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श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। 

हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ रहे थे। हम संजय दृष्टिश्रृंखला को कुछ समय के लिए विराम दे रहे हैं ।

प्रस्तुत है  रंगमंच स्तम्भ के अंतर्गत महाराष्ट्र राज्य नाटक प्रमाणन बोर्ड द्वारा मंचन के लिए प्रमाणपत्र प्राप्त धारावाहिक स्वरुप में श्री संजय भारद्वाज जी का सुप्रसिद्ध नाटक “एक भिखारिन की मौत”। )

💥 रंगमंच ☆ दो अंकी नाटक – एक भिखारिन की मौत – 7 ☆  संजय भारद्वाज 💥

द्वितीय अंक – प्रवेश एक

(विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पंत लेक्चर ले रहे हैं। केवल एक ब्लैकबोर्ड, मेज और कुर्सी से इसे दर्शाया जा सकता है।)

प्रोफेसर पंत- कल के विषय को हम आज आगे जारी रखेंगे। हमारा विषय था, ‘बदलते परिवेश में मानवीय मूल्य।’ एक बात ख़ास तौर पर ध्यान रखें। समाजशास्त्र को गहरे से समझने के लिए केवल इन किताबों को पढ़ने से काम नहीं चलेगा। समाज तो हर समय अपने मूल्य बदलते रहने वाला समूह है। इस वजह से समाजशास्त्र भी हर पल बदलता रहता है। लगातार के इस बदलाव की वजह से समाजशास्त्र को समझने के लिए समाज के सीधे संपर्क में रहिए। व्यक्ति के स्वभाव में, उसके आचरण में, सोच-विचार में लगातार परिवर्तन चलता रहता है। यह परिवर्तन लोगों के व्यवहार में खुलकर दिखाई देता है। इस बात को समझने के लिए हम कुछ उदाहरण लेंगे। आज से करीब सौ-सवा सौ साल पहले याने बीसवीं सदी के आरंभ तक भी लोगों की प्राथमिकता थी, मान सम्मान। लोग मान-सम्मान हासिल करने और उसे बनाए रखने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देते थे। धीरे-धीरे बदलते समय के साथ मूल्य बदले। धन का महत्व समाज में ज्यादा बढ़ने लगा। लोगों की प्राथमिकता बदली। धन पहले नंबर पर आ गया और मान-सम्मान दूसरे नंबर पर चला गया। समय फिर अपनी रफ़्तार से चलता रहा। धन का महत्व बना रहा पर अब लोगों को महसूस होने लगा था कि धन ही सब कुछ नहीं है।आपके पास बाहुबल होना चाहिए, ताकत होनी चाहिए। ……….आगे जैसे-जैसे सामाजिक स्थितियाँ बदलीं, सामाजिक मूल्य भी बदलते रहे। हम अत्याधुनिक जेटयुग में आ पहुँचे। इस युग में अन्य सारी बातें पीछे छूट गईं और चर्चा में बने रहने की वृत्ति बढ़ गई। आज की तारीख में चर्चित होना, किसी भी तरह चर्चित रहना ज़रूरी-सा  हो गया है। आप चर्चित होंगे तो अन्य सामाजिक मूल्य खुद-ब-खुद आपको हासिल हो जाएँगे। इस मेनपोस्ट वाली भिखारिन का ही उदाहरण लें। वह अच्छे से जानती थी कि बदनाम होंगे तो क्या नाम ना होगा? औरत होने के नाते उसके पास चर्चा में रहने का बेहतरीन ज़रिया था उसका शरीर…. और इसका उसने भरपूर फायदा उठाया। (लेक्चर समाप्त होने की घंटी बजती है।)… आज हम यही रुकेंगे। कल इस भिखारिन वाले प्रसंग से ही विषय को आगे बढ़ाएँगे। (लेक्चर समाप्ति के बाद अपने कक्ष की ओर जाते प्रोफेसर पंत। कॉरिडोर में रमेश और अनुराधा प्रतीक्षा कर रहे हैं। तीनों चलते-चलते चर्चा करते हैं।)

रमेश- प्रोफेसर पंत, जैसाकि आप स्टूडेंट्स को बता रहे थे कि उस भिखारिन ने अपने कपड़े चर्चित होने के लिए उतारे।

प्रोफेसर पंत-  जी हां निश्चित, सर्टेनली।

अनुराधा- पर सर वह भीख मांगने के लिए भी तो ऐसा कर सकती थी।

प्रोफेसर पंत- आप लोग मेरी बात समझे नहीं। (अपने कमरे तक पहुँच जाते हैं। जाकर बैठते हैं। रमेश और अनुराधा को बैठने के लिए कहते हैं।

प्रोफेसर पंत- आप चर्चा और भीख मांगने में जो संबंध है उसे समझ नहीं पाईं। उसने किसी भी वजह से ऐसा किया हो, हर हाल में उसके पीछे मूल प्रवृत्ति रही लोगों की भीड़ को आकर्षित करने की इच्छा याने चर्चित होने के मनोवृति। भीख मांगना उसका पेशा था। स्वाभाविक है कि व्यक्ति अपने पेशे में ज्यादा से ज्यादा कमाना चाहेगा। उसके अर्द्धनग्न हो जाने से बात बन गई होगी और हजारों लोग वहाँ गए होंगे। वह चर्चा के केंद्र में रही। स्वाभाविक था कि इस दौरान उसका बिजनेस भी खूब हुआ होगा।

अनुराधा- सर डोंट माइंड। समाजशास्त्र के नियमों के अनुसार आपकी बात में दम है। आई मीन आपका कहना सही है कि उसने चर्चा में रहकर अपना बिजनेस बढ़ाने के लिए ऐसा किया लेकिन तथ्य इसके विरुद्ध हैं। भिखारिन शायद कुपोषण या कमज़ोरी से मर गई। अगर मान लिया जाय कि लोगों को अपनी और आकर्षित करने के लिए उसने यह प्रोपेगैंडा किया तो भी इस प्रोपेगैंडा का कोई लाभ उसे नहीं मिला।

प्रोफेसर पंत-  जैसा मैंने कहा कि समाज में बदलाव निरंतर चलता रहता है। बदलते समय के साथ वृत्तियाँ भी बदलती हैं। आज भूखे रहकर भी या मरते-मरते भी चर्चित हो सकने की वृत्ति समाज में घर कर गई है,.. बुरी तरह घर कर गई है। संभव है कि इस भिखारिन को भी अपनी मौत सामने दिखाई दे रही हो और आख़िरी वक्त में चर्चित होने के लिए उसने ऐसा किया हो।

रमेश- आई एम सॉरी प्रोफेसर पंत। बात कुछ गले नहीं उतरती कि आदमी को मौत सामने दिखाई दे रही हो और वह चर्चित होने की कोशिश करे?

प्रोफेसर पंत- (बिगड़ उठते हैं।) आप पॉइंट तो समझना नहीं चाहते और बहस करते हैं। मैं कह रहा हूँ कि वृत्तियाँ भी बदलती हैं समय के साथ।…. और फिर जब मैं कह रहा हूँ,  प्रोफेसर पंत कह रहे हैं कि उसने चर्चित होने के लिए ऐसा किया तो मानते क्यों नहीं आप?  यू मस्ट एक्सेप्ट कि हाँ उसने चर्चित होने के लिए ऐसा किया।

रमेश- लेकिन एक्सेप्शन भी तो होते हैं ना सर।

प्रोफेसर पंत-  प्रोफेसर पंत के सिद्धांतों को, उनकी विचारधारा को कोई एक्सेप्शन लागू नहीं होता।… सोशियोलॉजी पढ़ा है आपने?

रमेश- जी नहीं।

प्रोफेसर पंत- (अनुराधा से) आपने?

अनुराधा- नहीं।

प्रोफेसर पंत-  मैंने पढ़ा है।  मैंने पढ़ा भी है और 24 साल से पढ़ा भी रहा हूँ.., तभी तो यूनिवर्सिटी में एचओडी बन पाया हँ।

अनुराधा- सही बात है सर। हम जानते हैं आपने सोशियोलॉजी बहुत पढ़ा है, पढ़ा रहे हैं और यूनिवर्सिटी में एचओडी हैं। इसी वज़ह से हम लोगों ने आपका इंटरव्यू लेने का फैसला किया।

रमेश- एक मिनट के लिए इस विवाद को किनारे कर दें कि उस भिखारिन ने ऐसा क्यों किया। इस पर चर्चा होती रहेगी। फिलहाल दो छोटे- छोटे सवाल। पहला.., क्या आपने उस भिखारिन को भीख दी?

प्रोफेसर पंत- सवाल ही नहीं उठता। पहली बात तो मैं वहाँ गया ही नहीं। यह सीधे-सीधे प्रोपेगैंडा और मूल्यों में बदलाव का एक मामला था। मैं अगर वहाँ गया भी होता तो उसे कुछ देता नहीं। शी वॉज़ मेड फॉर दिस काइंड ऑफ डेथ ओनली..। यदि वह कुपोषित थी, कमज़ोर थी  तो भी उसे इसी तरह की मौत की ज़रूरत थी ताकि चर्चित होने की इस वृत्ति पर अंकुश लग सके।

रमेश- सर, दूसरा सवाल। आपके अनुसार भिखारिन के इस कृत्य का समाज पर क्या प्रभाव पड़ा है?

प्रोफेसर पंत- समाज पर गलत, बेहद गलत प्रभाव पड़ा है। एक औरत यों पब्लिक प्लेस में अपनी नुमाइश करे तो असर तो खतरनाक होंगे ही। निकट भविष्य में शहर में औरतों के साथ होने वाले अपराधों की संख्या बढ़ सकती है।

अनुराधा- सर! इस घटना पर एक इंडिविजुअल पुरुष की प्रतिक्रिया क्या हो सकती है, बताएँगे आप?

प्रोफेसर पंत- सरल सी बात है। हर व्यक्ति के भीतर की वासना, हर पुरुष के अंदर की पशुता ऐसे दृश्यों को देखकर जग जाती है। फिर वह पंद्रह साल का बच्चा हो या सत्तर साल का वृद्ध।

रमेश- लेकिन इसके कुछ एक्सेप्शन तो होंगे ही न?

प्रोफेसर पंत- फिर वही एक्सेप्शन… मैंने आपसे अभी कहा था कि प्रोफेसर पंत के सिद्धांतों का कोई एक्सेप्शन नहीं होता। एवरीवन हैज टू एक्सेप्ट इट।

रमेश- देन वॉट डू यू थिंक अबाउट योरसेल्फ प्रोफेसर? आपके भीतर का भी वह मर्दाना जानवर उस भिखारिन को देखकर बेकाबू तो हुआ ही होगा!  अंदर की सारी कामवासना..

प्रोफेसर पंत- क्या बकते हो। पत्रकारिता के नाम पर पीत-पत्रकारिता करते हो। मैं तुम्हें अदालत में खींचूँगा। गेट आउट.., गेट लॉस्ट।

( क्रोध में प्रोफेसर रमेश को धक्के मारकर निकालता है। तब तक अनुराधा भिखारिन बनकर खड़ी हो जाती है। अनुराधा का यह रूप देखकर प्रोफेसर की वासना जागृत हो उठती है।)

प्रोफेसर पंत- तुम वही भिखारिन हो ना। अरे तुमको चर्चित होने की क्या ज़रूरत थी?…. ये जो स्टूडेंट्स को पढ़ाता हूँ मैं कि मूल्य बदलते हैं, ….ये सब बकवास है। एक मूल्य हमेशा पहले नंबर पर रहा है…..एक वृत्ति हमेशा पहली रही है……पुरुष के नर होने की वृत्ति….. स्त्री को मादा समझने की वृत्ति।… आओ ना मेरे पास।… मैं तुम्हारी सारी ज़रूरतें पूरी कर दूँगा।… आओ मेरे पास..!

(अनुराधा का हटना। प्रोफेसर का वासनापीड़ित होकर उसे खोजना।)

क्रमशः …

नोट- ‘एक भिखारिन की मौत’ नाटक को महाराष्ट्र राज्य नाटक प्रमाणन बोर्ड द्वारा मंचन के लिए प्रमाणपत्र प्राप्त है। ‘एक भिखारिन की मौत’ नाटक के पूरे/आंशिक मंचन, प्रकाशन/प्रसारण,  किसी भी रूप में सम्पूर्ण/आंशिक भाग के उपयोग हेतु लेखक की लिखित पूर्वानुमति अनिवार्य है।

©  संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

9890122603

≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
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