श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ” के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है उनकी लघुकथा “ज़िंदगी ”। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #10☆
☆ ज़िंदगी ☆
मैंने अपनी पत्नी को कहा, “आज उमेश चाय पर आ रहा है.”
“क्या !” पत्नी चौंकते हुए बोली, “पहले नहीं कहना चाहिए था ?”
मैंने पूछा, “क्यों भाई, क्या हुआ ?”’
“देखते नहीं, घर अस्तव्यस्त पड़ा है. सामान इधर उधर फैला है. पहले कहते तो इन सब को व्यवस्थित कर देती. वह आएगा तो क्या सोचेगा? मैडम साफ सुथरे रहते है और घर साफ सुथरा नहीं रखते हैं.”
“वह यहीं देखने तो आ रहा है. शादी के बाद की जिंदगी कैसी होती है और शादी के पहले की जिंदगी कैसी होती है ?”’
“क्या !” अब चौंकने की बारी पत्नी की थी, “क्या, वह भी शादी कर रह है.”
मैं ने कहा, “ हां,” और पत्नी घर को व्यवस्थित करने में लग गई. ताकि शादीशुदा जिंदगी व्यवस्थित दिखें.
© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
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