श्री यशोवर्धन पाठक
☆ संस्मरण ☆
☆ “श्री ओंकार तिवारी और नर्मदा के स्वर…” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार, अधिवक्ता और सुप्रसिद्ध कवि श्री ओंकार तिवारी ने जब नर्मदा के स्वर अखबार का प्रकाशन किया, उस समय दैनिक, पाक्षिक और साप्ताहिक अखबार आज की तुलना में कम प्रकाशित होते थे इसलिए उस समय पाक्षिक और साप्ताहिक अखबारों की चर्चा भी काफी होती थी। चूंकि उस समय ऐसे अखबारों का प्रकाशन प्रायः वरिष्ठ पत्रकारों के द्वारा होता था। इसलिए विज्ञापनों की तुलना में इन अखबारों में पठनीय विषय सामग्रीका विशेष ध्यान रखा जाता था। उस समय अखबारों में समाचारऔर ज्ञानवर्धक लेख विज्ञापनों की तुलना में बहुतायत में प्रकाशित हुआ करते थे।
श्री ओंकार तिवारी जी का अखबार नर्मदा के स्वर एक ऐसा ही समाचार पत्र था जो कमर्चारियों और कृषकों की समस्यायों और गतिविधियों के लिए सक्रिय था। यह अखबार उस समय अपने बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक, साहित्यिक और आध्यात्मिक विषय सामग्री के प्रमुख प्रकाशन के लिए चर्चित समाचार पत्रों में से एक था। यह उल्लेखनीय है कि श्री ओंकार तिवारी जी ने इस समाचार पत्र का प्रकाशन अनेक कठिनाइयों के बीच किया लेकिन अपनी सिद्धांतवादी नीतियों और आदर्शों से समझौता नहीं किया इसका कारण भी शायद यह था कि श्री ओंकार तिवारी जी पूंजीवादी सभ्यता से हटकर बौद्धिकता और मानवीय संवेदना से ओतप्रोत एक ऐसे कृषक, कविऔर पत्रकार थे जिनकी सम्पूर्ण सोच सर्वहारा वर्ग के लिए ही समर्पित थी। कहने का मतलब यह कि नर्मदा के स्वर का प्रकाशन जितने समय तक संचालित किया गया उसने पाठकों के बीच अपनी लोकप्रिय पहचान बनाई।
स्मरणीय है कि श्रद्धेय श्री ओंकार तिवारी जी ने कृषक और पत्रकार के रुप में जितनी गौरवशाली पहचान बनाई उतनी ही प्रतिष्ठा उन्होंने कवि के रुप में भी अर्जित की थी। कवि सम्मेलनों में श्रोता उनकी कविताओं को अत्यंत सम्मान और उत्साह से सुना करते थे। हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में उनकी कविताओं का संग्रह धरती नाचे भी अपने समय में काफी पठनीय और लोकप्रिय सिद्ध हुआ।
मेरे अति प्रिय श्री मनीष तिवारी जी ने तुलसी जयंती के पावन अवसर पर नर्मदा के स्वर के तुलसी जयंती विशेषांक की प्रति सभी के अवलोकनार्थ जब प्रस्तुत की तो इस अखबार की अपने समय की गौरवशाली यादें ताजी हो गईं।
नर्मदा के स्वर और उसके संपादक श्रद्धेय भैया श्री ओंकार तिवारी जी का सादर स्मरण और शत शत प्रणाम।
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© श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







