श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “फागुन मास सुहावन लागे। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 235 ☆ फागुन मास सुहावन लागे

रंगों की बौछार में भींगते हुए लोग सकारात्मकता के साथ श्यामल हो जाना चाहते हैं। बरसाना, नंद गाँव, वृंदावन की बात ही क्या, यहाँ फगुआ गाते हुए भक्त लठ्ठमार होली का आनन्द भी उठाते हैं। रंगभरी ग्यारस से जो गुलाल उड़ना शुरू होता है, वो रंग पंचमी पर जाकर पूर्ण होता है …

ग्वालवाले झूम जाते, मास फागुन रंग में।

कृष्ण राधामय हुए अब, होलिका हुड़दंग  में।।

 धड़कनों को  थाम रखते, ले  गुलालन  हाथ में।

रूप वृन्दावन सुहावन, गोप ग्वाले साथ में।।

संस्कारों को जीवित रखने का प्रबल माध्यम हमारे त्यौहार होते हैं जो न केवल मिलजुलकर रहना सिखाते वरन एक दूसरे का सम्मान, बड़ों का आदर, छोटों को स्नेह करना सिखाते हैं। प्राकृतिक रंगों के साथ जुड़कर अपने घरों में हरी धनिया, बथुआ,पालक, चुकंदर, गाजर, टेसू के फूल के द्वारा रंग बनाइए और उससे खेलें। आजकल तो व्यवस्थित कालोनियों में एक साथ मिलकर ,तय समय में ऐसे ही रंगो का प्रयोग हो रहा है। घर के बनें पकवान विशेषकर गुझिया, दही बड़ा, काँजी बड़ा, शक्कर पारा, सलोनी , पापड़ी, खाजा व कचौड़ियों का स्वाद  इसमें चार चाँद लगा देता है।

आप सभी को होलिकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ। रंगोत्सव में सारे भेदभाव मिटाकर एक दूसरे के अपना बनाइए तभी सच्चे मायनों में वसुधैव कुटुंबकम सार्थक होगा।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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