डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – दक्षिण कोरिया की महिलाएं ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆ 

सियोल के इंनचॉन एअरपोर्ट से बाहर आते ही जो सर्द हवा चेहरे को छूकर गुज़री, उसके स्पर्श में ही मैंने आधुनिकता और अनुशासन का संगीत महसूस किया था। लंबी साफ सुथरी सड़कें संवरे हुए मन की तरह स्वच्छ, भीड़ में भी व्यवस्था और चेहरों पर एक गहरा एकाग्र भाव। पहली नज़र में लगा, यह देश जैसे समय से आगे चल रहा है। पर उसकी चमक के भीतर, जीवन की गहराइयाँ हैं… यह बात यहाँ रहते रहते पता चली थी।

यूँ तो यहाँ रहते रहते मैं जिन कोरियाई महिलाओं से मिली उन्होंने मुझपर एक छाप छोड़ दी। शिक्षिका होने के कारण सह शिक्षिकाओं, छात्राओं, ऑफिस स्टाफ, काम करनेवाली महिलाएँ.. आदि से मिलना होता ही था। साथ ही जब शाम को वॉक के लिए जाती थी तो आते जाते कुछ चेहरे परिचित हो गए थे.. किसी के साथ कभी कॉफ़ी या फिर चॉकलेट का रिश्ता भी अपने आप बन ही गया था…इन महिलाओं को देखकर मैं जितना जान पायीं.. समझ पायीं..उस पर आधारित ही मेरे ये शब्द हैं।

सियोल की सड़कों पर प्रत्येक स्त्री तेज़ कदमों से चलती है, जैसे समय की लय से उसके कदम बँधे हों। भारत की सड़कों पर चलती स्त्री के चेहरे पर जैसे थोड़ी बातचीत छिपी होती है कोरिया की स्त्रियों की नज़रें संयम और चैतन्य से भरी दिखतीं हैं। उनकी चाल में गति अधिक है, पर स्वर धीमे। शायद स्त्री का यह धीमा मौन ही  उसके जीवन का दस्तावेज़ होता है।

कोरिया की स्त्रियाँ एक अद्भुत विरोधाभास को जीती हैं। एक तरफ़ वे विकसित, शिक्षित, विशाल बाज़ारों और तकनीक के बीच घूमती, पढ़ती–लिखती, नई पहचान रचती नज़र आतीं हैं तो दूसरी तरफ़, परंपरा और पितृसत्ता के सूक्ष्म तंतुओं से बंधी सी प्रतीत होतीं हैं। यह द्वंद्व मुझे भारत की स्त्रियों के जीवन में दिखने मिलता है। हालाँकि दोनों देशों की परिस्थितियाँ भिन्न हैं, पर जीवन की अंतर्धारा कहीं गहरी समानता रचती है।

कोरिया के विश्वविद्यालयों में पढ़ती लड़कियाँ विशेष रूप से आकर्षित करती हैं। उनका सौंदर्य केवल बाहरी सजावट नहीं, बल्कि अपने देश की एक सांस्कृतिक उपस्थिति है। के–ब्यूटी की छवि, चेहरे की चमक, सुव्यवस्थित पोशाकें, नपे–तुले कदमों से चलना—सब एक कला की तरह है। सुबह विश्वविद्यालय की ओर भीड़ में जाती छात्राएँ अक्सर बेहद सजी सवंरी होतीं हैं। देखने में यह एक सौंदर्य–उत्सव जैसा लगता।

परंतु धीरे–धीरे जाना कि यह उत्सव कई बार दबाव में बदल जाता है। दक्षिण कोरिया में सुंदरता के कड़े मानदंड हैं—गोरा रंग, आकर्षक चेहरा, पतला शरीर! यह सौंदर्य केवल व्यक्तिगत चुनाव नहीं, सामाजिक मांग भी है। लड़कियाँ बतातीं कि यह सुंदरता उन्हें अवसर देती भी है, और बाँधती भी। उनकी आँखों में चमक होती हैं, पर कभी–कभी थकान भी। अपनी क्षमता साबित करने के ऊपर सौंदर्य का होना एक और बोझ बनकर रहता है। भारत में भी सुंदरता को महत्व दिया जाता है, पर इस हद तक नहीं। वहीं कोरिया में यह पहचान का मूल तत्व बनता जा रहा है। मैंने अक्सर इतने ज़ाडे में भी लडकियों को जैकट, टोपी पहने देखा है पर अक्सर वे स्कर्ट, फ्राक, या छोटी जिन्स में होती… उनकी पतली निथरी टांगे उनके सौंदर्य का मानदंड है यह मुझे बाद में पता चला था… और मैं उन लडकियों को देखकर दंग रह जाती कि ये इतनी कडाके की ठंड में ये इतने आराम से कैसे रह सकती है.. मैंने एकाध बार पूछ भी लिया था.. पर जबाव में उनकी मात्र मुस्कुराहट थी..सौंदर्य बोध के मेरे अज्ञान पर वे मुस्कुराती होगीं।

दक्षिण कोरिया में ‘presentable’ होना केवल उचित पहनावे तक सीमित नहीं है; शारीरिक रूप-रंग को भी सम्मान और परिश्रम का प्रतीक माना जाता है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपनी व्यक्तित्व-छवि के माध्यम से प्रदर्शित करना चाहता है। कुछ पेशों में विशेष रूप से फ्लाइट अटेंडेंट के लिए आवेदकों से स्पष्ट रूप से ‘शारीरिक आवश्यकताओं’ का उल्लेख किया जाता है। जिसने भी कभी कोरियन फ्लाइट में यात्रा की होगी, उसे यह अवश्य याद होगा कि सभी फ्लाइट अटेंडेंट के चेहरे-मोहरे लगभग एक जैसे हते हैं, त्वचा बेदाग होती है, और वे एक-सी वर्दी में सजी होती हैं, जो उनके सुघड़, पतले शरीर पर सटी हुई प्रतीत होती है।

इसके विपरीत कोरिया की गलियों–मोहल्लों में मुझे बिल्कुल अलग स्त्री–जगत दिखा..जहाँ चमक कम थी, पर जीवन अधिक था। फुटपाथों पर अनेक माँएँ एक हाथ से बच्चे की गाड़ी धकेलतीं और दूसरे हाथ में घर का सामान उठाए चलतीं। उनका चेहरा शांत, पर आँखों में गहरी थकान। लगता कि जीवन का पूरा बोझ उनके कंधों पर है, पर उनके कदमों में अदम्य आत्मबल भी था। उनमें कोई नाटकीयता नहीं थी बस सादगी और श्रम था। यह दृश्य मुझे भारत की गलियों–बाज़ारों में चलती महिलाओं की याद दिलाता—एक हाथ में बच्चा, दूसरे में थैला—जीवन की अनेक डोरियाँ सँभालती हुईं। मातृत्व की कोमलता और कठोरता दोनों इन स्त्रियों में थी।

दक्षिण कोरिया की स्त्रियों का सबसे बड़ा संघर्ष विवाह, मातृत्व और करियर के त्रिकोण में नज़र आता है। वहाँ महिलाओं की शिक्षा और क्षमताओं में कोई कमी नहीं; पर मातृत्व अक्सर करियर को सीमित कर देता है। बच्चा होने के बाद अनेक महिलाएँ नौकरी छोड़ देती हैं, या छोटे पदों तक ही सिमट जाती हैं। “डबल बर्डन” यानी घर और नौकरी दोनों की ज़िम्मेदारी स्त्रियों को थका देती है। भारत में संयुक्त परिवार स्त्री को कुछ सहारा देते हैं, पर कोरिया में न्यूक्लियर परिवार होने से यह बोझ अक्सर अकेले उसके कंधों पर आ गिरता है। आज भारत में भी कहीं कहीं यह परिदृश्य नज़र आता है।

फिर भारत लौटने के बाद मैंने अखबारों में पढ़ा कि वर्ष 2018 के आसपास कोरिया में #MeToo आंदोलन ने चुप्पी की दीवार तोड़ी। सालों से दबे–दबे स्वर पहली बार मुखर हुए। राजनीति, मीडिया, कला, शिक्षण हर क्षेत्र में स्त्रियाँ आगे आईं। आवाज़ें काँपती थीं, पर निर्णय दृढ़। भारत की तरह वहाँ भी विरोध हुआ, पर नई चेतना भी जन्मी। इस आंदोलन ने मुझे यह बताया कि स्त्री–स्वर जब उठते हैं, तो ऐतिहासिक होते हैं।

भारत और कोरिया, दोनों देशों में स्त्री के संघर्षों में समानता है। भारत में विवाह और परिवार सामाज केंद्रित हैं, कोरिया में व्यक्ति केंद्र में है, पर बोझ फिर भी स्त्री पर ही टिक जाता है। दोनों देशों में स्त्री अपने सपनों के साथ, परिवार, समाज और अपने भीतर के संशयों से जूझ रही है। भारत में प्रेम और सामूहिकता कुछ सहारा देते हैं जबकि कोरिया में अनुशासन और आत्मसंयम! पर संघर्ष दोनों में समान है..सम्मान और पहचान की खोज।

कोरिया में मैं सबसे पहले मिलनेवाली महिला थी प्रोफेसर वू जो किम! गोरी, छरहरी, आँखों पर चष्मा, अच्छे से कटे, सधे बाल…काले वेलवेट का स्कर्ट ब्लाउज.. स्कीन कलर के टाइट मोजे…ऊंची एडी के चमचमाते काले शूज  और अपनी ड्रेस से मैच करती कीमती पर्स हाथ में लिए वे मेरे क्वार्टर्स आयी थीं.. साथ में थे प्रो. सो हेंगे जो…..उनको पहली बार मिलते ही मै जान गयी थीं कि वे अनुशासन प्रिय है।  उन्होंने अपना कार्ड मेरे हाथ में दिया और कहा.. ज़रूरत पड़े तो अवश्य फोन करना… हमारा सारा वार्तालाप शुद्ध हिंदी में था। वैसे प्रोफेसर वू जो–किम से मिलना, कोरिया–समाज को देखने का एक पहला और नया द्वार था। उनका व्यक्तित्व सौम्यता, बुद्धिमत्ता और गहन चिंतन का अद्भुत संगम था। सादगी, अनुशासन, अनुसंधान-निष्ठा और मानवीय संवेदनशीलता—ये चार विशेषताएँ उन्हें एक आदर्श शिक्षक और प्रभावशाली अकादमिक व्यक्तित्व बनाती हैं। पर बाद में उनके साथ रहते यह जाना यह महिला भले ही बाहर से सख्त दिखती हैं… पर भीतर से बहुत ही मुलायम और स्नेहिल है। वैसे कोरिया के लोग अपने घर में बहुत कम आमंत्रित करते हैं.. पर वु जो किम जी ने मुझे अपने घर बुलाया अपने हाथों से खाना बनाया ओर खिलाया… उनका घर कोरियाई पद्धति से सजा था… पर कई जगह पर भारत के निशान थे… जिससे पता चलता कि वे भारत को अपने में बसाए रखती है। सबसे अच्छी बात यह लगी थी उनके घर का छोटा सा पुस्तकालय.. जहाँ… हिंदी कोरियाई और अंग्रेजी के उत्कृष्ट साहित्य की पुस्तकें करीने सजी हुई थी। पुस्तक प्रेम वैसे कोरिया के लोंगों में है ही.. कारण मैंने मेट्रो में सफर करते हुए कई कोरियाई लोगों में हाथ में मोटी मोटी पुस्तकें लिए पढ़ते देखा था।

कवयित्री किम यांग–शिक से मुलाक़ात, मेरे लिए कोरिया का दूसरा गहरा परिचय था। उनके घर की दीवारों पर लगे रवीन्द्रनाथ टेगोर का तैलचित्र, संस्कृत के उद्धरण, और कोरिया की काव्य–परंपरा से जुड़े प्रतीक साथ–साथ विराजमान थे। ऐसा लगा, जैसे भारत और कोरिया की आत्माएँ उनके कक्ष में एक ही धारा में बहती हों। वे अद्भुत अपनत्व से बातें करतीं, जैसे वर्षों का परिचय हो। उनकी वजह से ही मैं कोरियाई साहित्यकारों से मिल पायीं… कवयित्रियों के साथ घूम पायी और कोरियाई कविता का आनंद ले सकीं। वे मानती थीं कि स्त्री का जीवन, कविता की तरह, कदापि रैखिक नहीं होता—उसमें अनेक मोड़, अनेक रंग, अनेक ध्वनियाँ होती हैं। किम यांग–शिक भी अपने भीतर के मौन को कविता में बदल देती हैं। उनसे मिलकर लगा कि स्त्री–अनुभव की जड़ें दोनों देशों में एक–सी हैं—बस उनकी पत्तियाँ अलग–अलग ऋतुओं में खिलती हैं।

एक और स्त्री थी..नाम आज मेरी स्मृति में धुंधुला गया है, पर उसकी उपस्थिति मेरी स्मृति-यात्रा का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। कुछ नाम समय के साथ मिट जाते हैं, पर कुछ चेहरे, कुछ क्षण—मन की गहराइयों में रह जाते हैं। एक दिन अचानक मुझे फोन आया। फोन के उस पार से एक स्त्री की आवाज़ थी..संकोच भरी, पर दृढ़। उसने कहा कि वह मुझसे मिलना चाहती है…वह हिंदी सीखना चाहती थी। मैंने सहज भाव से उसे घर आने का निमंत्रण दे दिया। निश्चित दिन वह आई। दरवाज़ा खुला तो सामने छोटे बाल, छरहरी देह, अधेड़ उम्र की एक स्त्री खड़ी थी.. जिसकी आँखों में एक अनोखी फुर्ती थी, जैसे जीवन से थककर भी जीवन से हार न मानने की ज़िद। वह खाली हाथ नहीं आई थी। उसके हाथ में कुछ फूल थे और एक छोटा-सा केक। यह देखकर मन भीतर तक छू गया। विदेशी धरती पर, एक अनजान घर में इतनी आत्मीय तैयारी…यह केवल शिष्टाचार नहीं था, यह किसी रिश्ते की पहली ईंट थी। परिचय हुआ। चाय रखी। कुछ औपचारिक बातें हुईं।

फिर मैंने सहज जिज्ञासा से पूछा—“आप क्या करती हैं?” उसने बिना किसी हिचक के कहा—“मैं रंगरेज़ हूँ…मकानों को पेंट करने का काम करती हूँ।” एक क्षण के लिए मैं चौंक गई। अपने देश में ऐसे काम अक्सर पुरुषों से जुड़े होते हैं। पर उसके चेहरे पर न गर्व था, न संकोच—बस एक सहज स्वीकार था, जैसे वह कह रही हो—यह मेरा काम है, और यही मेरी पहचान है। उसी क्षण उसके प्रति मेरे मन में सम्मान की एक नई परत जुड़ गई। वह केवल हिंदी सीखने आई हुई कोई विदेशी महिला नहीं रही..वह श्रम की गरिमा की प्रतिमूर्ति बन गई। वह कभी-कभार मुझसे मिलने आती। भारतीय चाय पीती। शायद उसके स्वाद में उसे अपने जीवन की थोड़ी गर्माहट मिलती होगी। अपनी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में अपने छोटे-छोटे सुख और बड़े-बड़े दुःख बाँट लेती। कोई शिकायत नहीं, कोई आत्मदया नहीं—बस जीवन को जैसा है, वैसा कह देने की सादगी। कुछ देर बैठती, मुस्कुराती, और फिर उसी सहजता से चली जाती, जैसे आई थी। आज उसका नाम याद नहीं आता, पर उसका होना याद आता है। उसका वह छोटा-सा केक, फूलों की वह चुप भेंट, और श्रम से रंगे हुए हाथ—सब मेरी स्मृति में अब भी जीवित हैं। वह स्त्री मुझे यह सिखा गई कि सम्मान पदों से नहीं, डिग्रियों से नहीं, बल्कि उस साहस से जन्म लेता है जिससे कोई स्त्री अपने जीवन को अपने तरीके से रंगती है। और शायद…वह रंगरेज़ आज भी कहीं किसी दीवार पर रंग चढ़ा रही होगी—और अनजाने में, किसी के जीवन को थोड़ा उजला कर रही होगी।

इसके बाद विश्वविद्यालय में की कई छात्राओं से मिलीं… युवा… सुंदर… अल्हड… जागरुक… तकनीक से लैस, विनय से भरी… और हमेशा मदद के लिए तैयार! कोरिया की इन स्त्रियों को देखते हुए मुझे बार–बार लगा कि स्त्री कहीं भी हो, उसका मूल एक है.. वह अपने भीतर एक निरंतर एक यात्रा छिपाए रहती है..एक खोज की, एक धुन की, एक तड़प की…।

यहाँ कि करिअर ओरिएंटेड स्त्रियाँ मुझे बहुत भायी। उनका लेवल ऑफ कान्फिडन्स अलग ही है। वे आधुनिकता सशक्त प्रतीक हैं। वे अत्यंत अनुशासित, मेहनती और लक्ष्य-केंद्रित होती हैं। कोरिया जैसे प्रतिस्पर्धी समाज में उन्होंने शिक्षा, तकनीक, कॉरपोरेट, चिकित्सा और रचनात्मक क्षेत्रों में अपनी स्पष्ट पहचान बनाई हैं। कार्यस्थल पर वह दक्षता, समयबद्धता और पेशेवर नैतिकता के लिए जानी जाती है। मुझे याद पड़ता है… एक छात्रा की क्लास रात के आठ बजे मेरे घर पर होती थी…वहाँ ऐसा सिस्टम है कि आप अपनी और विद्यार्थी की सुविधा के अनुसार क्लास कभी भी ले सकते है। हमने तय किया था कि हर बुधवार को रात आठ बजे मेरे घर क्लास होगी.. कारण पोस्ट ग्रैजुएट में उस समय केवल एक ही छात्रा थी। उस दिन काफी ज्यादा बारिश थी। तापमान 6 तक आ गया था। बाहर काफी ज्यादा ठंड थी। मैंने सोचा शायद ये नहीं आएगी… पर ठीक आठ बजकर पांच मिनट पर वह कडाके ठंड में मेरे घर पहूँच गयी थी। मुझे उनकी यह समय प्रतिबद्धता बडी भाती थी। यही बात मैंने अस्पताल में भी देखी थी। वहाँ की नर्सेस स्नेहिल और कन्सर्न है। यही बात डॉक्टर्स की भी हैं।

कोरिया में रहते मेरे पैर में चोट आयी थी और मुझे प्लास्टर लगवाना पड़ा था… मैं लंगडाती जाती… आते जाते कुछ चेहरे परिचित हो गए थे..उन्हीं में से एक महिला मुझे रोज़ रोकती और कोरियाई भाषा में पूछती..बाल आपायो? जिगुम् ओत्तेयो? जिगुमुन ओत्तेयो?  (अर्थात् पैर में दर्द है? अब कैसा है? अपना ध्यान रखिए?) उसके हाव भाव से मैं उसकी भावनाओं को समझती… और हंसते हंसते हात मिलाते हुए हाँ हाँ (ye. Ye.) कहती। ये महिला मुझे अपनी गली की कोई मासी, मामी, चाची सी लगती।

किम यांग–शिक की कविता, प्रो. वू जो–किम का चिंतन, विश्वविद्यालय की छात्राओं का सौंदर्य और स्वप्न, और फुटपाथ की माताओं का मौन श्रम—इन सबने मिलकर मेरे भीतर कोरिया का एक अद्भुत चित्र बना दिया। ये स्त्रियाँ केवल इतिहास की पंक्तियों में नहीं रहतीं। वे रोज़मर्रा जीवन की धड़कनों में हैं। कोई शब्दों से दुनिया बनाती है, कोई प्रश्नों से, कोई अपनी आँखों की चमक से, और कोई अपने श्रम से। इन सभी में एक साझा सूत्र है—दृढ़ता।

वास्तव मे स्त्री अपनी मौन में भी साधना रचती है। वह घर में हो या कक्षा में, सड़क पर हो या नौकरी के दफ़्तर में, वह हर जगह जीवन गढ़ रही है और इस रचना में वह अपनी पहचान ढूँढती, गढ़ती और फिर उसे सौंप देती है..अपनी अगली पीढ़ी को। कोरिया से लौटते समय मेरे मन में केवल स्मृतियाँ नहीं थीं, बल्कि एक नई समझ थी—स्त्री का संघर्ष, उसकी संवेदना और उसका आत्म–प्रकाश किसी भूगोल से बंधा नहीं—वह सार्वभौमिक है। कोरिया की स्त्रियों में मैंने भारत की स्त्रियों को देखा, और कहीं–कहीं अपने–आप को भी। मुझे लगा, स्त्री–जीवन संसार भर में एक ही बात कहता है— “मैं हूँ, और यही मेरी पहली और अंतिम सच्चाई है।”

*********

©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments