श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – इक  दिन  सबको  ही जाना है आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०२ ☆

गीत – इक  दिन  सबको  ही जाना है☆ श्री संतोष नेमा ☆

इक  दिन  सबको  ही जाना है |

द्वार   मृत्यु   के  ही  आना  है ||

साथ  सदा   यह  देह  न  देगी |

मिट्टी  में  सब   मिल  जाना है ||

*

चार   दिनों का जीवन फ़ानी |

करी   खूब   सबने   मनमानी ||

चला  जोर ना यहाँ किसी का |

द्वार   ईश   के   भरते   पानी ||

जीवन  मिथ्या  मृत्यु  सत्य  है |

गीत   सदा   ही  यह  गाना  है ||

इक  दिन  सबको  ही जाना है |

*

सबने   स्वयं   अहम   हैं  पाले |

लालच   ईर्ष्या   के    रखवाले ||

रखें  होड़ बस  इक   दूजे   से |

भूल   गए  सच   ये   मतवाले ||

इन्हें    कौन   समझाए   भाई |

झूठा   सब   ताना – बाना   है  ||

इक  दिन  सबको  ही जाना है |

*

ईश्वर      ने     इंसान    बनाया |

हमने    ईश्वर   को    बिसराया ||

भेदभाव    की  खोद   खाइयाँ|

मानवता   का   खून    बहाया||

जाति – धर्म  में  बँटकर  हमने |

नहीं  स्वयं   को   पहचाना   है ||

इक  दिन  सबको  ही  जाना है |

*

परमेश्वर    के   अंश    हमी  हैं |

दूर   दृष्टि   की   सिर्फ  कमी हैं ||

इष्ट  कृपा  को   कभी  न   भूलें |

जिसके कारण  साँस   थमी  हैं ||

शुभ  ‘संतोष’  यही  जीवन  का |

ध्येय    सुपावन   अपनाना    है |

इक  दिन  सबको  ही  जाना  है |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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