डॉ. रीटा अरोड़ा
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघु कथा ☆ आख़िरी टाँका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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“मौसी, उँगली में फिर सुई चुभ गई?” राधा ने हँसते हुए पूछा।
अंजू ने उँगली से खून की बूँद पोंछी और मुस्करा दी, “अरे… इसकी आदत है।”
“इतने सालों से सिलाई कर रही हो, अब भी चुभ जाती है?”
“सुई से ज़्यादा ज़िंदगी चुभती है, बिटिया।”
राधा चुप हो गई।
कुछ देर बाद उसने कमरे में टँगे दर्जनों नए सूट देखे और फिर अंजू की फीकी, कई जगह से रफू की हुई साड़ी पर नज़र टिक गई।
“मौसी… अपने लिए कब सिलोगी?”
अंजू ने मशीन का पहिया फिर घुमा दिया।
“पहले यह ऑर्डर पूरा कर लूँ…”
खट… खट… खट…
कमरे में फिर वही आवाज़ गूँजने लगी।
राधा दरवाज़े पर खड़ी रही।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि मौसी कपड़े सिल रही थीं…
या अपनी पूरी ज़िंदगी।
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© डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





