डॉ प्रतिभा मुदलियार
☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – दक्षिण कोरिया का युवा, शिक्षा और फैशन ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆
दक्षिण कोरिया के सियोल स्थित हांकुक विश्वविद्यालय, सियोल में मेरी अतिथि प्रोफेसर के रूप में डेप्युटेशन में नियुक्ति हुई थी वहाँ जाने से पहले मुझे सियोल से एक छात्र का फोन आया था। उसने मुझे कहा कि “मैं आपका सहायक बोल रहा हूँ… और आप अपने आने का सारा विवरण दें ताकि हम आपको लेने के लिए वहाँ आ जाए।” उसका नाम मुन इल दो था और भारतीय विभाग में हम सब उसे समीर नाम से संबोधित करते थे। उसका व्यवहार, उसकी विनम्रता, भारत और हिंदी के प्रति उसका प्रेम उल्लेखनीय था। प्रारंभ में हम सभी भारतीय प्रोफेसरों के लिए वही एक जरिया था जिसके सहारे हम कोरिया को जान रहे थे। मुन इल दो हम सबकी स्मृति का एक अटूट हिस्सा रहा है। दक्षिण कोरिया के युवाओं का प्रारंभ में वही प्रतिनिधि था..बाद में फिर कई युवा छात्रों से मिली… नाम याद नहीं रहें… पर उनकी बातचीत उनका व्यवहार…मेरी स्मृति का आज भी हिस्सा है।
शिक्षिका होने के कारण मैं हमेशा युवाओं के बीच रही। युवाओं के साथ युवा बनी और उनके माध्यम से अपने सपने, अपनी आकांक्षाओं को साकार होते देखा। किसी भी देश के युवा हों, उनके प्रति मेरे मन में हमेशा स्वीकार्यता और जिज्ञासा का भाव रहा है। उनका उत्साह, कुछ कर गुजरने की आकांक्षा मुझे आकर्षित करती रही है। यही भाव कोरिया में रहते हुए युवाओं को समझने में मेरे लिए सहायक बना। एक बात तो तय हैं कि युवा बच्चों को सीख अच्छी नहीं लगती, उपदेश अच्छे नहीं लगते..इससे बचकर अगर हम उनके साथ रहेंगे तो उनकी दुनिया को जान सकते, समझ सकते हैं। उनसे काफी कुछ सीख सकते हैं। विश्वविद्यालय के परिसर में ही युवाओं को पढ़ते, लिखते, खेलते, गाते, खाते, पीते देखा तो लगा कि यही तो है कोरिया का वर्तमान और भविष्य भी! चमकती आँखों में आत्मविश्वास, हाथों में स्मार्टफोन, कानों में हेडफोन, और कदमों में एक अद्भुत तेजी जैसे समय से आगे चलने की आकांक्षा उनके व्यक्तित्व का स्वभाव बन चुकी हो। दक्षिण कोरिया का युवा एक जीवंत संस्कृति, एक तकनीकी चेतना और एक अनुशासित जीवन-दृष्टि का प्रतीक है।
आज से लगभग पंद्रह साल पहले जब मैं कोरिया पहूँची थी तो यह देश उस समय भी अत्याधुनिक हा था। मैंने देखा था कि यहाँ लोग बहुमंज़िला अपार्टमेंट्स में रहते हैं, जहाँ स्मार्ट होम सिस्टम, हाई-स्पीड इंटरनेट, डिजिटल उपकरण और अत्याधुनिक सुविधाएँ उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैबलेट, स्मार्टवॉच और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उनके लिए केवल उपकरण नहीं, बल्कि जीवन की भाषा हैं। इसलिए इस देश का युवा ऑनलाइन पढ़ता है, काम करता है, संवाद करता है और मनोरंजन करता है। डिजिटल दुनिया उसके लिए वास्तविक दुनिया का विस्तार बन चुकी है। किन्तु इस तकनीकी आधुनिकता के बीच भी कोरियाई युवा अपने सांस्कृतिक मूल्यों से कट नहीं जाता। परिवार उसके जीवन का केंद्र बना रहता है। माता-पिता और बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान, सामूहिक हितों को प्राथमिकता देना उसकी सामाजिक चेतना का अभिन्न अंग है। कन्फ्यूशियस दर्शन से प्रभावित कोरियाई समाज में आज भी अनुशासन, शिष्टाचार और पारिवारिक मर्यादा को अत्यंत महत्त्व दिया जाता है। युवा पीढ़ी आधुनिक जीवन जीते हुए भी इन मूल्यों को अनदेखा नहीं करती, बल्कि उन्हें अपने जीवन में नए रूप में समाहित करती है। मैंने हमेशा देखा है ये बच्चे अपने प्रोफेसर के प्रति बहुत श्रद्धा रखते हैं। हमेशा झुककर अभिवादन करना, बोलना उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है।
मैंने इनमें अनुकरणीय ऐसा अनुशासन देखा है। उनका दिन एक सुव्यवस्थित कार्यक्रम के अनुसार चलता है। सुबह जल्दी उठना, विद्यालय या विश्वविद्यालय जाना, अतिरिक्त अध्ययन या प्रशिक्षण लेना, पार्ट-टाइम काम करना, कोई कोई तो रात में भी काम कर लेते हैं। मुझे एक छात्र याद आता है जो दिन में विश्वविद्यालय की कक्षाओं में उपस्थित रहता और शाम को एक कैफ़े में अंशकालिक कार्य करती था। एक दिन बातचीत में उसने बताया कि वह अपनी उच्च शिक्षा के लिए स्वयं आर्थिक रूप से तैयार होना चाहता है ताकि परिवार पर बोझ न पड़े। उसकी आँखों में थकान अवश्य दिखती थी, पर उससे कहीं अधिक दृढ़ता और आत्मनिर्भर बनने का संकल्प दिखाई देता था। उस क्षण मुझे लगा कि इन युवाओं के लिए करियर केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि आत्मसम्मान अर्जित करने की प्रक्रिया भी है। समय का सदुपयोग उनके लिए सफलता की शर्त है। वे जानते हैं कि प्रतिस्पर्धा के इस युग में समय ही सबसे बड़ा संसाधन है। आत्म-विकास की प्रवृत्ति कोरियाई युवाओं के जीवन का केंद्रीय तत्व है। वे केवल शैक्षणिक सफलता तक सीमित नहीं रहते, बल्कि व्यक्तित्व विकास, शारीरिक स्वास्थ्य, तकनीकी दक्षता और सामाजिक कौशल पर भी ध्यान देते हैं। जिम जाना, भाषा सीखना, ऑनलाइन कोर्स करना, करियर स्किल्स विकसित करना, ये सब उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। ऐसा लगता है मानो उनके लिए जीवन एक निरंतर परियोजना है, जिसे हर दिन बेहतर बनाना आवश्यक है।
इन सब अनुभवों के बीच मुझे बार-बार यह एहसास होता रहा कि कोरियाई युवाओं के जीवन का मूल आधार केवल शिक्षा या अनुशासन नहीं, बल्कि उनका विशिष्ट मूल्य-तंत्र है। दक्षिण कोरिया के युवाओं के मूल्य-बोध में सामूहिकता का विशेष स्थान है। वे स्वयं को समाज का अंग मानते हैं। परंतु आधुनिकता के प्रभाव से व्यक्तिवाद की प्रवृत्ति भी उभर रही है। युवा सफल होना चाहता है, पर समाज से कटना नहीं जहाँ कोरियाई युवा सामूहिक अनुशासन में सुरक्षा खोजता है, वहीं भारतीय युवा विविधता में स्वतंत्रता तलाशता है। मुझे लगा कि दोनों देशों के युवाओं के जीवन में एक ही द्वंद्व उपस्थित है, परंपरा और आधुनिकता का, किंतु उसकी अभिव्यक्ति भिन्न है।
कोरिया में रहते हुए एक बात मैंने यह महसूस की यहाँ शिक्षा को अत्यधिक महत्व दिया जाता है। पढ़े लिखों का बहुत सम्मान और आदर भी होता है। यहाँ शिक्षा को भविष्य की कुंजी, सामाजिक उन्नति का साधन और जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण तत्व माना जाता है। संभवतः कन्फ्यूशियस परंपरा से प्रभावित समाज में ज्ञान को नैतिक श्रेष्ठता से जोड़ा जाता हो। शिक्षित व्यक्ति को केवल कुशल नहीं, बल्कि नैतिक रूप से श्रेष्ठ भी माना जाता है। एक बात और ध्यान के थी कि हमारे यहाँ विश्वविद्यालय में प्रवेश प्राप्त करने के लिए NEET JEE, CET आदि परिक्षाएं पास करनी होती हैं और बच्चे उसके लिए पहले से ही तैयारी करते रहते हैं, वैसे ही कोरिया में विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा (CSAT) (सुंगुन) को जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा माना जाता है। अच्छे विश्वविद्यालय में प्रवेश पाना केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि पूरे परिवार की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। युवा जानते हैं रोजगार सम्मान और स्थिर जीवन प्रदान कर सकता है। इसी कारण वे अत्यधिक मानसिक दबाव, तनाव और थकान के बावजूद पढ़ाई से पीछे नहीं हटते। जहाँ तक मुझे याद है यह परीक्षा हर वर्ष नवंबर के महीने में होती है और इस दिन पुरे देश में छुट्टी रहती है। यह मात्र एक परीक्षा नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की सामूहिक चेतना का प्रतीक बन चुका है। यह आठ घंटे तक चलने वाली परीक्षा देश के लाखों युवाओं के भविष्य का निर्धारण करती है और इसलिए इस दिन दक्षिण कोरिया के लिए किसी राष्ट्रीय पर्व या ऐतिहासिक आयोजन से कम नहीं होता। इस दिन पूरा देश मानो एक ही लक्ष्य के लिए धड़कता है कि परीक्षा शांत, व्यवस्थित और बिना किसी बाधा के संपन्न हो। शिक्षक, अभिभावक और वरिष्ठ छात्र परीक्षा देने जा रहे विद्यार्थियों को प्रेरणा देते हैं, शुभकामनाएँ देते हैं और उन्हें मानसिक रूप से तैयार करते हैं। राजनीतिक नेता, प्रसिद्ध कलाकार और विद्वान लोग मीडिया के माध्यम से छात्रों के लिए संदेश जारी करते हैं, मानो राष्ट्र स्वयं अपने युवाओं के साथ खड़ा हो। परीक्षा के दिन सामाजिक जीवन की गति धीमी पड़ जाती है। कई बैंक और दुकानें देर से खुलती हैं या बंद रखी जाती हैं। पुलिस प्रशासन विशेष रूप से सक्रिय रहता है, यातायात नियंत्रण किया जाता है, सड़कों को सुगम बनाया जाता है, और देर से पहुँचने वाले छात्रों को पुलिस वाहन उपलब्ध कराए जाते हैं, ताकि उनका भविष्य किसी छोटे व्यवधान से प्रभावित न हो। परीक्षा के श्रवण (Listening) खंड के दौरान शांति बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। छात्रों की एकाग्रता में कोई व्यवधान न पड़े, इसके लिए हवाई यातायात तक को नियंत्रित कर दिया जाता है। सुना था कि देश भर में उड़ानों को भी उस दिन स्थगित कर दिया जाता है, ताकि आकाश की गड़गड़ाहट भी परीक्षा कक्षों तक न पहुँचे।
मैंने यह सब देखा तो लगा कि यह परीक्षा केवल शैक्षणिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामूहिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय संकल्प का उत्सव है। कोरियाई समाज शिक्षा को केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार मानता है। जहाँ एक ओर यह परीक्षा युवाओं के लिए अत्यंत कठोर और तनावपूर्ण अनुभव है, वहीं दूसरी ओर यह समाज के उस अद्वितीय अनुशासन और एकजुटता का प्रतीक भी है, जो आधुनिक कोरिया की पहचान बन चुका है। यह तो तय बात है कि परीक्षा केवल ज्ञान का मूल्यांकन नहीं होती, बल्कि किसी समाज की मानसिकता, मूल्य-व्यवस्था और भविष्य-दृष्टि का प्रतिबिंब होती है। दक्षिण कोरिया की (CSAT, सुंगुन) परीक्षा और भारत की प्रतियोगी परीक्षाएँ दोनों ही अपने-अपने देशों में युवाओं के जीवन को दिशा देने वाली निर्णायक घटनाएँ हैं, किंतु इनके स्वरूप, सामाजिक प्रभाव और सांस्कृतिक अर्थ में गहरा अंतर दिखाई देता है
हालाँकि इस शिक्षा-प्रणाली के भीतर कई अंतर्विरोध भी छिपे हैं। अत्यधिक प्रतिस्पर्धा युवाओं को मानसिक रूप से थका देती है। कई युवा अपनी रुचियों और रचनात्मक क्षमताओं को दबाकर केवल परीक्षा-केंद्रित जीवन जीने को मजबूर होते हैं। उनके सामने विकल्प सीमित होते हैं या तो सफल होना, या पीछे रह जाना। इस स्थिति में शिक्षा स्वतंत्रता का माध्यम कम और सामाजिक दबाव का साधन अधिक प्रतीत होती है। फिर भी, कोरियाई युवा शिक्षा को केवल बोझ नहीं मानते। उनके लिए यह आत्म-विकास का मार्ग भी है। मैंने एक बार क्लाय में पूछा था कि आप आगे क्या करेंगे.. तो छात्र मुझसे बोला कि वह भले ही हिंदी और अंग्रजी की पढ़ाई कर रहा है, पर उसका मन संगीत में अधिक रमता है। उसने मुस्कराकर कहा—“मैम, करियर दिमाग चुनता है और शौक दिल।” तो एक ने कहा मैं तो लॉजिस्टिक का काम करूँगा…वहाँ पैसा अधिक है..। उनकी यह बातें मेरे मन में लंबे समय तक गूँजती रहीं थी। यह युवा केवल सामाजिक अपेक्षाओं से ही नहीं, बल्कि अपने भीतर चल रहे द्वंद्व से भी जूझता है, और इसी संघर्ष में उसकी परिपक्वता आकार लेती है। वे अध्ययन के माध्यम से वे स्वयं को बेहतर, सक्षम और आत्मविश्वासी बनते हुए देखते हैं। शिक्षा उन्हें यह विश्वास देती है कि वे अपने भविष्य को स्वयं गढ़ सकते हैं।
मेरी कक्षा में कुछ छात्र ऐसे थे जो एकदम से हट्टे कट्टे, कदकाठी में लंबे… छात्रों से अधिक पुरूष ही लगते। उनको देखकर तो मैं पहली बार झिझक ही गयी थी…उनके सामने तो मैं यूँ पिद्दी सी लगती। पर उनका मेरे प्रति अच्छा व्यवहार था। समय रहते जब मैं सहज हो गयी थी तब मुझे पता लगा था कि वे अपना सैन्य प्रशिक्षण समाप्त कर आए हैं। वहाँ अनिवार्य सैन्य सेवा (Mandatory Military Service) को युवा जीवन की एक ऐसी परीक्षा माना जाता है, जो व्यक्ति को बाल्यावस्था से परिपक्व नागरिकता की ओर ले जाती है। लगभग हर युवा पुरुष को दो वर्ष के लिए सैन्य प्रशिक्षण आवश्यक है। सैन्य प्रशिक्षण का यह अनुभव उसके व्यक्तित्व, सोच और जीवन-दृष्टि को गहरे रूप में रूपांतरित कर देता है। दक्षिण कोरियाई युवाओं के लिए सैन्य सेवा केवल दायित्व नहीं, बल्कि गौरव का विषय है। वे इसे केवल कानूनी बाध्यता के रूप में नहीं देखते, बल्कि राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता और सम्मान के रूप में स्वीकार करते हैं। कोरियाई युद्ध और उत्तर कोरिया के साथ निरंतर तनाव की ऐतिहासिक स्मृति ने सैन्य चेतना को सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बना दिया है। इसलिए सेना में सेवा करना वहाँ सामाजिक सम्मान और नैतिक उत्तरदायित्व का प्रतीक माना जाता है। इसमें कुछ अंतर्विरोध भी हैं। दो वर्षों की सैन्य सेवा कई युवाओं के करियर और शिक्षा की निरंतरता को बाधित करती है। कुछ युवा इसे अपने सपनों से दूरी के रूप में भी महसूस करते हैं। फिर भी, अधिकांश कोरियाई युवा इसे जीवन का अनिवार्य चरण मानकर स्वीकार करते हैं, क्योंकि उनके लिए राष्ट्र के प्रति कर्तव्य व्यक्तिगत आकांक्षाओं से ऊपर है। आधुनिक तकनीक और वैश्विक संस्कृति के बीच जीने वाला कोरियाई युवा जब सैन्य सेवा से गुजरता है, तो वह केवल आधुनिक नागरिक नहीं रहता, बल्कि राष्ट्र की चेतना से जुड़ा हुआ उत्तरदायी नागरिक बन जाता है।
जहाँ मैं यह सब देख रही थी वहीं मैं उन युवाओं को भी देख रही थी जो चित्र विचित्र हेअर स्टाईल में आते थे। उनकी हेअर स्टाईल अजिबोगरीब होती.. मैं अचंबित होती.. कैसे? पर धीरे धीरे कोरिया की कुछ बातें खुलती गयीं। मैंने लडकों को हमेशा हुडी.. कार्गो पैंट.. ओवर साईज्ड शर्ट और स्निकर्स, क्रॉस-बॉडी बैग, चेन नेकलेस, और सिल्वर इयररिंग्स पहने देखा… साथ ही मैंने ऐसे युवाओं को भी देखा है जो सुटेड बुटुडे भी थे… मुझे आश्चर्य लगता कितना ही तो अंतर्विरोध है यहाँ…। एक बार मेरी कक्षा में एक छात्र आया जिसके बाल आधे गुलाबी और आधे सुनहरे रंग में रंगे हुए थे। पहले तो मुझे यह अटपटा लगा और अनायास ही मेरी दृष्टि बार-बार उसी की ओर चली जाती रही। एक और छात्र था जिसने अपने बालों के बीच में ही स्पाईक्स् रखे थें और सिर के दोनों ओर के बाल एकदम नही थे। ये कैसी फैशन है..मेरे मन में सवाल आता…पर जब वही छात्र अत्यंत गंभीरता से कक्षा में चर्चा करते और विषय पर गहरी समझ प्रस्तुत करते, तब मुझे एहसास हुआ कि बाहरी रूप केवल अभिव्यक्ति का माध्यम है, व्यक्तित्व का मापदंड नहीं। उस दिन मैंने समझा कि कोरियाई युवा फैशन को केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि अपनी पहचान और आत्मविश्वास के प्रतीक के रूप में अपनाता है ।वैसे भी आज सौंदर्य और मेकअप उद्योग अरबों डॉलर का उद्योग बन चुका है। परंपरागत रूप से यह उद्योग केवल महिलाओं से जुड़ा माना जाता था, लेकिन हाल के वर्षों में मेकअप ने लैंगिक सीमाओं को पार कर लिया है। पुरुषों और महिलाओं के लिए सौंदर्य और मेकअप की जो कठोर और अलग-अलग सीमाएँ निर्धारित थीं, वे अब धीरे-धीरे ढीली पड़ रही हैं। आज अधिक संख्या में पुरुष भी मेकअप में रुचि लेने लगे हैं। परिवर्तन की कड़ी में दक्षिण कोरिया सबसे आगे ही होगा। वैसे भी आज कोरियाई पॉप संस्कृति (के-पॉप) ने वैश्विक स्तर पर ‘कोरियाई लहर’ को जन्म दिया, कोमल पुरुषत्व (फ्लावर बॉय) की अवधारणा को दुनिया भर में तेजी से फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘फ्लावर बॉय’ ऐसे पुरुष को कहा जाता है जिसकी बाहरी छवि कोमल हो, त्वचा चिकनी हो, व्यवहार सभ्य हो और जो फैशनेबल कपड़े तथा मेकअप पहनता हो। एक सामान्य फ्लावर बॉय, पितृसत्तात्मक समाज के ‘कठोर’ पुरुष की छवि के विपरीत होता है। मैंने वहाँ रहते वहाँ के युवावर्ग को देखा है… जो अपनी ऐसी छवि बनाने में भी लगे हैं। पर ऐसा हम सामान्यतः नहीं कह सकते। मैंने युवाओं के फैशन और जीवन-शैली में भी अद्भुत अंतर्विरोध देखा। एक दिन विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रम में मैंने देखा कि कुछ छात्र पारंपरिक कोरियाई परिधान हनबोक या जागोरी- बाजी ( जैकेट और ठिली पैंट) में आए थे, जबकि वही छात्र सामान्य दिनों में अत्याधुनिक पश्चिमी परिधान पहनते थे। मुझे यह देखकर आश्चर्य भी हुआ और प्रसन्नता भी कि आधुनिकता को अपनाने के साथ-साथ वे अपनी सांस्कृतिक पहचान को अवसर मिलने पर गर्व से प्रदर्शित करते हैं। उस क्षण लगा कि उनके लिए फैशन केवल ट्रेंड नहीं, बल्कि परिस्थिति के अनुसार अपनी जड़ों से जुड़ने का माध्यम भी है। कुछ युवा पारंपरिक अनुशासन में भी ढले थे, तो कुछ के-पॉप संस्कृति से प्रभावित आधुनिक शैली में। पर यह भी एक सच ही है कि ‘फ्लावर बॉय’ जैसी अवधारणा ने पुरुषत्व की पारंपरिक छवि को चुनौती दी है।
मैं यही सोच रही थी कि यह युवा पीढी केवल आधुनिक तकनीक का उत्पाद नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन साधने वाला एक जीवंत व्यक्तित्व है। वह अनुशासन और स्वतंत्रता, सामूहिकता और व्यक्तिवाद, परंपरा और परिवर्तन इन सबके बीच अपनी पहचान गढ़ रहा है। …और शायद यही दक्षिण कोरिया के युवाओं की सबसे बड़ी शक्ति है।
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© डॉ प्रतिभा मुदलियार
पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006
306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक
मोबाईल- 09844119370, ईमेल: mudliar_pratibha@yahoo.co.in
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






अच्छा संस्मरण।