस को कढ़ाई में ,गुड़ बनाने के लिए खौलाया जा रहा था,उसकी सोंधी- सोंधी खुशबू आ रही थी. सुजाता स्कूल जा रही थी और जाते – जाते इस बात का भी ध्यान रख रही थी कि संजय पीछे आ रहा है या नहीं. उसे संजय पीछे से आता हुआ दिखाई पड़ गया. संजय जैसे ही उसके बगल में आया, सुजाता ने उसकी सायकिल को जोड़ से पैर से धक्का दिया. संजय सायकिल सहित गेहूँ की खेत में गिरा. सायकिल छटक कर एक तरफ गिरा और संजय गेहूँ की खेत में. खेत में थोड़ी पानी होने के कारण कीचड़ हो गया था. संजय कीचड़ में बुरी तरह धंस गया. सुजाता ने उसकी सायकिल उठाई और उसके ऊपर फेंक दिया और फिर सायकिल पर चढ़कर सुजाता बोली कि लड़कियों को छेड़ने में बड़ा मजा आता है, अब तुम्हें मैं बताती हूँ. सुजाता ने बगल के गन्ने के खेत से गन्ना उखाड़ा और संजय को मारना शुरू कर दिया. संजय का पैर और पूरा शरीर, चूंकि कीचड़ में फंसा था , उसे उठने में थोड़ी परेशानी हो रही थी, लेकिन वह अपना बचाव कर रहा था, लेकिन सुजाता को गाली भी देता जा रहा था. शोर सुन कर आसपास खेतों में काम करने वाले किसान और अन्य लोग एकत्रित हो गये. लोगों ने कहा कि क्यों लड़ रहे हो, स्कूल जाओ.
सुजाता ने कहा कि आज मैं इसे नहीं छोडूँगी, बहुत परेशान करता है. खैर किसी प्रकार से लोगों ने दोनों को छुड़ाया. सुजाता तो स्कूल चली गई, लेकिन संजय कपड़े गन्दे हो जाने के कारण, वापस घर लौट गया. संजय के नाना राम अधार ने पूछा कि स्कूल क्यों नहीं गए और यह कपड़े पर कीचड़ कैसे लगा है, संजय ने एक झूठी कहानी बना कर उन्हें सुना दिया. लेकिन गाँव का मामला, सब एक- दूसरे को थोड़ा बहुत तो जानते पहचानते ही थे, शाम ढलते- ढलते गाँव भर में सुबह स्कूल के रास्ते में हुई घटना की जानकारी पूरे गाँव को हो गई. सुजाता के घर वालों ने विशेषकर उसके पिता, पृथ्वी सिंह जी ने सुजाता से कहा कि मुझे क्यों नहीं बताया? उसका हाथ- पैर तोड़ देता . सुजाता ने कहा बाबूजी समस्या मेरी थी, तो उसका मुझे ही समाधान करना था, आप मेरे साथ कहाँ – कहाँ जाते और मेरी रक्षा करते!
इधर राम अधार जी को जब इस घटना की पूरी जानकारी हुई तो वह पृथ्वी सिंह जी के पास आये और सुजाता से अपने संजय के व्यवहार के लिए माफी मांगी और कहा सुजाता तुम मेरी बेटी जैसी नहीं, बल्कि मेरी बेटी ही हो . दूसरे दिन राम अधार बाबू ने संजय को यह कह कर कि वह उनके साथ गाँव में रहने लायक नहीं है, उसे उसके घर वापस भेज दिया.
© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय
19.12.2025
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




अत्यंत प्रभावी चित्रण। कहानी का सहज प्रवाह आकर्षक है। यह रचना हिंदी साहित्य की किसी भी अच्छी रचना के समकक्ष रखी जा सकती है। साधुवाद!🙏