श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – नाव का धर्म।)

☆ हेमंत साहित्य # ७१ ☆

✍ नाव का धर्म… ☆ श्री हेमंत तारे  

यूँ तो,

क्यों हो कोई संदेह

नाव का धर्म ही होता है

डूबते को पार लगाना,

निष्पाप, निष्पक्ष रहकर

मदद का हाथ बढ़ाना।

 

पर हर नाव

ऐसी होती नही!

कुछ नावें,

नावों के झुंड में

दबी-छिपी रहती हैं,

कुटिल,

मत्सर,

और विघ्नसंतोषक,

पतवार को समेटे

आस-पास तैरती कातर आंखों से बचाये ।

 

और मुमकिन कहां

उन्हें पहचान पाना

हर समय,

हर दौर,

हर ज़रूरत के पल।

 

बेहतर है,

तय कर ली जाएँ दूरियाँ

अपने ही दम,

उम्र के हर दौर

बिना किसी नाव,

बिना किसी सहारे

अपने ही दम।

 

सीख लिया जाए

तैरना,

लढना,

निपटना,

उलझी गुत्थियाँ

अपने ही हाथों सुलझाना।

 

हर नाव

किनारे नहीं लगाती;

कुछ नावों का धर्म

होता है जुदा

यथा,

 

हम तो डूबेंगे सनम,

तुम्हें भी

ले डूबेंगे साथ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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