श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है लेखक – श्री संजय आरजू ‘बड़ौतवी’ जी द्वारा लिखित “एन.आर.आई. बेटा…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 187 ☆
☆ “एन.आर.आई. बेटा…” – लेखक – श्री संजय आरजू ‘बड़ौतवी’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक चर्चा
पुस्तक – ‘एन.आर.आई. बेटा
लेखक – श्री संजय आरजू ‘बड़ौतवी’
☆ संजय आरजू ‘बड़ौतवी’ की कहानियाँ – जीवन संवेदनाएँ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
संजय आरजू ‘बड़ौतवी’ का कथा-संग्रह ‘एन.आर.आई. बेटा’ समकालीन हिन्दी कहानी की उस परंपरा में एक सजग संवेदनशील हस्तक्षेप है, जहाँ कथाकार न केवल जीवन के अनुभवों को कलमबद्ध करता है, बल्कि उन्हें मानवीय दृष्टिकोण से समझाने का भी प्रयास करता है। यह संग्रह मात्र इक्कीस कहानियों का एक संकलन नहीं, अपितु हमारे सामाजिक, पारिवारिक और नैतिक मूल्यों की पुनर्परिभाषा है कभी चुपचाप, कभी करुणाभरी आवाज़ में और कभी दृढ़ता से संजय जी कहानियों में अपने अनुभवों का लोक व्यापीकरण अत्यंत कुशलता से जन भाषा में सफलता पूर्वक करते हैं।
‘एन.आर.आई. बेटा’ की शीर्षक कहानी इस संग्रह की आत्मा है, और यही कारण है कि इसे संग्रह का नाम भी दिया गया है। यह कहानी एक भावनात्मक और बौद्धिक द्वंद्व को रेखांकित करती है । वैश्वीकरण के इस दौर में भारतीय मूल्यों और पश्चिमी जीवनशैली के बीच एक युवा की खींचतान, जो आज हर परिवार में देखने मिल रही है। लेखक ने न केवल एक पीढ़ी की पीड़ा को स्वर दिया है, बल्कि पूरे समाज के उस पक्षाघात पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है जो संवेदनाओं को परिस्थितियों से काटकर आंकता है। “मैं एक और एन.आर.आई. बेटा नहीं बनना चाहता” यह संवाद केवल कथा का मोड़ नहीं, बल्कि एक समाजशास्त्रीय प्रतिवाद है।
संग्रह की कहानियाँ विविध अनुभव-संसार से जन्मी हैं। ‘सीमेंट का सिपाही’ जैसे शीर्षक से ही संकेत मिल जाता है कि यह कहानी पुलिस वालों की ज़िंदगी की ओर इशारा करती है। कहानियों में लेखकीय हस्तक्षेप कहीं भी अतिरंजित नहीं होता।
इसी प्रकार ‘मेरी सास’ एक स्त्री-केन्द्रित कथा है, जिसमें पारंपरिक रूप से प्रतिद्वंद्वी मानी जाने वाली सास-बहू की जोड़ी में जो आत्मीयता दिखाई गई है, वह आधुनिक पारिवारिक संबंधों की एक नई समकालीन व्याख्या है। यहाँ ‘स्त्री-विरोधी स्त्री’ की पुरानी धारणा को लेखक अस्वीकार करते है और इस प्रक्रिया में सामाजिक गूढ़ताओं को सादगी से खंगालते है।
साहित्य, समाज की नैतिक चिंता का लेखकीय अस्त्र होता है।
कहानियाँ ‘बूढ़ी आँखें’, ‘पिता का साया’, ‘सफेद बाल’ या ‘पिता की टोपी’ जैसे शीर्षकों के साथ उम्र, विरासत और संबंधों की थकान एवं चेतना को एक साथ चित्रित करती हैं। यह कहानियाँ सिर्फ वृद्धों की नहीं, उनके अनुभवों की भी कहानियाँ हैं, जिनमें जीवन की प्रौढ़ता है, लेकिन भाषा में अनावश्यक दार्शनिकता नहीं है।
‘वट वृक्ष’ जैसे प्रतीकात्मक शीर्षक से लेखक ने जिस तरह पीढ़ियों की छांव, व्यापार और विरासत के द्वंद्व को बुना है, वह शिल्पगत दृष्टि से भी प्रशंसनीय है। यह कहानी बताती है कि भारतीय समाज में “संपन्नता” केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है।
शैली और शिल्प में सहजता संजय आरजू की विशिष्टता है ।भाषा-संवेदनशील सधी हुई है है। वे संप्रेषण की क्लिष्टता से बचते हैं और कथ्य को स्वाभाविक प्रवाह में विकसित करते हैं। उनकी भाषा में एक आत्मीयता है, पाठक को बाँधकर रखने वाली सरलता है। ‘स्पर्श’, ‘क्या कहूँ’, ‘व्रत का सामान’ जैसी कहानियाँ इस बात की साक्षी हैं कि लेखक किसी घटना से अधिक उसके भीतर की अनुभूति को पकड़ने में रुचि रखते हैं।
‘सहयात्री’ और ‘यूनिफॉर्म’ जैसी कहानियों में लेखक की सामाजिक दृष्टि और मानवीय समझ दोनों एक साथ काम करती हैं। चाहे वह नौकरी की जद्दोजहद हो, या विद्यालयीन जीवन की मासूम यादें लेखक हर विषय को संवेदना से छूते हैं।
संजय आरजू की यह पुस्तक समकालीन हिन्दी कथा-जगत में एक ऐसी आवाज़ है जो किसी शोर में खोती नहीं, बल्कि मौन में भी संवाद रचती है। उनकी कहानियाँ नारे नहीं लगातीं, पर पाठकों को सोचने पर विवश ज़रूर करती हैं।
हिन्दी कहानी की कसौटी पर यह संग्रह सफल है । यथार्थ का चित्रण, भाषा की आत्मीयता, चरित्रों की सजीवता और समाज की गहन दृष्टि, इन सब बिंदुओं पर कहानियां खरी उतरती है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ‘एन.आर.आई. बेटा’ एक ऐसा दर्पण है जिसमें पाठक खुद को, अपने संबंधों को और अपने समाज को नए सिरे से देखता है।
मेरी शुभ कामना संजय आरजू जी की कलम को है।
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





