सुश्री मंजिरी “निधि”
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं।
आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘सावन ‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # २१ ☆
कविता – सावन – ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
(मदिरा सवैया)
दृश्य मनोरम निर्झर वाहत सुंदर शैलज सावन है l
मोहित वृक्ष धरा अति शोभित गंध उड़े अति पावन है ll
खेल निमग्न दिखे सब बालक दंगल शोर लुभावन है l
रंग हरा बिखरे वसुधा पर बारिश का अभिनंदन है ll
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सावन घोर घटा धन देखत बज्र गिरे चमके बिजुरी l
साँझ ढली तब गुंजन मोहक, कोयल मोर कपोल डरी ll
भीग रही अवनी सुख पाकर पापन आज बिसार खरी l
झूम रहे सब वृक्ष यहां पर मोहक रूप निखार भरी ll
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सावन मास चलो सखियां वन शीतल मंद बयार चले l
कूक रही अब कोयल श्यामल डार हरेक पसार चले ll
घोर घटा घनघोर घिरे तब, बारिश बूंद सँवार चले l
वो वन फूल सुगंध लिये अब, मोहक रूप निखार चले ll
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© सुश्री मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






