श्री दीपक तिवारी ‘दिव्य’

सच, झूठ और जिंदगी 

(श्री दीपक तिवारी ‘दिव्य’ जी की जीवन के सच और झूठ को उजागर करती एक कविता।)
मुझे सच्चाई का शौक नहीं
खुदा का खौफ नहीं
झूठ की दुकान सजाता हूं
झूठ लिखता हूं
झूठ पढ़ता हूं
झूठ ओढ़ता हूं
झूठ बिछाता हूं
तभी सर उठाकर चल पाता हूं
इस दुनिया में
जो सच्चाई का दंश झेलते हैं
ना जाने कैसे वह जीते हैं
जहां झूठी तोहमतें हैं
आरोप भी झूठे हैं
पर इनके बल पर
मिलने वाली जिल्लतें
सच्ची होती हैं
इसके दम पर मिलने वाली
सजा सच्ची होती है।
वही उनका पारिश्रमिक है
यहां तक कि सत्य से मिलने वाला अंदर का सुकून भी
तब कचोटने लगता है
जब बाहर के हालात बद से बदतर
और भी भयावह होते चले जाते हैं और मैं कुछ नहीं कर पाता
इसलिए
मैं
झूठ भेजता हूं
लोग खरीदते हैं
और मैं जीता हूं
यही तरीका सिखाया है
मुझे
इस दुनिया ने
जिंदगी जीने का……
© श्री दीपक तिवारी ‘दिव्य’

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2 Comments
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Yogesh Kumar malviya
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सच्चाई को बयान करती कविता। बहुत ही सरल एवं खूबसूरत।

नीरज दुबे
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बहुत बढ़िया