डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ संस्मरण ☆ कोरिया के पहाड़ — जीवन का उत्सव ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

 प्रिय…

कभी-कभी जीवन में कुछ अनुभव ऐसे आते हैं, जो हमारी आत्मा में स्थायी रूप से बस जाते हैं। दक्षिण कोरिया में बिताए मेरे वे दिन आज भी मेरे भीतर किसी शांत संगीत की तरह गूँजते हैं — खासकर वे रविवार, जब पूरा देश मानो पहाड़ों की गोद में समा जाता था।

दक्षिण कोरिया में पहाड़ों पर सैर के लिए जाना एक अत्यंत सामान्य, बल्कि कहें तो जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है। यहाँ हर व्यक्ति — चाहे वह बुज़ुर्ग हो या बालक — अपने पीठ पर सैक टाँगे छुट्टी के दिन पहाड़ों की ओर निकल पड़ता है। जब मैं वहाँ अध्यापन करती थी, तो अक्सर अपने विद्यार्थियों को गृहकार्य देती “रविवार के दिन आपने क्या किया, इस पर दस पंक्तियाँ लिखिए।”

अगले दिन जब उनकी कॉपियाँ देखती, तो कम से कम पाँच विद्यार्थी “मैं अपनी माँ के साथ पहाड़ पर गया या गयी थी।” यह बात अवश्य लिखते। मुझे यह बहुत अजीब लगता, आखिर यह “पहाड़ पर जाना” क्या होता है? यही जिज्ञासा एक दिन मुझे भी पहाड़ की ओर ले गई।

कोरिया के इन पर्वतों की चढ़ाई केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव भी है। अधिकतर पहाड़ों की चोटी पर एक छोटा-सा बुद्ध विहार होता है, जहाँ पहुँचकर लोग प्रार्थना करते हैं, ध्यान लगाते हैं और फिर हँसते-खेलते नीचे लौट आते हैं। रास्ते भर प्रकृति का अनुपम सौंदर्य साथ चलता है — शीतल हवा, पथरीली ढलानों के बीच झरनों की नीरव सरगम, और हरियाली की अनगिनत छायाएँ। कोरियाई लोग इन झरनों के स्वच्छ जल को बोतलों में भरकर घर ले जाते हैं, मानो किसी पवित्र आशीर्वाद को साथ ले जा रहे हों। यहाँ के लोग प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं। वैसे, कोरियाई भाषा में ‘पहाड़’ को ‘सान’ कहा जाता है — और सच में, वहाँ का हर ‘सान’ मनुष्य और प्रकृति के मधुर संबंध का सजीव प्रतीक है।  कुछ नाम याद हैं, जैसे सोरोक्सान, तैबैक्सान, नामसान, दोबांग्सान।

नवंबर का महीना था — कोरिया में यह माह अपने पूरे रंग में था। पेड़ों पर हल्की-सी नर्मी, हवा में फूलों की गंध, और आसमान में नीली शांति पसरी थी। नए देश में, नई संस्कृति के बीच, मैं हर दिन कुछ न कुछ नया देख रही थी। इस समय कोरिया रंगबिरंगी पत्तों से भर जाता है। मानो पूरी धरती रंगों की प्रदर्शनी में बदल गई हो। इस समय बाकायदा सूचित किया जाता है कि किन पर्वों और उद्यानों में जाने से आप रंग बदलते पत्तों का दृश्य देख सकते हैं। कोरिया के सभी लोग इन दृश्यों का आनंद लेने के लिए पहुँच जाते हैं। इस समय पेड़ों के पत्ते अपने जीवन का अंतिम, सबसे सुंदर रूप धारण करते हैं। हर पत्ता जैसे जाने से पहले एक आख़िरी गीत गाना चाहता हो। क्यों कि इसके बाद पतझड शुरु होता है।

मेपल (Maple) के पत्ते गाढ़े लाल, सुर्ख़, और कहीं-कहीं बैंगनी रंग में रंग जाते हैं। वे हवा में झूमते हुए अंगारों जैसे लगते हैं — हल्की हवा चले तो लगता है कि लाल चिंगारियाँ उड़ी जा रही हों। गिन्को (Ginkgo) के पत्ते पीले से सुनहरे होते हैं। जब वे झरते हैं तो धरती पर पीले रेशम-सा कालीन बिछ जाता है। धूप पड़ने पर ये पत्ते झिलमिलाते हैं और रास्ते सोने की परत से ढके प्रतीत होते हैं। ऐसा लगता है मानो प्रकृति खुद अपनी विदाई के लिए एक उत्सव मना रही हो, और हर पेड़, हर पत्ता, उस अंतिम क्षण तक अपना सम्पूर्ण सौंदर्य बिखेर देना चाहता हो। कोरिया में प्रकृति के इस दृश्य का सभी आनंद उठाते हैं। इसलिए तो प्रो. किम ने मुझे इसी दौरान सान के लिए निमंत्रण दिया था।

एक रविवार को प्रोफेसर किम, मुस्कुराते हुए बोलीं, “आप भी हमारे साथ चलिए — सान पर।” “सान?” मैंने पूछा। वह हँसीं — “सान मतलब पर्वत। कोरियाई लोग उसे ऐसे ही पुकारते हैं।” और इस तरह मेरे जीवन का पहला कोरियाई सान मेरे सामने था। पर जिस दिन मैंने पहाड़ की ओर कदम बढ़ाए, उस दिन मैंने कोरिया की इस संस्कृति को शिद्दत से महसूस किया।

सुबह-सुबह हम निकले। मेट्रो से थोड़ी दूरी तक, फिर पैदल। शहर धीरे-धीरे पीछे छूटता गया और हवा में हरियाली घुलने लगी। रास्ते के दोनों ओर छोटे-छोटे जंगली फूल थे, और लोगों के चेहरों पर सहज उल्लास। कोई परिवार संग आया था, कोई अकेला — पर सभी में एक अद्भुत ऊर्जा थी, मानो हर कोई किसी पवित्र तीर्थ की ओर बढ़ रहा हो।

पहाड़ ऊँचा था। चढ़ते हुए मुझे महसूस हुआ — यह यात्रा केवल पैरों की तो है ही है, पर मन की भी परीक्षा है। प्रोफेसर किम सहज गति से ऊपर जा रही थीं, और मैं धीरे-धीरे पीछे रह जाती। आधे रास्ते तक पहुँचते-पहुँचते साँस फूलने लगी। वहाँ एक जगह बैठकर मैंने नीचे झाँका — शहर अब किसी चित्र की तरह दिखाई दे रहा था। दूर-दूर तक फैलती पहाड़ियों की श्रृंखलाएँ, उनके बीच से बहती धूप, और कहीं-कहीं झरनों की रजत रेखाएँ — मानो प्रकृति अपनी शांत लिपि में प्रार्थना लिख रही हो। मैंने वहीं रुकने का निश्चय किया। किम आगे बढ़ गईं, और मैं वहीं बैठी रही — पेड़ों के बीच, हवा के संगीत में, अपने भीतर कुछ सुनती हुई। शायद यही पहाड़ का जादू था  वह हमें भीतर की शांति से मिला देता है। फिर साहस बटोरकर एक एक सीढ़ि चढती आखरी मुकाम पर पहँच ही गयी… वहाँ हर पहाड़ की चोटी पर एक बुद्ध विहार होता है। इन बुद्ध मंदिर को कोरियाई भाषा में ‘सा’ कहा जाता है। जैसे ‘मोगोक्सा’, ‘जोग्योक्सा’, ‘बुलुग्सा’। कोरियाई लोककथाओं और शमन धर्म (Shamanism) में पर्वतों को देवता का निवास माना जाता है। कई पर्वतों पर “सानशिन” नामक पर्वत देवता की पूजा होती है।

पर्वतारोहण यहाँ केवल व्यायाम नहीं, बल्कि ध्यान, संवाद और आत्मानुभूति का माध्यम है।  वहाँ पहुँचकर लोग कुछ क्षण मौन रहते हैं, घंटियाँ बजती हैं, और हवा में शांति की तरंगें फैल जाती हैं। रास्ते में लकड़ी के छोटे विश्रामगृह हैं, जहाँ बैठकर चाय पीते हुए कोई भी पर्वत की गहरी साँसों को महसूस कर सकता है। फिर धीरे-धीरे वे नीचे उतरते हैं — हँसते, बातें करते, जीवन से भरे हुए। मानो उन्होंने ऊपर से कुछ पाया हो — कोई अदृश्य संतुलन, कोई नई ऊर्जा। ऊपर जाने के बाद देखा एक बहुत बड़ी पहाडी चट्टान में बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा खोदी गयी थी… लोग बाग उसके सामने श्रद्धा से, विनित होकर झुक रहे थे। वहाँ सिवा उस प्रतिमा के और कुछ था नहीं…. पर प्रकृति के मध्य वह प्रतिमा अपनी सादगी में भी खूबसुरत लग रही थी। काफी सारे फोटों खींचने के बाद हम धीरे धीरे उतर कर आए… उसका प्रभाव आज तक है।

उसके बाद मैं मोशा के साथ नाम्सान पहाड पर गयी थीं। यह पहाड सियोल के मध्य स्थित है.. और सबके दिल के करीब है। इसे “सियोल का रक्षक पर्वत” माना जाता था। इस पर्वत में टॉवर के पास की रेलिंगों पर हज़ारों रंग-बिरंगे “लव लॉक्स” लटके हैं — प्रेमी युगल यहाँ अपने नाम के ताले लगाकर प्रेम की अनंतता की कामना करते हैं।

मुझे लगा — यही तो जीवन का सार है। पहाड़ हमें सिखाते हैं कि ऊँचाई पर पहुँचने से अधिक महत्त्वपूर्ण है चढ़ाई का अनुभव — हर साँस, हर पसीने की बूँद में विकास की कहानी छिपी होती है। 

कोरियाई समाज में पहाड़ केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि आत्मिक जीवन का अंग हैं। वे हर पर्वत को एक जीवित अस्तित्व की तरह देखते हैं — जिसके पास देने के लिए कुछ है। यह भावना मुझे गहराई से छू गई। हम भारतीय भी तो अपने पर्वतों को देवता के रूप में पूजते हैं — हिमालय, गिरनार, अरावली — हर एक में एक कथा, एक आत्मा है। शायद इसी से मैं उन कोरियाई लोगों से एक अदृश्य सांस्कृतिक डोर से जुड़ गई थी।

उस दिन जब मैं नीचे लौटी, मेरे कदम थके थे, पर मन हल्का था। मैंने महसूस किया कि कोरिया के पहाड़ केवल शरीर को नहीं, आत्मा को भी नया आकार देते हैं। वहाँ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं, न कोई दिखावा — बस शांति, सहजता और प्रकृति से संवाद। मैंने अपने छात्रों की बात तब समझी — वो “पहाड़ पर जाना” दरअसल एक साधना थी, एक सैर नहीं। एक ऐसा अवसर जिसमें मनुष्य खुद से मिलने निकल पड़ता है। 

कोरिया में जीवन अनुशासित है, पर उसमें प्रकृति की सादगी भी बसी है। लोग अपने हर रविवार को पहाड़ों की गोद में बिताते हैं, जैसे कोई वादा निभा रहे हों — धरती से, हवा से, और अपने भीतर से। उनके लिए यह सैर नहीं, एक प्रार्थना है।

जब मैं भारत लौटी, तो अक्सर रविवार की सुबह कोरिया के उन पहाड़ों की याद आती — सीढ़ियों वाले रास्ते, झरनों का जल, और उस हवा का स्पर्श जो मन के भीतर तक उतर जाती थी। मुझे अब समझ में आता है — हर संस्कृति का अपना पर्वत होता है, जहाँ पहुँचकर मनुष्य अपने छोटेपन को महसूस करता है और उसी में उसकी महानता जन्म लेती है।

आज इतने वर्षों बाद भी, जब कभी जीवन की चढ़ाई कठिन लगती है, मैं मन ही मन उस कोरियाई पहाड़ को याद कर लेती हूँ। उसके सीढ़ीदार पथ, उसकी शीतल हवा, और वह मौन क्षण — जब मैंने स्वयं से कहा था —“आधी चढ़ाई भी पूरी यात्रा है, यदि दिल ने उसे जी लिया हो।”

तुम्हारी….

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©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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जगत सिंह बिष्ट
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Divik Ramesh
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बहुत सुंदर और प्रमाणिक चित्रमयी संस्मरण है। हार्दिक बधाई।