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सुश्री मनिषा खटाटे

 ☆ रंगमंच/सिनेमा ☆ मुंबई में “का बा” के गीतकार – डॉ. सागर ☆  सुश्री मनिषा खटाटे☆ 

पिछले वर्ष मुंबई में “का बा” यह गीत मशहूर हुआ. यह गीत प्रसिद्ध अभिनेता मनोज बाजपेयी ने गाया और उन्हीं के उपर फिल्माया गया. यह गीत भोजपुरी भाषा में हैं. परंतु यथार्थवाद और सामाजिक संघर्ष की कहानी व्यक्त करने में स्वयं ही सक्षम हैं. सिनेमा भी साहित्य की तरह एक संरचना हैं. डाँ.सागर सिनेमा, गीत और साहित्य के इंद्रधनुष  हैं. बॉलीवुड में बलिया, उत्तरप्रदेश से आकर डा. सागर अपने गीतों मे तितलियों के रंग भरते हैं और उन्हे बेचने के लिये वे जे.एन.यु. से बॉलीवुड आ जाते है. डॉ. सागर के दादी का यह सपना उनके दिल की धड़कन बन जाता है और बॉलीवुड  पर छा जाता है, यह गीतों का सपना श्रेया घौषाल से लेकर तमाम महान गायको की आवाज से गूँजता हैं. शोरगुल की इस मायानगरी मे डॉ. सागर एक अजूबा गीतकार है. डॉ सागर का यह सफर किसी फिल्मी कहानी सें कम नही है.

साहित्य का सौंदर्य और तहजीब अगर गीतो से बरसने लगे तो सावन में भी आग लग जाती है. बंम्बई के उम्मीदों की उँची इमारतें और नंगे पांव चलने वाले रास्ते अपनी मंजिल तक पहुँच ही जाते है. मगर उनके इस पसीने में भी मजनू के मैले कुर्ते से साहिरवाली खुशबू आती है. यथार्थवाद और छायावाद के फूल कोरे कागज पर उमड़ते हैं. लोक जीवन प्रतीक और बिंबो मे जाम की तरह छलकता है. डॉ. सागर के गीत समाज के संघर्ष को किनारा देते है. सामान्य मनुष्य की आवाज को बुलंदी तक पहुँचाता है. यह हकीकत वे इस तरह अपने गीतो मे बयां करते हैं — “ख्वाबों को सच करने के लिये तितली ने सारे रंग बेच दिये”, “ख्वाबों की दुनिया मुकम्मल कहाँ है, जीने की ख्वाइशों में मरना यहाँ है”. “बॉलीवुड डायरीज” इस फिल्म ने उन्हे बतौर गीतकार एक पहचान करा दी हैं, नहीं तो बॉलीवुड में अक्सर यह कहते सुना हैं की ज्यादा गुलज़ार बनने की कोशिश मत कर. लेकिन इसका एक अर्थ यह है की बॉलीवुड सें उर्दू का प्रभाव कम करने में पंजाबी, भोजपुरी और मराठी संस्कृति तथा टॉलीवूड भी सफल रहा है. भारतीय फिल्मों पर अपनी अमिट छाप डाल रहे है. इस माहौल मे डॉ.सागरजी के गीत भोजपुरी तडका लगा रहे है. ये नया दौर है, ये नये जमाने की नयी आवाज है, ये बॉलीवुड को नयी डायरी लिखने के लिये मजबूर करेगी.

दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह हैं की बंम्बई मे का बा ! इस गीत ने एक बडा इतिहास रच दिया हैं. इस गीत को मशहुर अभिनेता मनोज वाजपेयी ने गाया है और उनके उपर चित्रित किया गया है. इस गीत ने मुंबई के जीवन को सही मायनों मे शब्दांकित किया हैं. रोटी, कपडा और मकान के चक्कर मे हम मुंबई आकर हमारा असली जीवन भी भूल जाते हैं. पैसे कमाने की इच्छा ने मुंबई हमसे क्या क्या नही छीनती? लोकल पकडने की भीड और होड में हम हमारे चेहरे भी भूलते है. यहाँ वडा पाव खाते समय गांव की रोटी आंसुओ के साथ याद आती हैं. यह करते वक्त कभी आतंकी हमले को भी सीने पर झेलना पडता है. जान जाती हैं फिर भी दूसरे दिन जिंदगी को पटरी पर लाना आवश्यक होता है. यही मुंबई है. यही अहसास डाँ.सागर फिल्मों की चकाचौंध मे भूले नही है. मुंबई का यह तथ्य इस गीत में उजागर होता हैं. मुंबई एक राक्षस की तरह हैं जो लोगों का पेट तो भरती है मगर उनके सपने निगल जाती हैं. यहाँ लोग पसीने से अपनी प्यास बुझाते हैं. मुंबई पर आज तक बहुत सारे गीत बने होंगे परंतु मुंबई का ऐसा तीखा, दिल को चुभनेवाला दर्द शायद ही कोई बयां कर पाया हैं. यह अदभुतवाद और यथार्थ का अनोखा संयोग है. यू.पी और बिहार से जो प्रवासी मजदूर है ज्यादातर उनकी यह कहानी हैं. यह कहानी आपको फुटपाथ पर और मुंबई के हर गलीं में या हर सडक पर दिखाई देगी. भूंख, प्यास बुझाने के चक्कर मे जिस्म की खरीद फरोख्त कब शुरु हो जाती है, इसका अहसास भी नहीं हो जाता. मुंबई की अपनी एक दुनियां हैं. इस दुनिया के रंग निराले हैं, किसी किसी के ही पकड में आते हैं. इसकी दिवाली अलग है तो इसकी होली भी. हाल ही में डाँ. सागर का और एक गीत मशहूर हो रहा है “बबुनी तेरे रंग में”. होली के रंग मे रंगने का यह एक नया अंदाज है. लोक जीवन के व्यवहार को पर्दे पर अंकित करने का काम बखूबी फिल्मे निभाती हैं. काव्य तथा गीत लोकजीवन का आधार होता हैं और गीत भारतीय फिल्मों का अहम् हिस्सा है. गीतो के बिना फिल्मे अधूरी होती है. वह फिल्म की आत्मा होती है. यह सुर डा. सागर के गीतो की लय है. गीत ही फिल्म की असली पहचान करा देते है. वे फिल्मों को सामर्थ्य प्रदान कराते है.

डा. सागरजी के जीवन के तीन प्रमुख पडाव है, बलिया, जे.एन.यू. और बॉलीवुड. अक्सर तीनों का प्रभाव आपके गीतों पर पडता दिखाई देता है. सितारों की तरह आकाश में झिलमिलाता है. ये गीत बॉलीवुड को प्रकाशित करते है.

डा. सागर जी का यह गीतों का सफर चलता रहे. न रुकने वाला एक कारवाँ बने यह कामना व्यक्त करती हूँ. डा. सागरजी में वह काव्य प्रतिभा है की उनके गीत इस मायानगरी को पुलकित करते रहेंगे.

© सुश्री मनिषा खटाटे

नासिक, महाराष्ट्र (भारत)

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈
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