डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं डॉ  राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ जी की दूसरी पुण्यतिथि पर संस्मरण – मेरी स्मृतियों में- मेरे पिता)

☆ संस्मरण – मेरी स्मृतियों में – मेरे पिता ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

द्वितीय पुण्यतिथि पर शत-शत नमन🙏🙏

पिता केवल एक संबंध नहीं होते, वे जीवन की वह दृढ़ पहचान होते हैं जिन पर व्यक्तित्व की पूरी इमारत खड़ी रहती है। मेरे पिता मेरी जान थे, मेरी पहचान थे और वो मेरे जीवन का अभिमान थे । उनका अस्तित्व मेरे लिए केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक विरासत के रूप में भी सदा जीवित रहेगा।

 

उनका व्यक्तित्व अत्यंत प्रखर था-बिना शोर किए, बिना स्वयं को सामने रखे। वे उस वटवृक्ष की भाँति थे जिसकी जड़ें गहराई में छिपी रहती हैं, पर छाया सबको मिलती है। जीवन की आँधियाँ, तपन और बारिश वे स्वयं झेलते रहे, किंतु संतान को उसका आभास तक नहीं होने दिया। अंतर्मन  की पीड़ा, अनगिनत आहें और असह्य मौन—सब कुछ उन्होंने अपने भीतर समेट लिया। पिता का यही मौन उनका सबसे बड़ा त्याग था।

मेरे जीवन की शान, आत्मविश्वास और संस्कार पिता से ही बढ़े। वे हर समय तट पर खड़े उस प्रहरी की तरह थे, जो भले ही दिखाई न दे, पर उसकी उपस्थिति से ही यात्रा सुरक्षित हो जाती है। आज वे भौतिक रूप से पास नहीं हैं, किंतु उनकी स्मृति हर क्षण दिलासा देती है-

“बेटा, हम हमेशा तुम्हारे साथ हैं. हमने तुम्हारा हाथ पकड़ा है।”

मेरे पिता का साहित्य से गहरा नाता था। घर में साहित्यकारों का आना-जाना, विचारों की चर्चा, कविताओं में रस का बस जाना-यह सब मेरे संस्कार का हिस्सा बना। उन्होंने शब्दों के प्रति सम्मान सिखाया, विचारों को उड़ान दी और अभिव्यक्ति को पहचान। उनके सान्निध्य में कविता केवल रचना नहीं रही, वह जीवन का स्वभाव बन गई। जो पहचान मुझे साहित्य में मिली, वह माता- पिता के दिए संस्कारों की ही देन है।

पिता ने कभी उपदेश नहीं दिए, उन्होंने जीवन जिया-और वही जीवन मेरी सबसे बड़ी शिक्षा बना। उनका प्यार आशीर्वाद की तरह था, जो बिना कहे, बिना जताए हर क्षण साथ रहा। आज उनकी पुण्यतिथि पर मन पीड़ा से भरा है, पर साथ ही गर्व से भी-कि ऐसे पिता मिले, जो जीवन भर खजाने की तरह संजोए जाने योग्य रहा।

पिता नहीं हैं, पर उनका व्यक्तित्व, उनके संस्कार और उनकी स्मृतियाँ आलोक की तरह हमारे साथ सदा रहेगा  यह शाश्वत है –

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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