श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण “गीत – मानवता हित संवर्धन। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # १९१ – गीत – मानवता हित संवर्धन ☆

(कुकुभ छंद, मात्रा भार – 16/14)

प्रभु मुझको वरदान यही दो,

सुख के कुछ पल दो पुलकन।।

दुख से चाहे झोली भर दो,

मानवता की हो धड़कन।

*

सदा बनूँ दूजा हित साधक।

नहीं किसी से हो अनबन।।

**

सत्य कह रहा हूँ मैं तुमसे,

जग से मुझको प्यार मिला।

मात-पिता के काँधे चढ़कर,

उनका बड़ा दुलार मिला।।

*

जीवन भर यादों की पूँजी,

मिला सदा ही अपनापन।

**

बड़ा हुआ तो घर में अपने,

छोटों से सम्मान मिला।

सानिध्य वरिष्ठों का पाकर,

नित गोदी में लाड़ मिला।।

*

दोस्तों से खुशियाँ हैं पाईं।

जिसे निभाया आजीवन।।

**

यौवन में है साथ निभाया,

गृह लक्ष्मी जब घर आई।

सुलझाया मेरी हर उलझन,

वंश लता तब हर्षाई।।

*

बचपन से आँगन हर्षाया।

तब भविष्य चिंतन मंथन।।

**

हुई शारदे की अनुकम्पा,

कलम पकड़ ली हाथों में।

मानव की पीड़ा को लिख लिख,

बसा लिया है साँसों में।।

*

लेखक का कर्तव्य निभाया

मानवता हित संवर्धन।

**

जलूँ दीप सा आँगन-आँगन,

तमस हरूँ जग का हरदम।

सुख समृद्धि की वर्षा नित हो,

यही कामना करते हम।।

*

राष्ट्रभक्ति जन-जन में मचले

देश प्रेम का अभिसिंचन।।

**

प्रभु मुझको वरदान यही दो,

सुख के कुछ पल दो पुलकन।

दुख से चाहे झोली भर दो,

मानवता की हो धड़कन।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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