श्री जयपाल
(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘ आधा प्रकाशन से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक । प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।
आज प्रस्तुत है श्री हरभगवान चावला जी द्वारा लिखित काव्य संग्रह “समकाल की आवाज” पर चर्चा।
☆ “समकाल की आवाज ” – कवि… श्री हरभगवान चावला ☆ समीक्षा – श्री जयपाल ☆
पुस्तक चर्चा
समकाल की आवाज ( चयनित कवितायें)
कवि– श्री हरभगवान चावला (9354545440)
कीमत-175/- रुपये (पेपरबैक)
प्रकाशक–न्यू वर्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली (8750688053)
☆ मानवीय संवेदना,प्रेम और विद्रोह की कविताएं – श्री जयपाल ☆
इस हफ्ते हिंदी साहित्य के बहुचर्चित और प्रतिबद्ध कवि हरभगवान चावला की कविताओं से गुजरना हुआ । यह एक अलग तरह का एहसास था,एक आत्मीय अनुभूति थी। ये कविताएं ‘समकाल की आवाज़’- चयन के तहत ‘न्यू वर्ड पब्लिकेशन’- नई दिल्ली, के प्रयास से प्रकाश में आई हैं। इन कविताओं के चयन के संदर्भ में खुद प्रकाशक अफ्रीकी कवि कुमालो के हवाले से कहते हैं —
कवि हमें ऐसी कविताओं की जरूरत है
कविताएं
जो आतताइयों के चेहरे पर
सीधा वार करती हों
और उनके गरूर को तोड़ती हों
कवि
इससे पहले कि यह दशक भी
अतीत में गर्क हो जाए
तुम जनता के बीच जाओ और
जन संघर्षों को आगे बढ़ाने में
मदद करो
प्रकाशक की इस घोषणा में एक संवेदनशील साहित्यकार की तड़प दिखाई देती है । प्रकाशक समकालीन साहित्यिक सृजन से ऐसी कविताओं से पाठक को रूबरू कराना चाहते हैं जिनमे न केवल अपने समय की धड़कन हो बल्कि एक दायित्व और बौद्धिक ईमानदारी भी मौजूद हो , कवितायें जो अपने समय के गंभीर सवालों के द्वंद्व से गुजरी हों l यह द्वंद्वात्मकता और दृढ़ता समकाल की कविताओं के चयन में दिखाई देती हैं। कवि हरभगवान चावला स्वयं अपनी कविता के बारे में कहते हैं–
‘हर तरह के शोषण का विरोध तथा मानव संवेदना की प्रतिष्ठा । प्रेम शायद मेरी कविता की रीढ़ है । कईं बार तड़प उठती है कि सारी व्यवस्था को बदल दूँ ताकि कोई भूखा न हो । अनपढ़ न हो,शोषण का शिकार न हो। जाति या धर्म से इतर इंसान ,बस इंसान हो । इंसानी संवेदना से लबरेज । क्या कविता चीजों को बदल सकती है–? नहीं ,लेकिन कविता चीजों को देखने का नजरिया बदल देती है ।कविता को डूबकर पढ़ने के बाद आदमी ठीक वैसा नहीं रहता जैसा वह कविता पढ़ने के पहले होता है।’
इन कविताओं को पढ़ते हुए बार-बार ऐसा ही एहसास पाठक को भी होता है । ये कविताएं समाज का मार्मिक दस्तावेज हैं ।
इस संग्रह की शुरुआत लोक जीवन की कविताओं से होती है । इन कविताओं में कवि के लोक-जीवन के प्रति गहरे अनुराग को अभिव्यक्ति मिली है । लोकगीतों के तंज,ताने और उलाहने ,लोक जीवन की गंध तथा सादगी के साथ यहां आये हैं। इसके अतिरिक्त इन कविताओं में जल का संकट, पर्यावरण के प्रति व्यवस्था की लापरवाही, जल-जंगल जमीन के बारे में पूंजीवाद की निर्ममता, मजदूर और किसान की बदहाली, दलितों और अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत ,आस्था-विश्वास, धर्म, संस्कृति, भाषा जाति, संप्रदाय, क्षेत्र आदि के नाम पर देश में गुंडागर्दी को सत्ता का समर्थन, संविधान और लोकतंत्र का दमन, लेखकों,पत्रकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों की सरकार के प्रति चाटुकारिता ,वैश्विक दक्षिण-पंथी उभार, देश में फासीवाद का खतरनाक खेल, अंधविश्वास, पाखण्ड और अज्ञान का निर्लज्ज महिमामंडन आदि समसामयिक सामाजिक सरोकारों के मुद्दों को प्रतिबद्धता और चुनौतीपूर्ण स्वर के साथ उठाया गया है। इन ज्वलंत प्रश्नों को एक सशक्त आवाज देती हुई उनकी कुछ कविताओं की महत्वपूर्ण पंक्तियों की बानगी आप भी लिजिए–
चावल में
गंगा के हरे भरे मैदानों का स्वाद था
दाल में
रेतीली मिट्टी की मिठास
मेरी चुनरी उड़ गयी
संभाल मेरी बिटिया
आकाश चढ़ी चुनरी
जुल्म हुआ बिटिया !
तेरे गीतों में भी मैं ही रहूंगी बनी
कैसे जा पाऊंगी मैं समूची ससुराल
ऐसे न मुझको भेज री माई
दे दे मुझको दहेज री माई
अपने हाथ की मठरी देना
यादों की एक गठरी देना
आंसू अपने सहेज री माई
आया सहेली मगसर री
बाबुल का तन थरथर री
कर्ज का दर्द सताए सखी री
बाबुल मरता जाए सखी री
उसका जीवन जंग सखी री
लड़ने का यही ढंग सखी री
पर दुष्यंत हैं
कि उन्हें न शकुंतलाएं याद हैं
न प्रेम- निशानियां
ये विधवाएं हैं
कुल कलंकिनी, पति भक्षिणी
अपने-अपने घरों से निष्कासित
गृहस्वामिनियां
पाप मुक्ति के लिए
कुंभ से ज्यादा अच्छा अवसर
और मंदिर की सीढ़ियों से बेहतर जगह
भला कौन सी हो सकती हैं ?
कुम्भ में छूटी औरतें बूढ़ी होती हैं
ये बूढ़ी औरतें अपने बेटों के सिरों पर
पाप की गठरी की तरह लदी होती हैं
वर्तमान जिनके नियंत्रण में है वे जब चाहें
गढ़ लेते हैं चमचमाता मनोनुकूल अतीत
मैंने दिल्ली से एक सवाल पूछा
जवाब मेरे शहर से मिले बहुत सारे
पत्थरों और गालियों की शक्ल में
भेड़ें अपनी मस्ती में
देशभक्ति के गीत गाएं
और भेड़ियों को
शांति से अपना काम करने दें
ईंधन की मानिंद भट्टियों में
झोंक दिए जाते हैं जिंदा इंसान
तुम्हारी कविता को गंध नहीं आती
कहां से लाते हो तुम
अपनी कविता की ज्ञानेन्द्रियां कवि..?
कभी मिलो
जैसे धूप में जलते पौधे से
पानी मिलता है
एक दिन जरूर डरना छोड़ देंगे
डर के जंगल में फंसे लोग
बाज की आँखें सपने नहीं
शिकार देखती हैं
बोनों का ईश्वर भी बोना ही होता है
ईश्वर मर गया मरना ही था उसे
उसके मर जाने के बाद भी उम्मीदें जिंदा रही
तुझे कहां कहां से बेदखल करूं
तूं कहां नहीं है मौजूद
न लिखना कि गांव में आने लगी हैं
साधु संतों की यात्राएं
ओ पिता !
कोई अच्छी खबर लिखना
कविता अगर उगती है
तो उगे जैसे घास उगती है
कविता अगर उतरती है
तो उतरे पेड़ पर जैसे पक्षी उतरता है
कविता लिपि से नहीं होती
वह तो जीवन से संभव होती है
राजा होना बेशक ईश्वर होना नहीं है
पर इंसान होना राजा होने की अनिवार्य शर्त है
सूरज उन घरों में
कभी नहीं झांक पाता
महानायक
जिन घरों के चिराग़ बुझा देते हैं
भूखे हो
प्यासे हो
बीमार हो
लाचार हो
जैसे भी हो गर्व करो
जूते जब एक ही नाप के बनने लगे
तो लोगों ने पैर कटवा कर नाप के अनुरूप कर लिए
मुझे लगा पैर कटवाने से बेहतर है नंगे पांव चलना
जैसे जैसे बढ़ती है ग्रामीण स्त्रियों की उम्र इनकी गोद बड़ी होती जाती है
आंखें उदास
ईश्वरीय किताबों में आग होती है
पानी नहीं होता
ईश्वरीय किताबें स्त्री विरोधी होती है
और शूद्र विरोधी भी
ईश्वरीय किताबों पर राजा गर्व करते हैं
ईश्वरीय किताब का ईश्वर
जब किताब से निकल प्रजा में आता है
तो आग्नेय अस्त्र में बदल जाता है
आजादी को हमने कभी निर्जन वन की घास या
पेड़ की तरह नहीं जिया
मैं अपने घर में था
ठीक उसी वक्त जंगल में भी
जंगल के पेड़ मेरे घर की चीजों में थे जंगल के जानवर मेरे भीतर
जब तक हम पहुँचेंगे पंजाब
क्या तब तक भी बचा रहेगा
पंजाब के दरियाओं का पानी
छंद/अलंकार/बिम्ब/प्रतीक / वक्रोक्तियां/ शब्द/अर्थ /वाक्य /पद / मुहावरे/ लोकोक्तियां/कला/संगीत आदि सभी प्रकार के आवरणों को हटाकर ये कवितायें पाठक से एकांत में आकर मिलती हैं। दरअसल कविता मे जीवन होता है और जीवन में कविता । स्वयं कवि मानते हैं कि कविता लिपि में नहीं, जीवन से सम्भव होती है । इन कविताओं को कविता के व्याकरण से बाहर आकर ही समझा जा सकता है। ये कवितायें पाठक को आत्मविश्वासी, आत्मीय, अन्याय के प्रति विद्रोही, सामाजिक परिवर्तन के प्रति क्रांतिकारी ,इंसानियत के प्रति समर्पित, ईमानदार, संवेदनशील और वैज्ञानिक चेतना से लैस एक बेहतर इंसान बनाती हैं । इन कविताओं को जीवन में उतारा जा सकता है,जिया जा सकता है और एक बेहतर समाज की उम्मीद को जिंदा रखा जा सकता है। यही इन कविताओं की सार्थकता है।
बेहतरीन कविता-संग्रह के लिए कवि हरभगवान चावला को बहुत बहुत-बहुत बधाई!!
समीक्षा-… श्री जयपाल
संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






