प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे
☆ आज की विभिषिका ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆
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चलें मिसाइल ध्वंस है, बम की है भरमार।
जानें कैसा हो गया, अब तो यह संसार।।
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आग लगी धनहानि है, बरबादी का दौर।
घातक सबके मन हुए, नहीं शांति पर गौर।।
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अहंकार में विश्व है, भाईचारा लुप्त।
दिन पर दिन होने लगा, नेहभाव सब सुप्त।।
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अमरीका इजरायला , और आज ईरान।
नहीं नियंत्रित आज ये, धारें मिथ्या मान।।
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मध्य-पूर्व में आग है, जीना हुआ मुहाल।
जानें क्योंकर विश्व में, होता रोज़ बवाल।।
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घातक सबके मन हुए, ख़ूनी हैं अंदाज़।
कपटी सब ही लग रहे, आवेशित आवाज़।।
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रोक नहीं सकता इन्हें, सारे धारें क्रोध।
नहीं आज इनको रहा, मानवता का बोध।।
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हिंसा से मिलता नहीं, कुछ भी जग में सोच।
धन-जन की बर्बादियां, करुणा के पग मोच।।
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© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे
प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661
(मो.9425484382)
ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




