डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – स्वाद, स्मृति और संस्कृति ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

दुनिया के हर कोने में भोजन केवल भूख मिटाने का साधन नहीं होता, वह मनुष्य की स्मृतियों, परंपराओं और संस्कृति की सबसे गहरी परतों को भी जोड़ता है। जब मैं दक्षिण कोरिया पहुँची, तो मेरे भीतर केवल नए देश की उत्सुकता नहीं थी — बल्कि यह जिज्ञासा भी थी कि वहाँ की जीवन शैली कैसी होगी.. वहाँ स्वाद मुझे कैसे लगेगा… मैं अडजस्ट कर पाऊँगी भी या नहीं… पर दक्षिण कोरिया ने मेरे मन में हमेशा  के लिए एक स्थान बना लिया है… एक विशिष्ट स्थान। यह तो सभी जानते हैं कि भोजन किसी भी संस्कृति की आत्मा होता है, और शायद इसीलिए कोरिया के स्वाद ने मुझे वहाँ के समाज, अनुशासन और आत्मीयता से गहराई से परिचित कराया।

मैं जब दक्षिण कोरिया पहुँची थी, तब मेरे मन में वहाँ के भोजन को लेकर एक अजीब-सी जिज्ञासा और थोड़ी झिझक भी थी। क्योंकि कोरिया आने से पूर्व वहाँ के खान पान के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। किसी भी देश की संस्कृति का सबसे जीवंत परिचय उसके भोजन से ही होता है। कोरिया का भी भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक संबंध और आत्मिक अनुशासन का हिस्सा है। मुझे आज भी याद है—सियोल की एक ठंडी सुबह थी, जब मेरे कोरियाई सहकर्मियों ने मुझे पारंपरिक खाने के लिए निमंत्रित किया था। हम कोरियाई रेस्टारेंट में पहूँचे और वहाँ एक छोटे बैठे मेज़ के आस पास हम सब बैठ गए… एक एक कर कई सारे व्यंजन आए.. जिनके नाम तक मैं नहीं जानती थी…सुंदर सिरेमिक के बर्तनों से गरम गरम बाफ वाले व्यंजन जैसे सूप, सुपिया नूडल्स, कितने ही साईड डिश रखी गयी थीं…वैसे मैं कट्टर मांसाहारी नहीं हूँ… अधिकतर तो शाकाहार ही पसंद करती हूँ….मुझे जो खाना था वह मैंने खुशी से खा लिया… उस दिन मैंने देखा था कि कोरियाई अपनी खाद्य संस्कृति को लेकर काफी सतर्क और गंभीर होते हैं।

दक्षिण कोरिया का खान-पान “हंसिक” (Hansik) कहलाता है। यह केवल व्यंजन का नाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है। कोरियाई मानते हैं कि “भोजन ही औषधि है”..उनका सिद्धांत यही कहता है कि प्रकृति के पाँच तत्व (लकड़ी, अग्नि, पृथ्वी, धातु और जल) और पाँच स्वाद (मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा और तीखा) के बीच संतुलन से शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं। जब मैंने पहली बार यह सिद्धांत जाना, तो मुझे भारतीय आयुर्वेद की याद आई जहाँ “सत्त्व, रज और तम” के संतुलन को भोजन से जोड़ा गया है। शायद पूर्वी सभ्यताओं में भोजन के प्रति यह गहरी आस्था ही साझा धरोहर रही होगी।

मेरे पहले कोरियाई भोजन में किम्ची (Kimchi) थी, पत्तागोभी, मूली या अन्य सब्जियों का किण्वित (fermented) रूप देखकर मुझे अचार की याद आई, पर जैसे ही मैंने पहला कौर लिया, तीखापन और खटास का एक ऐसा संगम मिला कि मेरी आँखें नम हो आईं। लेकिन कुछ दिनों बाद मैंने महसूस किया कि किम्ची कोरियाई जीवन की आत्मा है। यह हर घर की शान है, हर मौसम में परोसी जाती हैं। सर्दियों से पहले किमजंग (Kimjang) नामक त्योहार मनाया जाता है, जब पूरा परिवार मिलकर किम्ची तैयार करता है। उसमें मिलती है पारिवारिक निकटता की गरमाहट जैसे भारत में अचार डालते समय घरों में रौनक होती है। किम्ची उनके जीवन में इतनी घुल मिल गयी है कि जब फोटो लिया जाता है तो ‘ओ किम्ची’ कहकर मुस्कुराते हैं.. जैसे हम ‘चीज़…’ कहते हैं। मेरा सौभाग्य था कि हम भारतीय शिक्षकों को एक बार किम्ची तैयार करनेवाले कारखाने की सैर करने का मौका मिला था.. वहाँ बनाने की सारी विधि अत्याधुनिक, साफ सुथरी थी…बनानेवाले लोगों ने सफेद कपड़े पहने थे ओर उनके हाथों में ग्लोवज् थे और फूर्ति से पर शांति से अपना काम कर रहे थे.. हमें देखकर प्रसन्न होकर झुककर “अन्योंग हासियो” कहते…यह कोरियाई अभिवादन है.. जैसे हम नमस्ते कहते हैं।

कोरिया में भोजन अक्सर साझा थालियों में परोसा जाता है। बंचान (Banchan) कहलाने वाले छोटे-छोटे व्यंजन मेज़ पर एक साथ रखे जाते हैं, सबके लिए समान रूप से। जब मैंने पहली बार यह व्यवस्था देखी, तो मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ।  भारत में जहाँ हर व्यक्ति की थाली अलग होती है, वहीं कोरिया में साझा करना आत्मीयता का प्रतीक है। उस क्षण मुझे लगा कि कोरियाई भोजन केवल स्वाद नहीं बाँटता, वह एकता का संदेश भी देता है कि परिवार, मित्र, सहकर्मी सब एक ही मेज़ के हिस्सेदार हैं।

कोरियाई लोग चावल को “भोजन का हृदय” मानते हैं। बाप (Bap) शब्द का अर्थ ही ‘भोजन’ और ‘जीवन’ दोनों होता है। मैंने देखा कि किसी का हाल पूछते समय वे कहते हैं, “क्या तुमने खाना खाया? “बाप मोगोस्योयो?” यह प्रश्न केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि आत्मीयता का भी प्रतीक है। वहाँ के पारंपरिक रेस्तराँ में बिबिम्बाप (Bibimbap) परोसा जाता है, चावल के ऊपर सजी रंग-बिरंगी सब्जियाँ, मांस और लाल मिर्च की चटनी, वह थाली मुझे किसी रंगीन चित्र-फलक जैसी लगी।

द. कोरिया में भोजन का सौंदर्यबोध भी महत्वपूर्ण है। बर्तन, रंग-संयोजन और परोसने की विधि तक में सौंदर्य का अनुशासन झलकता है। वे चॉपस्टीक्स का उपयोग कर जितनी फूर्ती से और तरीके से खाते है.. वह देखते ही बनता है। मैंने देखा कि पारंपरिक रेस्तराँ में व्यंजन इस तरह सजाए जाते हैं कि मेज़ एक कला-कृति ही सजीव हो उठती है। भोजन शुरू करने से पहले “जल मोक्गेस्सुम्नीदा” (Jal meokgesseumnida) कहा जाता है अर्थात् “मैं विनम्रता से भोजन करूँगा या करूंगी।” यह वाक्य उस संस्कृति का दर्पण है, जहाँ भोजन को ‘कृतज्ञता’ से जोड़ा गया है, न कि उपभोग से। जैसे हमारे यहाँ खाने से पूर्व प्रार्थना की जाती है…स्कूल में अथवा किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम में.. “वदनी कवळ घेता….अन्न हे पूर्णब्रह्म” मराठी में प्रार्थना की जाती है…।

कोरियाई संस्कृति में अकेले खाने को अच्छा नहीं माना जाता; मिल-बैठकर भोजन करना सामाजिक और आत्मिक संवाद का माध्यम है। इसलिए वे परिवारोंवालों के साथ, मित्रों के साथ मिलकर खाते हैं। वहाँ एक कहावत प्रचलित है “एक कटोरा चावल भी एक रिश्ता है।” यह कहावत कोरियाई जीवन-दर्शन को व्यक्त करती है — अगर किसी के साथ हमने एक कटोरा चावल भी साझा किया है, तो वह भी एक विशेष संबंध है। यह संबंधों की पवित्रता, भोजन के माध्यम से जुड़ाव, और साथ खाने के सांस्कृतिक मूल्य को दर्शाती है।उनके लिए भोजन केवल शरीर का नहीं, आत्मा का पोषण है — एक ऐसा दर्शन जो कहता है, “जैसे तुम खाते हो, वैसे ही तुम जीते हो।” जब मैं हमारे विश्वविद्यालय की अंग्रेजी के प्रोफेसर से बात कर रही थी.. जो लंबे समय से कोरिया में रह रही थी तो उन्होंने मुझे कहा था कि कोरियाई भोजन में होंग-सिओंग-सा’ (संतुलन, सामंजस्य और शुद्धता) की भावना प्रबल है। प्रत्येक थाली — हान-सिक’ — में पाँच रंगों (नीला, लाल, पीला, सफेद और काला) और पाँच स्वादों (मीठा, नमकीन, खट्टा, तीखा और कड़वा) का मेल होता है, जो पंचतत्वों और संतुलित दर्शन सिद्धांत (यिन-यांग सिद्धांत) का प्रतीक है। वैसे भारतीय शाकाहारी भोजन में भी यह संतुलन है।

कोरिया का खान-पान मौसम के अनुसार बदलता रहता है। सर्दियों में सामग्येतांग (Samgyetang) जिनसेंग और चिकन का सूप ऊर्जा देता है। गर्मियों में नैंगम्यन (Naengmyeon) ठंडी नूडल्स, शरीर को संतुलित रखती हैं। वसंत में ताजे फूलों और जड़ी-बूटियों से बने व्यंजन परोसे जाते हैं। यह लय मुझे भारतीय पर्वों की याद दिलाती है, जहाँ होली, मकर संक्रांति, पोंगल या ओणम के अवसर पर मौसम और भोजन का तालमेल देखने को मिलता है।

मुझे याद है एक रविवार के दिन मेरी एक अमेरिकन कुलिग मुझे अपने साथ एक चर्च लेकर गयी थी…वहाँ सुबह की प्रार्थना खतम होने के बाद भोजन का भी प्रबंध किया गया था… हम दोनों भोजन के लिए चली गयीं… वहाँ का वह देसी भोजन मुझे सबसे अच्छा लगा था… एक सुंदर बाऊल में स्टिकी चावल, एक प्लेट में किम्ची, एक प्लेट में सिरके वाले प्याज, गोल गोल काटी हुई मुली और बडे बडे से लहसून… और साथ में एक टोकरी नुमा प्लेट में ठेर सारे हरे हरे पत्ते थे… जो यहाँ के कद्दु के पत्तों की तरह थे… अब मेरी समझ के ये परे था इनका क्या करना है… फिर देखा हमारे साथ बैठे कोरियाई लोग उन हरे पत्तो को एक हाथ में लेते और उसमे एक कौर जितना स्टीकी चावल चॉपस्टीक से  उठाते उस पत्ते में रखते फिर उसमें किम्ची और एक लाल चटनी जिसे हम सिजवान चटणी कहते हैं… लगभग वैसी ही वह चटणी होती है… उस चावल पर रख देते..चावल पर पत्ता अच्छे से लपेटा जाता और फिर वह खाया जाता साथ में सिरके की मुली, लहसून, या  फिर प्याज…. वह इतना अच्छा शाकाहारी भोजन था कि मैं बहुत पसंद कर गयी… आज भी वह सारा दृश्य मेरी स्मृति में ज्यों का त्यों चित्रित है। वह सादा सा भोजने करने में भी कोरयाई लोगों का अनुशासन होता है… नज़ाकत होती है… हडबडी नहीं होती… हाँ.. जब वे चॉपस्टीक से गरम गरम नूडल्स सूडप सूडप कर खाते हैं… तो हम भारतीयों को अजीब ज़रूर लगता है। सियोल के आधुनिक रेस्टोरेंट्स में मैंने देखा कि पुराने स्वाद नए रूप में लौट आए हैं। कई युवा शेफ़ पारंपरिक व्यंजनों को आधुनिक प्रस्तुति में परोस रहे हैं, जैसे किम्ची टाको, गोचुजांग पास्ता या सोया सॉस आइसक्रीम। यहाँ का टोफू मुझे हमेशा पनीर की याद दिलाता था।

एक शाम हमने हान नदी किनारे बैठे हुए सड़क किनारे के ठेलों पर टॉकबोकी (Tteokbokki) खाई..मिर्चीदार चावल केक की वह सादी थाली मुझे किसी उत्सव जैसी लगी। साथ ही वहाँ एक युवा गायक गिटार बजा रहा था, भोजन और संगीत का वह संगम कोरियाई जीवन की आत्मा जैसा था।

कोरियाई भोजन में भावनाएँ बहती हैं। जब मैंने एक छात्रा की माँ के साथ घर पर खाना खाया, तो उसने बड़ी आत्मीयता से मेरे लिए किम्बाप (Kimbap) तैयार किया। किम्बाप यानि समुद्री शैवाल में लिपटा चावल, सब्जियाँ और अंडा — भारतीय रोल या सुशी जैसा। उसने कहा, “इसमें प्यार है, क्योंकि यह घर पर बना है।” मुझे लगा जैसे मुझे मेरी माँ के हाथ की रोटी मिली हो। भोजन का यह भावनात्मक रिश्ता हमें सिखाता है कि स्वाद केवल जीभ से नहीं, दिल से महसूस होता है।

कोरियाई भोजन के दौरान कुछ नियम हैं..वरिष्ठ व्यक्ति पहले खाना शुरू करते हैं, और सब उनका अनुसरण करते हैं। भोजन समाप्त होने पर सभी “जल मोगऑस्सुम्नीदा” कहते हैं, “धन्यवाद, मैंने अच्छा भोजन किया।” मुझे यह शिष्टाचार बहुत भाया, क्योंकि इसमें दूसरों के प्रति सम्मान का भाव है।

एक बार मैं विश्वविद्यालय के रात्रि-भोज में शामिल हुई थी, टेबल पर लगभग दसों प्रकार के व्यंजन थे, पर किसी ने हड़बड़ी नहीं की। हर कोई संयम और सामंजस्य के साथ खा रहा था। भोजन का यह अनुशासन मुझे भारतीय पारिवारिक संस्कारों की तरह ही लगा, जहाँ “सबके साथ खाना” ही सच्चा आनंद है। कोरियाई भोजन मुझे धीरे-धीरे समझ आया। उसमें  सादगी, संतुलन और सम्मान की त्रिवेणी धारा बहती है। हर व्यंजन के पार्श्व में अच्छे स्वास्थ्य का तत्व है और यह तत्व जीवन को सन्तुलन और साझा भावना का प्रतीक है। यह दर्शन शायद इसी कारण विकसित हुआ कि कोरिया सदियों तक प्रकृति के निकट रहा, और कठिन परिस्थितियों में भी सामूहिक जीवन को प्राथमिकता देता रहा।

भारत से आई हुई मैं जहाँ मसालों की विविधता और स्वाद का विस्फोट होता है कोरियाई भोजन की सूक्ष्मता देखकर चकित थी। भारतीय भोजन जहाँ “प्रकट भाव” है, वहीं कोरियाई भोजन “अंतर्यात्रा” जैसा है..धीरे-धीरे खुलने वाला, जैसे एक सुगंध जो समय के साथ गहराती जाती है।  कोरियाई भोजन का स्वाद लेने के लिए स्वाद को विकसित करना होता है… तभी उसका आनंद लिया जा सकता है।

यदि कोरिया के भोजन का दिल घरों और रेस्तराँ में है, तो उसकी आत्मा ग्रामों और गली कूचों में धड़कती है। सर्दियों की ठंडी शामों में जब मैं सियोल में मेट्रों के आसपास घूमती थी, तब स्टेशन के पास या नुक्कड़ से उठती भूने आलू, उबले मक्के और शक्करकंद की खुशबू मुझे अपने बचपन की स्मृतियों में ले जाती थी। सड़क किनारे लगे छोटे ठेले, लाल तंबुओं के नीचे बैठे लोग, और भाप उड़ाते तवे पर पकता भोजन वह दृश्य भारत की ‘खाऊ गली’ से कम नहीं लगता। एक हाथ में गर्म गुनगुना मक्का, दूसरे में हॉट्टोक (मीठी सिरप भरी रोटी) या भुना गोगुमा (शक्करकंद) लिए चलो तो वह स्वाद जैसे सर्दी की रात में किसी पुराने गीत की गर्माहट देता। इन गलियों में चलते हुए मैंने समझा कि भोजन साझा भाषा का माध्यम है जहाँ अनजान लोग भी एक-दूसरे के साथ मुस्कुराकर देखते हैं।

कोरियाई भोजन की दुनिया में शाकाहार और मांसाहार दोनों ही संतुलित रूप से उपस्थित हैं। भारत से आने के कारण मुझे मांसाहारी व्यंजनों को लेकर हिचक थी। कोरियाई लोग बार्बेक्यू शैली में भूना गया पोर्क बड़े चाव से खाते हैं। एक बार जब हम सारे टिचर्स छात्रों के साथ पिकनिक पर गए थे तो देखा की छात्रों ने अंगिठी जलायी और पोर्क का बार्बेक्यू करना शुरु हुआ… छात्र और शिक्षक मिलकर सोजू (कोरियन शराब) के साथ पोर्क का आनंद उठा रहे थे। तब मुझे लगा कि वहाँ मांसाहार का स्वाद वे कितने खुशी से लेते है। लोग मेज़ के चारों ओर बैठकर मांस को स्वयं ग्रिल करते हैं, फिर उसे पेरिला या लेट्ट्यूस के ताजे पत्तों में लपेटकर खाते हैं साथ में थोड़ा स्टीकी राइस (चिपचिपा चावल), किम्ची, और लहसुन-मिर्च की तीखी चटनी।

सर्दियों में सबका प्रिय किम्ची जिजिगे (Kimchi Jjigae),  यानी किम्ची का गरम सूप। कड़ाही में किम्ची, टोफू, हरे प्याज़ और मसाले उबलते हैं जिसकी एक सुगंध फैल जाती है। कोरियाई मित्र कहते थे, “यह सूप आत्मा को गरम कर देता है।” यह सूप केवल पेट नहीं भरता, बल्कि भावनाओं को सहेजता है जैसे भारत में माँ दाल का छौंक लगाकर कहती है, “थोड़ा और ले लो।”

कोरियाई खान-पान की यात्रा तब अधूरी रहती है जब तक मक्गोली (Makgeolli) की बात न की जाए। यह चावल से बनी हल्की, दूधिया रंग की पारंपरिक शराब है, जो प्राचीन काल से किसानों का पेय रही है। यहाँ एक शिष्टाचार है कि अगर कोई बुजुर्ग आपको मक्गोली के लिए पूछता है तो उसे नकारा नहीं जाता उसके सम्मान में उनके सामने ही उसका कम स कम एक घूँट तो पीना ही है। मैंने अक्सर छात्रों को अपने शिक्षक के सामने मक्गोली की घूँट लेते देखा पर वह लेने का तरीका अलग होता वे एक ओर चेहरा कर अपनी हथेली की आड में उसका घूँट लेना  है. मुझे अजीब लगता पर बाद में उनके इस शिष्टाचार का पता चला। जब सब लोग एक मेज़ पर बैठकर भोजन साझा करते हैं तब सूप के प्याले या चावल की मक्गोली की एक घूँट ऐसी सामूहिकता बनती है जो शब्दों से परे है।

दक्षिण कोरिया में भोजन केवल स्वाद नहीं, एक संस्कृति-संवाद है, जहाँ हर निवाला अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ता है। और शायद इसी कारण कोरियाई खाद्य संस्कृति मेरे भीतर एक गहरा भाव उठाती है कि स्वाद, स्मृति और संस्कृति ये तीनों जीवन के सबसे सुंदर रूप हैं, और मैंने उन्हें कोरिया में रहते गहरे तक अनुभूत किए हैं।

*********                          

©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

1 Comment
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
Dr Karunalakshmi K S

पढ़कर बडाअच्छा लगा। शब्दों का चयन, भावों का महा संगम