डॉ प्रतिभा मुदलियार
☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – कोरिया के सांस्कृतिक उत्सव ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆
हर संस्कृति की आत्मा उसके उत्सवों में बसती है। उत्सव केवल तिथियों या परंपराओं के प्रतीक नहीं होते, वे जीवन की गति, सामाजिक संबंधों की ऊष्मा और मानवीय संवेदना के स्पंदन हैं। भारत जैसे बहुरंगी देश में जन्म लेने के बाद जब मुझे दक्षिण कोरिया जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में कुछ वर्ष बिताने का अवसर मिला, तब मैंने महसूस किया कि संस्कृतियाँ भले भिन्न हों, पर उत्सवों का मर्म एक ही होता है, मानवीय सौहार्द! यह संस्मरण उन्हीं दिनों का है, जब मैं अपने देश के त्योहारों को याद करते हुए कोरिया के पर्वों में उस आत्मीयता की तलाश कर रही थी जो हर उत्सव को अर्थ देती है।
भारत उत्सवों का देश है। जैसे ही श्रावण समाप्त होता है, वैसे ही पर्वों और उत्सवों की श्रृंखला प्रारंभ हो जाती है। लगभग हर महीने कोई न कोई त्योहार हमारे जीवन को रंगीन बना देता है। किंतु जब मैं कोरिया में थी, तो मुझे अपने देश के इन परिचित त्योहारों की याद बार-बार आती थी। वहाँ रहकर मैं अपने देसी त्योहारों को तो मिस करती ही थी, पर साथ ही कोरियाई संस्कृति के उत्सवों में सम्मिलित होकर एक नया, मनोहर अनुभव भी अर्जित कर रही थी।
कोरियाई संस्कृति को समझने का सबसे सुंदर तरीका वहाँ के लोगों के साथ रहना, उनके साथ उठना-बैठना और उनके बीच जीना है। हांकुक यूनिवर्सिटी ऑफ फोरन स्टडीज़, सियोल में अध्यापन के दौरान हमारे छात्र-छात्राएँ हमें इस दिशा में कई अवसर प्रदान करते थे। उनके साथ किसी उत्सव में जाना या शहर के किसी सांस्कृतिक आयोजन में भाग लेना, न केवल मनोरंजक होता था बल्कि यह उनकी संस्कृति को भीतर से समझने का अवसर भी देता था।
वैसे कोरिया की यात्रा और वहाँ रहना सुविधाजनक है — हर जगह मेट्रो से पहुँचा जा सकता है। मेट्रो का नक्शा समझ लो तो पूरा सियोल शहर मानो आपकी मुट्ठी में आ जाता है।
तीन वर्षों के प्रवास के दौरान मैं अपने घर के प्रमुख त्योहार गणेश चतुर्थी और दीपावली पर भारत नहीं लौट सकी। हालांकि, सियोल स्थित भारतीय दूतावास में दीपावली का भव्य आयोजन होता था। पटाखे फोड़ने के लिए कोरिया सरकार विशेष स्थान उपलब्ध कराती थी। विदेश में रहते हुए भी दीपावली का उत्सव वहाँ की सर्द हवा में एक गरमाहट भर देता था, परंतु कोरिया के अपने उत्सव भी किसी आनंद-उत्सव से कम नहीं थे।
एक दिन विश्वविद्यालय पहुँची तो देखा पूरा परिसर उत्सव के रंग में डूबा है। छात्र-छात्राएँ तरह-तरह के परिधान धारण किए हुए थे.. कोई कार्टून चरित्र बना था, कोई मुखौटा लगाए नाच रहा था। सबसे आकर्षक था – पांडा, टेडी बेयर और मिकी माउस का वेश। मैं जैसे ही कैंपस में दाख़िल हुई, एक पांडा आगे आया और बोला, “हेलो केसोनिम!” (नमस्ते, मैडम!) मैं पल भर को पीछे हटी, फिर हँस पड़ी। मेरे साथ दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. आर सी. शर्मा और प्रो. खन्ना थे… प्रो. शर्मा जी को फोटोग्राफी काफी शौक है… वे अपने साथ हमेशा डिजीटल कैमेरा लिए चलते थे… उस दिन उन्होंने यह पल कैमरे में कैद कर दिए थे। बाद में पता चला कि यह सब ‘एंडोंग इंटरनेशनल मास्क फेस्टिवल’ के उपलक्ष्य में था — एक ऐसा आयोजन जिसमें लोकनृत्य, मुखौटे और सांस्कृतिक परंपराएँ मिल-जुल जातीं और हमें अनुभवसंपन्न बना देती थी। वसंत और पतझड़ के मौसम में दक्षिण कोरिया में लगभग हर सप्ताहांत किसी न किसी स्थान पर कोई उत्सव होता ही रहता है। यह पर्व विशेष रूप से मुखौटे-नृत्य की परंपरा और रंगों की छटा के लिए प्रसिद्ध है।
परंतु जो उत्सव मेरे मन में सबसे गहराई तक अंकित हुआ, वह था ‘सियोलाल’ कोरिया का ‘चंद्र नववर्ष’। मैं औj मोशा अपने कुछ छात्रों के साथ उस रात उस उत्सव का जानने के लिए गए थे। हमने गर्म जैकेट और टोपी पहन ली थी.. हैंडग्लोज भी पहन लिए थे… रात का समय था…ठंड काफी थी… पर हमने कहा चलते हैं और चल भी पड़ें… मोशा के रहते मैं निश्चिंत रहती थी… यह पर्व पारिवारिक पुनर्मिलन और पैतृक संस्कारों का है। उस दिन मैंने सियोल के बोकसुन घंटाघर चौक में लोगों का उमड़ता सागर देखा। ठंडी रात में लोग रंगीन ‘हानबोक’ पहने एकत्र हो रहे थे। बच्चों की आँखों में उत्साह की चमक थी, बुज़ुर्गों के चेहरे पर एक निरीह शांति थी। जैसे ही मध्यरात्रि का समय हुआ, घंटा जोर से बज उठा — उसकी गूँज पूरे चौक में फैल गई। लोग एक-दूसरे को “सेबे” करते हुए नववर्ष की शुभकामनाएँ देने लगे। ‘सेबे’ का अर्थ है..झुककर सम्मानपूर्वक अभिवादन करना। यह मुख्य रूप से बुज़ुर्गों या परिवार के वरिष्ठ सदस्यों को नववर्ष की शुभकामनाएँ देने के लिए किया जाता है।
उस रात सबके बीच एक अनकही भाषा थी — मुस्कान, हाथ मिलाना, नए साल की खुशी — शब्द कम थे पर भाव गहन गहरे थे। यह क्षण इतना आत्मीय था कि लगा, जैसे किसी अदृश्य सूत्र से सबके हृदय बँधे हों। जहाँ तक मुझे याद है…शायद किसी छात्रा ने ही मुझे यह बात बतायी थी.. इस रात में चंद्रमा की रौशनी और झरती बर्फ में रात के समय कोई खास महल है उसके प्रांगन में प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे से प्रेम का इज़हार करते हैं तो उनका प्रेम सफल हो जाता है… इस लिए कई प्रेमी युगल उस रात उस महल के पास गलबाहियाँ डाले पहुंचते हैं….पता नहीं यह कितना सच है… मुझे इस प्रकार की कहानियाँ सुनने के बाद अक्सर लगता कि.. देश हो या विदेश इस प्रकार की कहानियाँ तो मिल ही जाती हैं… अंततः मनुष्य की भावभूमि तो एक ही है न!
कुछ ही महीनों बाद मेरी सहकर्मी मोशा ने कहा — “मेरे छात्रों ने ‘चुसोक’ के लिए हमें उनके घर निमंत्रित किया है, तुम भी चलो।” चुसोक कोरिया का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है — कुछ वैसा ही जैसा भारत का पितृपक्ष या इसाइयों का थैंक्सगिविंग। उस समय पूरे देश में छुट्टियाँ होती हैं और हर व्यक्ति अपने गाँव लौटता है। मैं ने ‘हाँ’ कही.. और उसके साथ जाने के लिए तैयार हो गयी। हम कैब से उनके गाँव पहुँचे। गाँव कहने को था, पर सुविधाओं में किसी शहर से कम नहीं। वहाँ हमें छात्रों के परिवार ने आत्मीयता से अपनाया। घर में सब ‘सोंगप्योन’ (चावल के अर्धचंद्राकार केक) बना रहे थे। हम भी उनके साथ बैठ गए — चावल के आटे में मीठी दाल और तिल भरते हुए मुझे अपनी दिवाली की रातें याद आ गयीं, जब हम घर पर गुजिया बनाते थे।
दूसरे दिन हम सब फल (खास कर नाशपाति), सोंगप्योन, वाइन, मांस आदि साथ लेकर एक छोटी-सी पहाड़ी पर गए। वहाँ उस परिवार के पूर्वजों की कब्रें थीं। पर्व के एक दिन पहले घर के पुरुषों ने वहाँ जाकर साफ-सफाई कर दी थी। हम जब पहुँचे तो कब्रें फूलों से शोभायमान थीं। वहाँ लायी हुई चीजें पूर्वजों की कब्र के सामने रख दी गईं। शांति से प्रार्थना की गई; भोग चढ़ाया गया; अगरबत्तियाँ और मोमबत्तियाँ जलाई गईं। सर्वत्र श्रद्धा थी, आत्मीयता थी, बहुत कुछ था जिसे शब्द कम कह पाते हैं। जहाँ गंभीरता थीं वही एक सुखद भाव भी था। इसमें हर छोटा व्यक्ति बड़े व्यक्ति के सामने झुककर अभिवादन कर रहा था… वहाँ सबसे बड़ी बात यह लगी रिश्तों में एक गरिमा थी.. बड़ों के प्रति आदर और सम्मान था… कहीं भी फूहड़ता नज़र नहीं आ रही थी।
यह त्योहार मुझे अपने पितृपक्ष की पूजा जैसा लगा था। यह देखने के लिए, अनुभव करने के लिए, और समझने के लिए था कि कैसे कोई संस्कृति अपने पूर्वजों के प्रति आभार व्यक्त करती है, और उस आभार को उत्सव में बदल देती है।
वसंत ऋतु में सियोल की गलियाँ जब हज़ारों दीयों से जगमगाने लगती हैं, तब मन को शांति और प्रकाश का अनुभव होता है। Yeondeunghoe योंदुन्ह्वे या योंदेंगहोए यह शब्द “लैम्प फेस्टिवल” (दीप उत्सव) के लिए प्रयोग होता है, जिसमें बुद्ध के जन्म दिवस पर हज़ारों लालटेनें जलाई जाती हैं। इसका अनुभव कराने के लिए एक कोरियाई कवि ‘ली यंगची’ ने हमें निमंत्रित किया था और मैं प्रो.गर्गेश जी के साथ लोटस लैंटर्न फेस्टीवल देखने के लिए गयी थी। उस दिन लोग रंग-बिरंगे कमलाकार दीप बनाकर सड़कों पर लगाये थे। मैंने देखा था, छोटे बच्चे अपने हाथों में दीप लेकर बुद्ध मंदिरों की ओर जा रहे थे; उनके चेहरों पर आनंद की अनोखी आभा थी। उस क्षण लगा कि यह त्योहार केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आत्मा को आलोकित करने वाला उत्सव है। सारा शहर ऐसे दीपों से सजा था। रात के समय जब दीपों की लालिमा फैली थी, ऐसा लगा जैसे कोरिया की शहरी रफ्तार भी ठहर गयी है और हम सब दीपों की रोशनी में कुछ और उजास भरे हो गये हैं। जिस तरह भारत में दीपावली के समय शहर में रोशनाई होती है लगभग वैसे ही… पर यहाँ विशेषकर कमल दीप होते हैं.. जो सड़कों पर ऊपर लगे रहते हैं।
इन सब त्योहारों में आनंद देनेवाला एक और उत्सव था चेरी ब्लॉसम! दरअसल, दक्षिण कोरिया में वर्ष भर अनेक उत्सव होते रहते हैं। वसंत में आनेवाले इस Cherry Blossom Festival में पूरा कोरिया गुलाबी-सफेद फूलों से भर जाता है। यह कोरिया का सबसे बड़ा वसंत उत्सव है, जो हर साल लाखों से ज़्यादा टुरिस्ट्स को आकर्षित करता है। ‘बुसान’ और ‘जिन्हे’ में यह उत्सव अत्यंत सुंदर होता है। कहते हैं कि जेजु द्वीप पर ये फूल सबसे पहले खिलते हैं। पुरा पेड गुलाबी रंग से सज जाता है। एक भी हरा पत्ता नज़र नहीं आता। सियोल में ‘हान’ नदी के किनारे हज़ारों चेरी के पेड़ खिलते हैं। शाम को, पेड़ों पर रोशनी की जाती है, जिससे यह एक रोमांटिक नज़ारा बन जाता है। कोरियाई संस्कृति में, चेरी ब्लॉसम नवीनीकरण और वसंत के आगमन का प्रतीक हैं। इनके खिलने का छोटा सा समय जीवन की क्षणिक सुंदरता को दर्शाता है, जो लोगों को हर पल का आनंद लेने के लिए प्रेरित करता है। कोरिया में चेरी ब्लॉसम का इतिहास सौंदर्य, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा है। प्राचीन सिल्ला राज्य के समय से वसंतोत्सवों में यह फूल जीवन के क्षणभंगुर सौंदर्य का प्रतीक रहा है। कोरिया में जापानी उपनिवेश काल में जापान ने चेरी ब्लॉसम वृक्षों को अपने सांस्कृतिक प्रभुत्व के प्रतीक के रूप में लगाया था, जिससे यह विवादित प्रतीक बन गया। अतः कई जगहों पर जापानियों ने लगाए वृक्षों को काट दिया गया। किंतु स्वतंत्रता के बाद कोरियाई वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया कि इन फूलों की प्रजाति वास्तव में जेजू द्वीप की स्वदेशी प्रजाति है, जिससे यह फूल पुनः कोरिया की पहचान बन गया। आज सियोल के योइदो, जिन्हे, ग्योंगजू और जेजू में होने वाले इस उत्सव में वसंत, पुनर्जन्म और प्रेम के उत्सव बन चुके हैं, जहाँ लाखों लोग गुलाबी-सफेद फूलों की वर्षा में जीवन की नई शुरुआत का आनंद लेते हैं।
दक्षिण कोरिया के गुॠ (Gurye) क्षेत्र की यात्रा मेरे लिए स्मरणीय बन गई। हम उस सप्ताहांत पर कवि किम यांग-शिक और कुछ कोरियाई कवयित्रियों के साथ एक साहित्यिक कार्यक्रम में गए थे। उसी दिन तय हुआ था कि पास ही स्थित जिरिसान (Jirisan) पर्वत की तलहटी में, सैंडोंग-म्यॉन (Sandong-myeon) के गाँवों के बीच बसे उस प्रसिद्ध मानबोकदै (Manbokdae) पहाड़ी तक भी जाएंगे, जो हर वसंत ऋतु में सांसुयू (Sansuyu) — यानी Cornelian cherry — के पीले फूलों से ढलानों तक ढक जाती है। जब हमारी कार उस ओर मुड़ी, तभी खिड़की से झाँकते ही मेरी दृष्टि उस सुनहरी पहाड़ी पर ठहर गई। पूरा पर्वत मानो पीले फूलों की चादर ओढ़े किसी दिव्य आलोक में नहा रहा था — मन एक क्षण को ठिठक गया। ऊपर पहुँचने पर पहाड़ी का वह लुभावना दृश्य और भी सजीव हो उठा। वहीं समीप कुछ पुरानी समाधियाँ थीं, और उनके पास एक कोरियाई कलाकार ने पारंपरिक हानबोक के सफेद परिधान में नृत्य प्रस्तुत किया। उसकी गतियाँ हल्की और लयपूर्ण थीं, किंतु उसके नृत्य के गीतों में एक मर्मस्पर्शी शोक-ध्वनि थी, जैसे फूलों के इस उल्लास के बीच इतिहास का कोई मौन दुःख बह रहा हो। उस क्षण में नृत्य, फूल, पहाड़ी और शांति सब मिलकर एक गहरी, अव्यक्त अनुभूति बन गए, जो आज भी मन के किसी कोमल कोने में वैसे ही खिले हैं, जैसे उस दिन पहाड़ी पर सांसुयू के पीले फूल।
एक और मज़ेदार बात… कोरिया में प्रेम के उत्सव भी कितने सुसंस्कृत और सूक्ष्म भावनाओं से भरे होते हैं। फरवरी का महीना जैसे ही आता, शहर की गलियों में चॉकलेट की सुगंध और लाल पैकिंग पेपरों की चमक फैल जाती। वैलेंटाइन डे के दिन लड़कियाँ अपने प्रिय को चॉकलेट और उपहार देकर अपने स्नेह का इज़हार करतीं हैं और फिर एक महीने बाद, अर्थात् 14 मार्च को श्वेत दिवस ( व्हाईट डे) पर वही लड़के सफ़ेद रिबन से सजे उपहार देकर उस प्रेम का प्रत्युत्तर देते हैं। पर मुझे सबसे रोचक लगा 14 अप्रैल को मनाया जानेवाला ‘ब्लैक डे’ … जिन्हें किसी ने चॉकलेट नहीं दी, वे सभी एक साथ हँसते हुए ‘जाजांगम्योन’ यानी ब्लैक बीन नूडल्स खाते। ब्लैक डे सिंगल्स के लिए खुद को सेलिब्रेट करने का दिन है। ये लोग अपने सिंगल होने का जश्न मनाते हुए दोस्तों के साथ मस्ती भरा समय बिताएँगे। काले कपड़ों में, हल्की हँसी और नूडल्स की भाप के बीच, जैसे सब यह स्वीकारते कि अकेलापन भी उत्सव का एक रूप हो सकता है।
इन उत्सवों ने मेरे प्रवास को और समृद्ध किया न सिर्फ संस्कृतियों को देखने का अनुभव बल्कि उनकी बहुविधता को महसूस करने का अवसर मिला।
इन सब अनुभवों के बीच मैंने महसूस किया कि चाहे भारत हो या कोरिया उत्सवों का सार एक ही है: परिवार, प्रेम, कृतज्ञता और आत्मीयता। कोरिया ने मुझे यह सिखाया कि संस्कृतियाँ भले अलग हों, पर मनुष्यता का उत्सव हर जगह एक-सा होता है।
जब भी मैं दीपावली के दीए जलाती हूँ, मुझे सियोल की गलियों में जगमगाते कमलदीप याद आते हैं दोनों की रोशनी एक ही बात कहती है: प्रेम, प्रकाश और मानवता की डोर सबसे बड़ी संस्कृति है। मेरे कोरिया-भ्रमण ने यह अनुभव मुझे दिल से दिया कि हम सभी, चाहे किसी भाषा-भूमि, संप्रदाय, देश से हों, उसी उत्सव-मंजरी के हिस्सेदार हैं जहाँ हम मानवता के लिए झूमते हैं।
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© डॉ प्रतिभा मुदलियार
पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006
306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक
मोबाईल- 09844119370, ईमेल: mudliar_pratibha@yahoo.co.in
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







रोचक, आनंददायक एवं सार्थकता से परिपूर्ण संस्मरण। साधुवाद!
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