श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 355 ☆

?  व्यंग्य – हर्र लगे न फिटकरी, रंग चोखा आए ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

समस्याएं हैं। सरकारें हैं। बजट नहीं है। पर नेता जी असली मसलों से निपटने की बजाय, “झुनझुना पकड़ाने” की कला में माहिर हैं। कोई अवसर विशेष? मांग रखने वालों से संबंधित किसी विषय पर फटाफट, डाक टिकट तो जारी किया ही जा सकता है। कोई बड़ा संदर्भ है तो सिक्का ढालो! छुट्टी का ऐलान करो! किसी सर्वमान्य के नाम पर सड़क का नामकरण कर दो। किसी बने बनाए भवन का नाम ही संबंधित समुदाय के प्रसंग में कर दो। लोग बहल ही जाते हैं। फुसलाने के ये फार्मूले हर्र लगे न फिटकरी, रंग चोखा आए केटेगरी में सर्वोत्तम माने जाते हैं।

इतिहास से गड़े मुर्दे उखाड़ो, विरासत से जोड़ो, फेफड़ों में संस्कृति का गर्व भर कर शहर का नाम बदल दो! कोई जयंती शुरू कर दो! बस, जनता को लगे कि बहुत कुछ हो रहा है। असलियत में कुछ हो तो अच्छा ही है, जो वास्तव में कुछ न हो सके तो इस तरह के नुस्खे समस्याओं के “वर्चुअल सॉल्यूशन बैंक” हैं। जो हमेशा भरे रहते हैं, जबकि असली समस्याओं का खाता लगातार ओवरड्राफ्ट में जा रहा है! बेरोजगारी की मार झेल रहा नौजवान, जिसकी जेब में सुदामा की तरह चावल के दाने नहीं, उसके सामने सरकार एक ” सुदामा सशक्तिकारण योजना” का सपना लहरा देती है। योजना ब्यूरोक्रेसी के मकड़जाल में उलझी रह जाती है। नेता जी के समर्थन में जयकार के नारे लगते हैं। महंगाई की आग में तप रही गृहिणी को “किफायती जीवन शैली जागरूकता दिवस” देकर खुश करने की कोशिश भी सफल हो जाती है। दिवस मनाने से रसोई गैस का सिलेंडर सस्ता हो जाए तो बात ही क्या हो छुट्टियों का मामला तो अलग ही मसाला है! “अंतर्राष्ट्रीय … दिवस”? छुट्टी! “राष्ट्रीय … दिवस”? छुट्टी! कल को अमुक जाति को साधने के लिए “अमुक दिवस” घोषित कर छुट्टी दे दी जाए, तो अचरज नहीं!

हर चौथे दिन कोई न कोई छुट्टी देने का मतलब, कामकाज का नुकसान और उत्पादकता की गिरावट, पर सरकार को क्या ! उनका तो काम छुट्टी के बहाने जनता को साधना होता है।

शहर या सड़क का नाम बदल जाने से क्या शहर की सड़कें चौड़ी हो गईं? ड्रेनेज सिस्टम ठीक हो गया? बिजली पानी चौबीस घंटों आने लगे? पुराने साइनबोर्ड उतर गए, नए लग गए, सरकारी खजाने से कुछ करोड़ और उड़ गए। सरकार को लगता है नाम बदलने से इतिहास बदल जाता है! पर सच यह है कि इतिहास में इस बदलाव का एक पृष्ठ भर बढ़ जाता है। जयंतियों पर भाषणबाजी का ऐसा तांता लगता है कि लगता है सारी समस्याओं का समाधान भाषणों में ही छिपा है। सेमिनार, वर्कशॉप, सांस्कृतिक कार्यक्रम… इतनी ऊर्जा और धन यदि इन “जयंतियों” पर खर्च करने की अपेक्षा, उन क्षेत्रों में वास्तविक निवेश किया जाए तो? पर जयंती मनाना आसान है। फोटो खिंचवाने का मौका भी मिल जाता है। व्यापक जनसंपर्क हो जाता है। अखबार में बने रहने के मौके पैदा होते हैं। सरकार को एक नया विभाग बना देना चाहिए ” उत्सव विभाग” जिसका एकमात्र काम हो जब भी कोई गंभीर मुद्दा उभरे, तुरंत एक नया टिकट, सिक्का, छुट्टी या जयंती का तोप दाग दो! जनता का ध्यान बंट जाएगा। जो

भूखे को भजन सुना कर सुला दे वह इस विभाग का प्रमुख बनाया जा सकता है। जनता को रंगबिरंगी पतंग दिखा कर कह सके, “देखो कितना सुंदर आकाश है!” यह सारा नील गगन तुम्हारा है।

हो सकता है अगली बार वो “महंगाई रोकथाम दिवस” मनाएं, और उस के खर्च निकालने सब्जियों के दाम थोड़े और बढ़ा दिए जाएं। क्योंकि जब तक मुफ्त के चक्करों में पब्लिक उलझी रहेगी, तब तक असली ‘मुफ्त’ तो सिर्फ नेता को ही मिलेगा, जनता के थोक वोट। नेता जी के “वर्चुअल सॉल्यूशन्स का सफलता दिवस” मतलब हर्र लगे न फिटकरी रंग चोखा आए।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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