श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “ऑटो रिप्लाई में समाया झूठ…” ।)
☆ शेष कुशल # ५७ ☆
☆ व्यंग्य – “ऑटो रिप्लाई में समाया झूठ…” – शांतिलाल जैन ☆
‘मैं इमरजेंसी वर्क मीटिंग में हूँ। बाद में कॉल करता हूँ।’
‘झूठ लिखना पाप है’ – ऐसा तो न कहीं पढ़ा, न कहीं सुना। अलबत्ता ‘झूठ बोलना पाप है’ – बचपन से सुनते आ रहे हैं।
सो बोल नहीं रहे, लिख रहे हैं, धड़ल्ले से लिख रहे हैं। लिख कर रख ले रहे हैं, उसी को बार बार फॉरवर्ड कर दे रहे हैं। लिखना एक बार, फॉरवर्ड अनेक बार। इस कला में प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती श्रीमान्, एक गिफ्ट सी है जो मोबाईल खरीदने के साथ गॉड से मिल जाया करती है। नेटफ्लिक्स पर आप वेब सिरीज़ देख रहे हैं और कॉल रिसीव हुआ। लिखिए कि – ‘बॉस के साथ एक अर्जेंट मैटर पर डिस्कशन में हूँ। केबिन से बाहर आकर फोन करता हूँ’। फिर क्या तो आपका केबिन से बाहर निकलना और क्या ही आपका कॉल करना। यकीन मानिए लिखा हुआ झूठ पाप की केटेगरी में नहीं आता। आता तो लाखों व्हाट्सअप अंकल पाप की गठरी सिर पर लादे नरक में प्रवेश की कतार में खड़े होते। उनकी कहानी फिर कभी, फिलवक्त आज के विषय ‘ऑटो रिप्लाई में समाया झूठ’ पर ही रहते हैं।
वाईफ का मूड सुबह से ख़राब है। मूड अगर सुबह आठ बजे के आसपास ख़राब हुआ है तो नौ साढ़े नौ तक तो माईग्रेन का माइल्ड से सीवियर केटेगरी में कन्वर्जन पक्का है। शॉपिंग ही इलाज़ है। शाम तक क्रेडिट कार्ड की शरण में जाना ही जाना है। तनाव पसरा है घर में कि घंटी बज उठती है। एक दोस्त का कॉल है। उठाऊँगा तो कहेगा – घर पर मिलने आना चाहता हूँ। ‘जी बहुत चाहता है सच बोलें, क्या करें हौंसला नहीं होता’। कुछ देर की ऊहापोह के बाद हौंसला जुटाकर लिखा – ‘सॉरी डियर, मैं आपसे मिल नहीं पाउँगा! आउट ऑफ़ स्टेशन हूँ, परसों लौटने का है। लौटने पर मैं ASAP जवाब दूँगा। कुछ अर्जेंट हो तो मैसेज करना। बाय।’ शहर में, दस मिनिट बाद ही, जो वो सामने पड़ जाता तो…। तो भी कुछ नहीं होता। आजकल झूठ बोलकर लोग शर्मिंदा नहीं होते। सारे ही बंदरों की पूँछ कटी हुई है इन दिनों। ऐसा कुछ हुआ भी नहीं, बस जवाब में उसने वसीम बरेलवी साहब का एक शेर लिख भेजा – ‘वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से, मैं ए’तिबार न करता तो क्या करता’।
अगर अब भी आपको लगता है झूठ लिखने से पाप लग सकता है तो आप ये जिम्मेदारी मोबाइल पर डालकर अपराध-बोध मुक्त हो सकते हैं। ऑटो रिप्लाई का सिस्टम अवेलेवल जो है। मैनेजर साहब ने अपने वाट्सअप अकाउंट में सेट कर रखा है। मैसेज मिला – ‘पिताजी नहीं रहे। शवयात्रा 11 बजे निज निवास से निकलेगी।’ रिप्लाईड इंस्टेंटली – ‘थैंक-यू, आपका संदेश पाकर हमें बहुत ख़ुशी हुई। हमारे प्रतिनिधि आपके पिताजी से शीघ्र संपर्क करेंगे। उनका लोकेशन शेयर कर सकेंगे तो हमें आसानी होगी। आपका दिन शुभ हो।’ बैकुंठ धाम की लोकेशन खोजने में कितने ऋषियों, संतों ने हिमालय में अपने आप को गला दिया श्रीमान् मैनेजर साहब !! क्या शेयर करें आपको ?
ऑटो रिप्लाई तो दादू ने भी सेट किया हुआ है। उसे लगता है हर बार मैं उसे लेख छप जाने का अलर्ट ही भेजता हूँ। मगर उस दिन तो हमारे घर में चोरी हो गई थी। दादू को मैसेज किया। ‘बधाई शांतिबाबू’ – दादू रिप्लाईड।
वफ़ा के शहर में अब सब झूठ लिखते हैं। जो झूठ सब लिखते हों वो झूठ नहीं रह जाता, न्यू नार्मल हो जाता है।
तो लिखिए, धड़ल्ले से लिखिए, झूठ लिखिए, फिलवक्त तो पाप नहीं ही पड़ेगा। पड़ने की संभावना हो तो भी ऑटो रिप्लाई करनेवाला मोबाइल हैण्डसेट नरक में जाएगा, आप और हम तब भी बचे रहेंगे।
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© शांतिलाल जैन
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