श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना आत्म चिंतन – आत्म जाग्रति। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 242 ☆ आत्म चिंतन – आत्म जाग्रति

आनन्द की खोज में डूबते हुए व्यक्ति अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करता है । सब कुछ भुला केवल वर्तमान को सुधारने की कोशिश में लगे रहना। जल, जंगल, जमीन से जुड़कर जनचेतना को जाग्रत करना । इस कड़ी में मौन साधना का प्रमुख स्थान है । जितना ज्यादा हम जमीन से जुड़े हुए होते हैं उतना ही सफलता का ग्राफ बढ़ता जाता है।कहते हैं आत्मा में परमात्मा का निवास होता है। अहंकार और क्रोध दोनों हमें ऊर्जा देते हैं किन्तु इसका असर नकारात्मक होता है इससे हमारी बृद्धि क्रमशः रुकने लगती है । अलग- थलग विचारों से घिरा व्यक्ति न तो स्वयं कुछ कर पाता है न ही समाज की उन्नति में सहायक होता है । अधिकांश लोग एक ही तरह का जीवन चाहते हैं जिसमें भरपूर सुख सुविधा हो, नवीनता हो, प्रकृति का अधिक से अधिक सानिध्य हो । यही कारण है कि हम नदियों, पहाड़ों व बगीचों की सैर पर जाना चाहते हैं । वहाँ अधिक से अधिक समय बिताकर अपने को तरोताजा करते हैं और नयी चुनौतियों के लिए पूरी ऊर्जा के साथ तैयार हो जाते हैं ।

अपने आसपास जो भी दर्शनीय स्थान हैं वहाँ जाइये, नदियों, तालाबों, झरनों का न सिर्फ आनन्द उठाइए वरन उन्हें कैसे साफ और सुरक्षित रखें इसका भी ध्यान रखें । भारत तो कृषि प्रधान देश है यहाँ चारों ओर हरियाली है ,इससे जुड़ें, फसलों को उगाने में कितना परिश्रम लगता है इस पर भी विचार करें ।

अंतर्मन जब- जब झूमेगा, नाद अनाहद होगा…।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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