श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे
कविता
☆ ज़िम्मेदारियाँ… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆
☆
दोस्त ने कहा
इक कविता सुनाओ
मैने कहा
याद नही
रुक जाओ
मोबाईल से पुछता हूँ
उसे सब याद रहता है
मैने मोबाईल निकालकर
मोबाईल के गाल पर
कुछ उंगलियां
आहिस्ता फेर दी
कुछ पल में
उसने मेरी पुरी कविता
मेरे सामने ला के रखी
मै समझ नहीं पाया
बुद्धिमान मै हूँ
या वो है
पहले मै
सबकुछ याद रखता था
जबसे वो
मेरे साथ आया है
मै अपनी ज़िम्मेदारियाँ
भूलने लगा हूँ
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© अशोक श्रीपाद भांबुरे
धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.
मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈





