श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। आज से प्रत्येक शुक्रवार हम आपके लिए श्री संजय भारद्वाज जी द्वारा उनकी चुनिंदा पुस्तकों पर समीक्षा प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)
संजय दृष्टि – समीक्षा का शुक्रवार # 26
कौन रोया रात भर? — कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण
समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज
पुस्तक का नाम : कौन रोया रात भर?
विधा : कविता
कवयित्री : डॉ. ज्योति कृष्ण
प्रकाशन : क्षितिज प्रकाशन, पुणे
अनुभव में पगी नवोदित रचनाएँ ☆ श्री संजय भारद्वाज
‘कौन रोया रात भर’ कवयित्री डॉ. ज्योति कृष्ण का प्रकाशित होनेवाला दूसरा संग्रह है। चूँकि उनका पहला और दूसरा कविता संग्रह एकसाथ ही प्रकाशित हुए हैं, अत: एक अर्थ में वे नवोदित हैं। दूसरा पहलू यह कि वे दीर्घकाल से लेखन कर रही हैं, अत: उनकी रचनाओं में जीवन का अनुभव उतरा है। फिर वे मनोविज्ञान की विद्यार्थी रही हैं, फलत: मनोभावों को बेहतर अनुभव करना और अनुभूति को कविता के माध्यम से अभिव्यक्ति देना, इस कविता संग्रह में प्रखरता से दृष्टिगोचर होता है।
अनुभव जब शब्दों में उतरता है तो कुछ इस तरह अभिव्यक्त होता है-
वक़्त अपने साथ भी बिता लीजिए,
फ़ुर्सत मिले तो कुछ गुनगुना लीजिए।
अनुभव की एक और बानगी देखिए-
पार उतरने वालों ने मूल्य नहीं दिया,
अब स्वयं दे रहा नदी पर पहरा पानी है।
आयु के साथ चेहरे पर झुर्रियों का आना प्राकृतिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में अनुभव से उपजे दर्शन के दर्शन कुछ यूँ होते हैं-
दुखी मत होना ख़ुुद को आईने में देखकर,
सारे सिलवटें तब्दील हो जाएँगी राख में।
सिलवटों का राख होना जीवन की नश्वरता का प्रतीक हो सकता है। साथ ही यह आशावाद का उदाहरण भी हो सकता है। कारण स्पष्ट है कि विसर्जन के बाद ही सृजन होगा।
अनुभवी जानता है कि समय अपना लेखा-जोखा यहीं पूरा कर लेता है। कविता में कुछ इस तरह उतरा है यह लेखा-जोखा-
किसने क्या किया और क्यों किया,
सबसे सवाल-जवाब कर लेगा।
हमें ज़रूरत नहीं है जोड़ने-घटाने की,
व़क्त सारा हिसाब कर लेगा।
शिक्षित होने का अर्थ केवल साक्षर होना नहीं होता। नेह, अपनत्व न हो तो निरा अक्षर ज्ञान किसी काम का नहीं।
शिक्षित होने का इतना प्रमाण काफ़ी है मुझे,
मेरे मानस पर तुम्हारा स्नेह का हस्ताक्षर हो।
दाम्पत्य का प्राणतत्व है प्रेम। इसमें अनुकूलता, प्रतिकूलता, सहमति, असहमति सबका इंद्रधनुष अंतर्निहित होता है । इस इंद्रधनुष के अनेक रंगों को अपनी लेखनी की स्याही में भरकर कवयित्री कुछ चित्र उकेरती हैं-
1)
अपने मज़बूत इरादों से तुम हामी भरवा ही लेते हो,
लेकिन अब इच्छा है मेरी आनाकानी तुम तक पहुँचे।
2)
सोचा था कि कुछ पढ़ूँगी देर रात तक जाग कर,
और उनकी ख़्वाहिश थी कि बंद करके किताब रख दूँ।
सामान्यतः दो ध्रुवों का आत्मीय समन्वय होता है दाम्पत्य। यही दाम्पत्य का आकर्षण है और सहधर्मिता का सौंदर्य भी। इसकी यह बानगी देखिए-
बंधन होता है अगर सात जन्मों का, तेरे मेरे साथ का ये पहला जनम है।
जब तक साथ है, हाथों में ये हाथ है, हाथ ये छुड़ा ले नहीं किसी में भी दम है।
शब्दों का अपना सामर्थ्य है, अपने अर्थ हैं, अपनी अभिव्यक्ति है, तथापि मौन की मुखरता का आयाम विस्तृत होता है।
अंतर्मन के द्वंद्व को, समझ सका है कौन।
वाणी जब सकुचा गई, मुखर हो गया मौन॥
फिर स्त्री का मानिनी रूप अपनी ख़ामोशी को मनवाना भी चाहता है।
जिन्हें फ़र्क पड़ता हो मेरी ख़ामोशियों से,
मना लेें वे मुझे आकर, रूठे हुए हैं हम।
प्रेम की विशेषता है रूठना, मनाना, एक दूसरे की भावना को समझना और उसे मान देना। राधा रानी रूठती थीं तो कृष्ण मनाते थे। सिक्के का दूसरा पहलू है कि कृष्ण मनाते थे तो राधा रानी रूठती थीं।
हम इक्कीसवीं सदी का नागरिक होने का कितना ही ढोल पीट लेें पर घर-परिवार, समाज में स्त्री को उसका समुचित स्थान और सम्मान देने में हमारा हाथ तंग ही रहा है। इस विसंगति की अभिव्यक्ति कवयित्री के शब्दों में कुछ इस तरह से स्थान पाती है-
परिवार को अपनी ममता और स्नेह से बाँध रखा,
रिश्तों की इस गर्माहट के प्रति रही है सर्द दुनिया।
सामूहिक थे तो परिवार थे, एकल हुई तो ‘फैमिली’ हो गए। समूह से एकल होने की यात्रा ने विश्व के किसी भी अन्य समुदाय की अपेक्षा भारतीय समाज को अधिक प्रभावित किया है। ऐसे में सामूहिकता का आनंद और सुरक्षा चक्र देख चुकी कवयित्री का युवाओं को स्पष्ट संदेश है-
घोसलों में अपने लौट कर परिंदे भी आते हैं,
भूल मत कभी करना, घर अलग बसाने की।
एकल होना यानी जड़ों से कटना, अपनों से कटना। जो अपनों का ना हो सका, उसका किसी अन्य से जुड़ सकने का विचार ही अतार्किक है।
दूसरों में क्या जुड़ेंगे, जुड़ न पाए अपनों से जो,
बढ़ रहा है सामर्थ्य लेकिन भावनाएँ घट रही हैं।
एकल से एकाकी होता है मनुष्य। फिर इच्छा जागती है कि कोई जाने, पूछे उसके दुख को। इस पीड़ा की यह अभिव्यक्ति देखिए,
हमें भी ख़्वाहिश है कि मन के बोझ को हल्का करें,
पूछोगे तो बता देंगे कि क्यों इतने उदास हैं।
स्त्री को दो घरों की ज्योति यूँ ही नहीं कहा जाता है। डॉ ज्योति कृष्ण का मायका बिहार है जबकि उनकी ससुराल उत्तर प्रदेश है। दोनों राज्यों के भौगोलिक और सांस्कृतिक दर्शन पर उनकी कविताएँ इस संग्रह में हैं। यह सम्बंधों के लिए उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है तो मायके और ससुराल के प्रति उनके ममत्व को भी अभिव्यक्त करता है।
इस संग्रह में प्रकृति की सुंदरता, उसकी अठखेलियोेंं का वर्णन है। कहीं वसंत का ख़ुमार शब्द पाता है, कहीं वर्षा की बयार की सौंध से कहन महक उठती है। कहीं काम की तलाश में गाँव से शहर की ओर होते पलायन का चित्रण है तो कहीं पर्यावरण पर चिंता शब्दों में ढलती है। इस संग्रह में माँ से सम्बंधित कविता है, पिता पर आधारित कविता है, अपने मकान से मध्यम वर्ग के जुड़ाव को दर्शाया गया है। संग्रह में मनुष्य की वाणी के महत्व पर रचना है तो देशभक्ति की वीणा की झंकार भी है।
पेड़-पौधों लता-गुल्मों से पर्यावरण हरा रहे,
विनाश से बची रहे, दीर्घायु धरा रहे।
सामूहिक हो या एकल, रिश्तो में वह प्रगाढ़ता नहीं रही जिसके चलते रिश्तों को रिश्ता कहा जाता था। सांप्रतिक स्थिति का यह सटीक बिम्बात्मक वर्णन देखिए-
रिश्तों की रौनकें आबाद अगर रहतीं,
घरों में मकड़ियों के जाले नहीं होते।
कहा जाता है, ’बेसिक्स नेवर चेंज।’ कितनी ही प्रौद्योगिक उन्नति हो जाए, सुख, सुविधा के साधन आ जाएँ, मूलभूत कभी नहीं बदलता। इसकी यह बानगी देखिए-
ज़िंदगी एक मोड़ पर थक कर बैठ जाती है,
अगर चलते रहना है तो पाँव से रिश्ता रखना।
‘य: क्रियावान स पंडित:।’ बिना उद्यम, बिना श्रम के कभी कोई परिणाम नहीं मिलता।
सोचा बहुत कुछ, किया कुछ नहीं,
तभी हाथ मेरे, लगा कुछ नहीं॥
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमारा संविधान हमारा मार्गदर्शक है। कवयित्री को संविधान की प्रस्तावना मानो कंठस्थ है। इस संदर्भ में वे कहती हैं-
संविधान की हर पंक्ति सर आँखों पर,
प्रस्तावना के शब्द ज़बानी याद रहेें।
सृजन मनुष्य को विचार देता है। विचार मेेंं मनुष्य को चमत्कृत करने की क्षमता छिपी होती है। उसके चिंतन और मनन का कैनवास बड़ा हो जाता है। इस संदर्भ में शब्दों का यह चमत्कार देखिए-
जाने कौन चुपके से, ख़्वाब अपने रखकर गया,
चौकसी करनी पड़ेगी अब हमें सिरहाने की।
डॉ. ज्योति कृष्ण की कविता यात्रा जीवन के सारे खट्टे- मीठे अनुभवों को जोड़कर चलती है। उनकी रचनाएँ स्वयं को जलाकर रोशनी करने की मानिंद हैं।
एक छंद मिला उस पार नदी के,
एक पर्वत के पार मिला।
पुष्प-पराग से अक्षर निकले,
शब्दों को शृंगार मिला॥
*
भाव मिले सागर के अंदर,
भाषा स्वर्ण खदानों से।
सब जोड़ा तब जाकर कवि के,
अंतस को उद्गार मिला॥
प्रस्तुत पुस्तक का मुखपृष्ठ प्रसिद्ध चित्रकार संदीप राशिनकर ने बनाया है। यह चित्र शीर्षक को बहुआयामी बनाता है।
जीवन के उत्तरार्द्ध में प्रकाशित हुए कवयित्री के अंतस के उद्गारों के इस संग्रह के लिए कहा जा सकता है कि ‘देर आयद, दुरुस्त आयद।’ कामना है कि उनका यह संग्रह उन्हें साहित्य के क्षेत्र में समुचित प्रतिष्ठापना दे।
© संजय भारद्वाज
नाटककार-निर्देशक
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈






