सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  सीता।)

? कविता – सीता ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

(कुंडलिया)

?

-1-

सीता की पाते कृपा, जो लेते श्री नाम l

राम प्रिया हैं जानकी, जपलो सीता राम ll

जपलो सीता राम, यही  त्रैलोक्य स्वामिनी l

करते अर्पण प्राण, कहे हैं जगत भामिनी ll

कहे मंजिरी आज, तरेगी भव से नैया l

दया सिंधु श्री राम, खिवैया सीता मैयाll

-2-

सीता मैया सह चली,मर्यादा श्री राम l

मर्यादाओं को निभा, बहुत कठिन था काम ll

बहुत कठिन था काम, पति के पीछे चलतीं l

सहती कंटक राह, घटाएँ घिरती रहतीं ll

कहे मंजिरी आज, बनी थीं वो खेवैया l

लक्ष्मी का अवतार, वही थीं सीता मैया ll

-3-

धरती से उत्पन्न थीं, जनक बनी अभिमान l

जीवन भर दुख ही सहा, अंत हुआ अपमान ll

अंत हुआ अपमान, अवध शर्मिंदा होगी l

सीता को कर याद, आज भी निंदा होगी ll

कहे मंजिरी आज, जोश सीता जी भरती l

अनुपम प्रेम मिसाल, मातु ये निकली धरती ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments