डॉ प्रतिभा मुदलियार
☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – कोरिया में मेरी पहली बर्फ ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆
कोरिया की सर्द शामें वैसे तो अपने आप में ही खास होती हैं। यहाँ तापमान कई बार –15 डिग्री तक भी उतर जाता है। मैं भारत के दक्षिणी भाग से हूँ, जहाँ सर्दी बस एक हल्की-सी दस्तक देती है। ऐसे में इतनी कठोर ठंड का अंदाज़ा भी नहीं था। शुरुआत में कोरिया की यह सर्द हवा मेरे लिए प्रहार जैसी लगती थी..पर समय बीतते-बीतते शरीर ही नहीं, मन भी इस मौसम के साथ तालमेल बिठाने लगा। धीरे-धीरे मुझे भी इस ठंडी हवा का राग सुनाई देने लगा।
यहाँ एक सुंदर परंपरा है..पहली बर्फ, “फर्स्ट स्नो” का उत्सव। लोग इसे शुभ मानते हैं, उत्साह से जीते हैं, और अक्सर एक-दूसरे को बुलाकर साझा भी करते हैं। मुझे याद है, ऐसी ही एक कड़कड़ाती रात में मैं गहरी नींद में थी। तभी दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई। पहले तो मैं घबरा ही गई कि इस समय कौन हो सकता है। मैंने आई-होल से झाँककर देखा—सामने वाले फ्लैट में रहने वाली अंग्रेजी की प्रोफेसर खड़ी थीं।
दरवाज़ा खोला तो मेरे चेहरे पर सवाल थे और उनके चेहरे पर बच्चों-सा उत्साह। बिना कुछ समझाए उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा, और लगभग खींचते हुए बोलीं, “Come! This is the first snow of the year!”
मैं हड़बड़ाई हुई उनके साथ बाहर आई। तभी देखा—एक-एक कर पूरे फ़्लोर के लोग बाहर निकल रहे थे। सबके चेहरे पर वही आश्चर्य, वही खुशी, वही मासूम चमक थी… जैसे अचानक पूरी इमारत किसी त्यौहार में बदल गई हो।
आसमान से हल्के, चमकते हुए कण गिर रहे थे। पहले तो मुझे लगा जैसे कोई धुंध का गुबार उड़ रहा हो। फिर एहसास हुआ…यह बर्फ थी… सियोल की मेरी पहली बर्फ।
सफ़ेद फुहारे हवा में तैरते हुए धीरे-धीरे नीचे उतरते थे, मानो शहर को किसी कोमल, पारदर्शी स्वप्न में ढक रहे हों। पेड़ों की शाखाओं पर रुई-सी परत जमने लगी थी। सड़कें और पुल किसी धीरज भरे मौन में बदल गए थे। ठंड चुभ रही थी, पर वातावरण का सौंदर्य हर एहसास को हल्का कर रहा था।
कुछ ही देर में वह साधारण-सी रात उत्सव में बदल गई…अंग्रेज़ी गीत बजने लगे, सबने तालियाँ बजाईं, नाच किया, और हँसी-खुशी उस पहली बर्फ का स्वागत किया। मेरे हाथ ठंड से सुन्न हो रहे थे, पर दिल में एक गर्माहट भर रही थी…ऐसी गर्माहट जो केवल आत्मीयता से मिलती है।
फिर किसी ने सुझाव दिया, “Let’s eat ice cream! It’s fun in the snow!” मैंने सोचा था मज़ाक है, पर सचमुच… हम सबने उसी बर्फ में खड़े होकर आइसक्रीम खाई। पहली बर्फ पर आइसक्रीम…यह अनुभव जितना अजीब लगता है, उतना ही अनोखा और अविस्मरणीय था।
उस रात ऐसा लगा मानो मैं किसी विदेशी देश में नहीं, बल्कि किसी ऐसे परिवार का हिस्सा हूँ जो मौसम की पहली कोंपल पर भी साथ मिलकर खुश होना जानता है। पहली बर्फ की वह चमक, वह ठंड, वह हँसी आज भी मेरी स्मृति में उसी तरह ताज़ा है, जैसे उस रात आसमान से गिरती हर बर्फ की फुहार। रात में मैंने अपने कमरे की खिडकी से देखा था कि सफ़ेद फुहारे हवा में तैरते हुए धीरे-धीरे नीचे उतर रहे थे, मानो पूरा शहर किसी पारदर्शी स्वप्न में डूबता जा रहा हो। काफ़ी देर तक अकेले ही उसका आनंद लेती रही फिर मैं भी लिहाफ ओढकर सो गयी। सुबह कॉलेज जाना था। भले ही कितनी ही बर्फ हो या ठंड यहाँ कोई अपनी ड्युटी से मूँह नहीं फेरता…इनका वर्क कल्टर अनुकरणीय।
सुबह जब मैं तैयार होकर कॉलेज जाने के लिए बाहर निकली देखा पेड़ों की शाखाएँ रुई-सी परतों से लकदक हो रही थीं। सड़कें धीमे-धीमे चाँदी-सी चमक रही थीं। कारों की छतें, बोनट, विंडशील्ड सब पर बर्फ की मुलायम चादर जमती जम गयी थी। मानो हर कार रातभर में बूढ़ी होकर सफ़ेद बालों वाली हो गई हो।
रात की बर्फ बारी में सड़कें इतनी ढँक गईं कि रास्ता ही मिट चुका था। लोगों के घरों के सामने की सीढ़ियाँ, पोर्च, फुटपाथ सब बर्फ से भरे पड़े थे। सुबह होने पर इन्हें साफ़ करना होता है—सब अपने-अपने घरों के सामने नमक का पाउडर डालते हैं। नमक बर्फ को पिघला देता है, और धीरे-धीरे नीचे की काली सड़क फिर दिखने लगती है। कई बार पड़ोसी मिलकर इसे साफ करते हैं—कोई झाड़ू से बर्फ हटाता है, कोई लोहे की फावड़ी से कुरेदता है, और कोई पीछे से नमक बिखेरता जाता है। उस समय सबके बीच एक अनकहा-सा सहयोग, एक सौहार्द बहता रहता है।
मैंने देखा कि पूरी कॉलोनी, पूरा इलाका एक ही रंग में ढल जाता है—सफेद। छतें सफेद, पेड़ सफेद, कारें सफेद, यहाँ तक कि छोटी-सी झाड़ी भी। ऐसा लगता है मानो प्रकृति ने रातोंरात दुनिया को किसी श्वेत चित्र में बदल दिया हो।
सबसे अजीब बात यह होती है कि इतनी ठंड के बावजूद हवा में एक हल्की-सी गरमाहट महसूस होती है। जैसे बर्फ गिरते समय हवा थोड़ी थम जाती है… उसकी नुकीली ठंडक सुस्त पड़ जाती है। वातावरण शांत, स्थिर और किसी गहरे सुख में डूबा हुआ लगता है। जैसे शहर ने एक लंबी, धीमी साँस भर ली हो।
रात की बर्फबारी ने माहौल को उत्सव में बदल दिया था—हँसी, संगीत, आइसक्रीम और पहली बर्फ का जादू। पर अगली सुबह दृश्य अलग ही था। छोटे-छोटे बच्चे बर्फ के गोले बनाकर एक-दूसरे पर उछाल रहे थे। उनकी हँसी हवा में किसी चाँदी की झंकार की तरह फैल रही थी। पल भर को लगा कि मुझे भी उनके साथ बच्चा बनकर खेलना चाहिए… बर्फ को हाथ में लेकर उसे हवा में उछाल दूँ, जैसे रात ने मुझे सिखाया हो कि आनंद उम्र का मोहताज नहीं होता।
पर फिर घड़ी ने याद दिलाया—सुबह 7:20 की बस लेनी थी, और दो घंटे की यात्रा कर के योंगिन कैंपस पहुँचना था। पहला ही लेक्चर था… जिम्मेदारी पुकार रही थी।
मेरे हाथ ठंड से सुन्न हो रहे थे, पर दिल में एक कोमल-सी गर्माहट घुली हुई थी—वह गर्माहट जो पहली बर्फ के जादू से आती है, जो अनजान देश को अपना-सा बना देती है, जो थोड़ी देर के लिए जीवन की गंभीरता को पिघला देती है।
बस में बैठकर मैंने खिड़की का शीशा हल्के से पोंछा। बाहर पूरा शहर सफेद चादर में लिपटा था—सड़कें, छतें, कारें, पेड़, कुछ भी अपने असली रंग में नहीं था। सब कुछ बर्फ के रंग में एकाकार हो गया था। और मैं उस श्वेत संसार को, उस स्वप्निल सुबह को, अपने भीतर समेटती जा रही थी।
रात की उत्सवभरी बर्फबारी और सुबह की शांत यात्रा… दोनों मिलकर मेरे मन में एक ही तस्वीर बना रहे थे— कि कभी-कभी जीवन अपनी सबसे कोमल अनुभूतियाँ उसी क्षण में देता है, जब आप किसी बिल्कुल अनजानी भूमि पर होते हैं।
सियोल की वह पहली बर्फ… मेरी स्मृति में आज भी उतनी ही उजली, उतनी ही चमकदार है। हर फुहार में उस रात की हँसी और उस सुबह की शांति अब भी धीरे-धीरे मन में गहराती है।
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© डॉ प्रतिभा मुदलियार
पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006
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