श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 36 ☆ देश-परदेश – बूट पॉलिश ☆ श्री राकेश कुमार ☆

उपरोक्त फोटो अमेरिका के बोस्टन शहर के हवाई अड्डे पर खींचा था। दो महराजा स्टाइल की कुर्सियां जैसे विवाह में नवविवाहितों के लिए ऊंचे मंच पर रखी होती हैं, उसी प्रकार से यहां हवाई अड्डे के अंदर रखी हुई थी, उसी के ऊपर ये बोर्ड लगा हुआ हैं। दो सज्जन अच्छी कद काठी वाले यात्रियों की तरफ लालियत निगाहों से जूते पोलिश करने का इंतजार करते रहते हैं। हमने रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर जूते साफ करने वाले ब्रश से थक थक करने की आवाज़ से ग्राहकों को रिझाते हुए तो अनेकों वर्षों से देखा और महसूस भी किया हैं। लेकिन विमानतल पर पहली बार ये सुविधा देखने को मिली।

हमारी जल्दी पहुंचने की अदातानुसार यहां भी हम निर्धारित समय से बहुत पूर्व ही अपना आसन जमा चुके थे। ये पॉलिश सुविधा की दुकान हमारे बोर्डिंग के अंत्यंत ही करीब थी।

भाव तालिका पर नजर डाली तो जूते के दस अमरीकी रूपे और बूट के पंद्रह राशि अंकित थी। जूते और बूट में अंतर समझने के लिए गूगल बाबा का सहरा लिया, तब कुछ अंतर समझ सके। बचपन से हम तो दिल्ली बूट हाउस या बॉम्बे बूट नामक  से ही  चप्पल,  जूता आदि खरीदते थे।

बूट पॉलिश करने वाले ने जब हमारे पैरों की तरफ नज़र डाली तो थोड़ा सा मुस्करा दिया, क्योंकि हम तो खिलाड़ी (स्पोर्ट्स) जूते पहने हुए थे। बातचीत का सिलसिला आरंभ हुआ तो उसने दुःखी मन से बताया की अब अधिकतर स्पोर्ट्स जूते ही उपयोग करने लगे हैं। उनकी रोज़ी रोटी मुश्किल हो गई हैं। उसी समय वर्दीधारी सज्जन ऊंची कुर्सी पर विराजमान हो गए और एक पॉलिश करने वाला नीचे बैठ कर जूते को चमकाने लगा। कुछ समय में वो बिना पैसे, धन्यवाद बोल कर विदा हो गया। हमने इसका कारण पूछा तो वो बोला ये पायलट है, इसलिए इनको मुफ्त सुविधा, प्रशासन द्वारा उपलब्ध हैं।

हमारे देश में भी स्टेशन/ बस स्टैंड का स्टाफ ऐसे कार्य फ्री में ही करवाता हैं। वैसे पुलिस वाले तो सभी सुविधाएं फ्री में लेने को अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानते हैं।

हम लोग तो अधिकतर घर पर ही जूते पोलिश करते हैं,  लेकिन जब किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए जाते है, तो अवश्य बूट पालिश वालों की सेवाएं लेते हैं। जैसे की विवाह के लिए लड़की देखने जाना या नौकरी में साक्षात्कार पर जाना हो आदि। इस प्रकार हाथ से कार्य करते बहुत कम लोग ही विदेशों में देखने को मिलते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान) 

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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