डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं एक विचारणीय कथा – प्रायश्चित)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # २९४ – साहित्य निकुंज ☆

☆ कथा कहानी – प्रायश्चित ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

रात का समय मूसलाधार बारिश जोरों पर थी। हवा में नमी और सन्नाटा घुला हुआ था। अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई, मैं सोच में पड़ गया- इतनी रात को कौन आया होगा? मम्मी-पापा तो दो हफ्ते बाद लौटकर आने वाले हैं फिर भी दरवाजे की दस्तक की ओर चलता चला गया। दरवाज़ा डबल डोर का है, पहला डोर खोला सामने बारिश में भीगी हुई लड़की खड़ी थी।

उसने झिझकते हुए पूछा-“माफ कीजिएगा, मैंने आपको इतनी देर रात तकलीफ दी, मेरी गाड़ी रास्ते में खराब हो गई है, क्या यहाँ मैं थोड़ी देर रुक सकती हूँ? तेज बारिश हो रही है, बारिश रुकते ही मैं यहाँ से चली जाऊंगी। “

मेरा मन सोचने लगा- किसी अजनबी को भीतर बुलाना ठीक है या नहीं, फिर मन विचार करने लगा कि किसी की मदद करना ही इंसानियत है अगर इनकी जगह कहीं मेरी बहन और बेटी ऐसी स्थिति में होगी तो, अचानक यह सोचकर चेहरे में नरमी आ गई।

मेरे मन में मानवता के बीज कूट-कूटकर भरे थे, दरवाज़ा खोलते हुए मैंने कहा-“आइए, अंदर आ जाइए; बाहर तो सचमुच तेज बारिश हो रही है।

आते ही उसने पूछा, ‘वॉशरूम कहाँ है’?

मैंने उसे वॉशरूम का रास्ता बताया…, वह अपना बैग लेकर के वॉशरूम चली गई। जब वह लौट कर आई तब उसने साड़ी की जगह सूट पहन रखा था।

मैंने तुरंत ही उसके लिए गरमा-गरम चाय बनाई और कहा- इसे पीकर आपको राहत मिलेगी।

इस पर उसने-थैंक्स कहा।

कुछ देर हम लोग यूं ही चुपचाप बैठे रहे, थोड़ी देर बाद मैंने पूछा- “आप कहां से आ रही हैं, कहां जा रही हैं? “

उसने जवाब में कहा- “मैं कानपुर से लखनऊ जा रहीहूँ। “

“इतनी रात को आप अकेली कार ड्राइव कर रही हैं? ”

“नहीं, मेरे साथ मेरा ड्राइवर है, जो गाड़ी में ही है। “

अनायास ही मैंने पूछ लिया- “आपका नाम क्या है? “

वहाँ से आवाज आई- “जी, मेरा नाम नेहा है। और आपका…? ”

“जी, मेरा नाम शांतनु है। “

नेहा नाम सुनते ही मन में एक भूचाल-सा आ गया, सारे पन्ने पलटने लगे, तब मैंने दोहरया- “नेहा नाम है आपका। “

वह बोली- “क्या बात है? नेहा नाम से आपका कोई पुराना रिश्ता है क्या? “

“जी… ऐअस अहि कुछ समझ लीजिये। “

उसने कहा- “शांतनुजी! क्या बात है आप कुछ सोच में पड़ गए। “

“नेहा का मतलब स्नेह होता है नेह करना होता है, इतना बुरा भी मतलब नहीं है। “ …हा…हा…हा…। “

चाय का घूँट “पीते-पीते नेहा ने कहा-” आप ठीक तो है शांतनु जी, अनायास आपके चेहरे में उदासी आ गई जैसे कोई दर्द दबा हो आपके सीने में… कोई और बात जहन में हो और उस बात को शेयर करने से आपका मन हल्का हो सकता हो तो मैं सुनना चाहूंगी। “

चाय की भाप, मिट्टी की सौंधी खुशबू और बारिश की रिमझिम फुहार के बीच मैंने गहरी सांस ली और कहा– “नेहा जी, अब अतीत में जाने का साहस नहीं होता, मन घबरा जाता है। अतीत को मैं पीछे छोड़ आया हूँ। अतीत अब बहुत परे है लेकिन आज आपके इस नाम ने मेरे जीवन में फिर हलचल मचा दी। पता नहीं क्यों आपको सब कुछ बताने को मन हो रहा है।

उसने कहा- “आप मुझे एक दोस्त की तरह समझिए। “

“मेरे जीवन की कहानी का पहला पन्ना उस दिन प्रारंभ हुआ यानी 12 साल पहले, मेरी मामी मौसी जी के साथ शॉपिंग करने गई थे। वहीँ वे लोग एक चाट के ठेले पर चाट खाने के लिए रुक गए।

तभी वहाँ पर एक बहुत ही प्यारी खूबसूरत लड़की और उसकी माँ भी उसी ठेले पर चाट खाने आई, उसकी खूबसूरती देखकर मामी से रहा नहीं गया और उन्होंने पूछ लिया- “बेटी, क्या नाम क्या है तुम्हारा? “

उसने जवाब दिया- “नेहा। “

मामी ने कहा…”अरे वाह! बहुत ही प्यारा नाम है। “

मामी ने उसकी मम्मी से पूछा- “बिटिया की पढ़ाई-लिखाई हो गई? अब शादी भी करनी होगी। “

उसकी मम्मी ने कहा- “हाँ ज़रूर, कोई ब्राह्मण परिवार का अच्छा लड़का मिले तो सही। “

मामी ने जैसे ही यह सुना उनकी आँखों में चमक आ गई, तुरंत उनकी आँखों के सामने मेरा चेहरा झूलने लगा होगा, तभी उन्होंने कहा- “दीदी का कितना प्यारा बेटा है, जोड़ी कितनी सुंदर लगेगी? ”

तुरंत मामी ने उनसे कहा- “आप हमें अपना मोबाइल नंबर दे दीजिए, हमारी नजर में कोई लड़का होगा तो आपको फोन करेंगे, वैसे हम भी ब्राह्मण हैं। “

उन्होंने धन्यवाद कहा और बोला- “हम आपके फोन का इंतजार करेंगे। “

मामी का मन इतना खुश था, सोचा- जल्दी-जल्दी यहाँ से सीधे दीदी के घर जाते हैं और उन्हें सारी बातें बताते हैं। वह कितनी खुश होंगी, कितने दिनों से शांतनु के लिए लड़की ढूंढ रही हैं, शायद किस्मत में यही लड़की हो।

घर पहुंचकर मामी ने सारी बातें माँ को बताई तोवे बहुत खुश हुई।

उन्होंने कहा- “अब तुम लोग ही समझो, तुम्हें ही करना है। तुम ही इसके मामा-मामी हो, जो करोगे अच्छा ही करोगे। “

मामी ने कहा- “ठीक है दीदी, एक बार अभी फोन कर लेते हैं। फिर कल उनसे मिल कर बात करते हैं। “

माँ ने कहा-‘जैसा तुम ठीक समझो। ‘

मामी ने उन्हें कॉल लगाया, उन्होंने बड़ी ही विनम्रता के साथ बातचीत की, आगे मिलने का प्रोग्राम बनाया।

अगले दिन वेलोग हमारे घर आये, सारी बातें हो गई। लड़की की फोटो भी लेकर आयेथे। कुंडली के विषय में विचार किया कि अब उम्र 30 के पार हो चुकी है तो कुंडली मिलाने का कोई मतलब नहीं।

शीघ्र ही सगाई की तारीख निकाली गई।

मुझे लड़की की फोटो दिखा दी गई। मैंने लड़की को देखने या मिलने की इच्छा प्रकट नहीं की, बस इतना कहा- “जब आप लोगों को पसंद है, मामी ने देख ही रखी है तो मेरे देखने का क्या मतलब? सगाई वाले दिन ही देख लेंगे। “

मामी ने माँ से कहा- ”शांतनु का शादी से मन उचट चुका था क्योंकि इसके पहले एक जगह शांतनु की शादी तय हो चुकी थी, सगाई भी हो गयी थी। शादी वाले दिन ही शांतनु बारात लेकर गए और लड़की पीछे के दरवाजे से घर से गायब थी। बाद में पता चला कि उसके माता-पिता जबरदस्ती उसकी शादी कर रहे थे जबकि वह किसी और को प्यार करती थी। तब से शांतनु के मन में शादी करने की इच्छा नहीं थी फिर भी माता पिता की खुशी के लिए उसने हाँ कर दी है। “

एक दिन हम लोगों ने लड़की वाले के यहाँ जाने का दिन निश्चित किया दीदी को लड़की दिखाई। दीदी को लड़की बहुत पसंद आई। लड़की की माँ ने अच्छे से स्वागत-सत्कार किया। पता चला- लड़की के पिताजी नहीं हैं। एक भाई है और माँ ही सब फर्ज अदा कर रही है।

दीदी ने कहा- “आप चिंता मत करिए, सगाई और शादी का इंतजाम हम लोग करेंगे, आप तो सिर्फ़ विदाई की तैयारी रखिये। हम लोगों को दहेज में भी कुछ नहीं चाहिए, इतनी प्यारी लड़की हमें मिल रही है हमें और क्या चाहिए? ”

वह दिन भी आ गया जब सगाई होनी थी। सगाई का कार्यक्रम बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया, हम सभी लड़की देख कर, मिलकर प्रसन्न हो गए।

शादी को अभी एक माह था। हम दोनों ने एक-दूसरे का फोन नंबर ले लिया।

दिन भर में रोज एक बार फ्री होकर एक-दूसरे से बात करते, एक-दूसरे को जानने-समझने की कोशिश कर रहे थे। फोन पर बात करते-करते दोनों में इतनी प्रगाढ़ता हो गई कि लगने लगा- हमको अब जल्दी ही शादी हो जाए।

एक दिन मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ घूमने जारहा था, तभी नेहा से कहा-“अगर संभव हो तो तुम भी आ जाओ, साथ में कुछ देर रह लेंगे। “

नेहा तुरंत तैयार हो गई और हम एक गार्डन में पहुंच गए। मैंने अपने दोस्तों से नेहा को मिलवाया और आपस में बातचीत की, घूमे-फिरे, वहीं खाना खाया, मौज-मस्ती की। जब चलने का समय आया तबनेहा ने मुझसे कहा- “क्यों न हम दोनों आज की रात यहीं रुक जाए, यहाँ रुकने के लिए होटल भी है। “

यह सुनकर मैं आश्चर्य चकित रहा गया, मैंने कहा- “नहीं… नहीं…, शादी के पहले यह सही नहीं है। “

तब नेहा ने कहा, “इसमें ग़लत ही क्या है, हम दोनों की सगाई हो चुकी है, 10 दिन बाद शादी होने वाली है, क्या फर्क पड़ता है? “

इतना कहने के साथ ही वह मेरे नजदीक आने लगी। तभी मैंने उसे धक्का देकर रोकनाचाहा, और कहा- “क्या कर रही हो, यह अच्छा नहीं लगता, थोड़ा सब्र करो। सब्र का फल मीठा होता है। “

फिर मैंने अपने दोस्तों से कहा- “अब हमें चलना चाहिए, रात होने वाली है। “ रास्ते में नेहा को उसके घर के नजदीकी छोड़ दिया। नेहा भी भारी मन से बाय कह कर चली गई।

रात भर नींद नहीं आई, मैं यही सोचता रहा- यह लड़की अपने आप को रोक क्यों नहीं पा रही थी। फिर सोचा पहली बार मिले हैं, उसको मुझसे बात करते-करते इतना लगाव हो गया कि उससे रहा नहीं जा रहा। नहीं-नहीं उसकी कोई गलती नहीं है। अपने आप को दोषी ठहराते हुए अपने मन में कहा- “मैंने बहुत ग़लत तरीके से नेहा को डांटा, पता नहीं बेचारी क्या सोचती होगी। अब मैं सुबह होने का इंतजार कर रहा था, कब सुबह हो औरनेहा को कॉलकरूँ…।

आँखों ही आँखों में सुबह हो गई, सुबह होते ही नेहा को फोन किया। नेहा ने अनमने भाव से बात की। मैंने माफी मांगते हुए कहा- “बस नेहा! थोड़े ही दिन की बात और है, थोडा और इंतजार करो।

वह दिन आ ही गया जब जिसका सभी को इंतजार था। धूमधाम से बाजे-गाजे के साथ बरात गयी।

सभी ने बहुत आनंद लिया। जयमाला के समय बहुत ही आनंद आया। मेरी हाइट बहुत ज़्यादा थी और नेहा की अपेक्षाकृत कम। चार-छह लोग लड़की को उठाने में लगे। तभी दोस्तों ने मुझे और ऊपर उठा लिया। जैसे-तैसे जयमाला का कार्यक्रम हंसी-खुशी संपन्न हुआ।

रात भर शादी की रस्में चली, विदा का कार्यक्रम हुआ, सभी का मन दु:खी हो गया लेकिन मैं बहुत खुश था कि आज नेहा के रूप में कोई प्यार करने वाला मिला है, कोई समझने वाला मिला है।

घर पर बहू के आने पर सारी वैवाहिक विधियाँ संपन्न हुई और अब वह समय आ गया जिसका मुझे बेसब्री से इंतजार था। दोस्तों ने मिलकर कमरा बहुत अच्छी तरह से सजाया और ऑल द बेस्ट कहकर मुझे कमरे में धक्का दे दिया। कमरे में पहुंचते ही मैंने देखा- नेहा घूंघट में बैठी हुई है। मुझे देखते ही वह खड़ी हो गई। मैंने कहा- “अरे नेहा, तुम बैठो। “

नेहा बहुत निरीह भाव से मेरी ओर देखती रही।

मैंने कहा-“क्या हुआ इस तरह क्यों देख रही हो, अब तो मैं तुम्हारा हो गया। जिसका तुम्हें बेसब्री से इंतजार था…। “

नेहा उठी और मेरे पैर छुए, मैंने उसे उठाया तो उसका चेहरा देखते ही हैरान हो गया। वह रो रही थी।

मैंने पूछा-“नेहा! तुम रो क्यों रही हो? ”

नेहा ने कहा, “शांतनु! मैं सही कर रही हूँ या नहीं यह मैं नहीं जानती, पर मेरा मन ऐसा करने को कह रहा है…। “

“क्या हुआ, क्या कहना चाहती हो? ”

नेहा ने कहा- “उस दिन जब हम लोग घूमने गए थे तब तुमने मेरे आग्रह को ठुकरा दिया था। घर आकर मैंने खूब विचार किया, तब मैंने सोचा, तुम इतने अच्छे इंसान हो तो अच्छे इंसान को अच्छा ही इंसान मिलना चाहिए। “

मैंने कहा- “तुम कहना क्या चाहती हो नेहा? “

नेहा ने कहा- “आज मैं तुम्हें ऐसी बात बताना चाहती हूँ जो तुम्हारे हित में होगा। मैंने सोचा- मेरे सिर पर बचपन से बोझ है, जिसे मैं उतारना चाहती हूँ, अब मैं थक चुकी हूँ। अब मुझसे और बर्दाश्त नहीं होता, मुझे लगा तुम समझदार इंसान हो अगर तुम मुझे समझोगे तो बहुत अच्छा है। “

बचपन से मैंने देखा हमारे घर में पिताजी की मृत्यु के बाद माँ घर का भार उठा रही थी। हम जब छोटे थे तो मुझे पता नहीं चला लेकिन जब मैं बड़ी हुई, एक दिन घर पर एक आंटी आई, उन्होंने कहा- “तुम्हारी बिटिया भी अब बड़ी हो गई है, वह भी अब काम करने लायक हो गई है, तुम्हारा बोझ भी उठा सकेगी। बहुत प्यारी बहुत सुंदर है, तुम्हारी बिटिया किसी की नजर न लगे। ”

तब हम समझे नहीं लेकिन एक दिन मेरी माँ मुझे अपने साथ काम कर ले गई. वहाँ जाकर हमने जाना कि काम क्या है, माँ ने तब बताया-“बेटा, आज हम बरसों से तुम सब का पेट पाल रहे हैं, मैं ज़्यादा पढ़ी लिखी नहीं हूँ लेकिन शारीरिक सौंदर्य हमारे पास है जिसके लिए हमें मोटे-मोटे ग्राहक मिल जाते हैं और हमारा घर चल जाता है, मैं सोचती हूँ अगर तुम भी हमारा साथ दो-चारसाल तक दो तो तुम्हारी शादी के लिए काफी पैसा इकट्ठा हो जाएगा और फिर हम तुम्हारी शादी अच्छी जगह कर देंगे। ”

मेरी बड़ी बहन की शादी पिताजी कर गए थे, वह आज सुख से है। माँ की आदतों को जानते हुए वह हमारे घर नहीं आती।

माँ की बातें सुनकर मैं अवाक रह गई लेकिन काम की अवहेलना नहीं कर पाई, मन मारकर उस दलदल में उतरना पड़ा, मैंने माँ को इस सौदे के लिए हाँ कर दी।

तभी माँ ने मुझे एक कमरे में भेज दिया, कमरे के अंदर जाकर देखा तो एक हट्टा कट्टा आदमी था। जिसने मुझे पहली बार अपना शिकार बनाया। करीब 2 घंटे तक वह अपनी हवस मिटाता रहा। मैं कुछ बोल न पाई, उसके बाद उसने एक मोटी रकम दी और एक हफ्ते बाद आने के लिए फिर कहा। इसी तरह सिलसिला चलता रहा करीब 2 वर्षों से मैं इस कार्य में माँ के साथ संलग्न हूँ। लेकिन उस दिन जब मैं तुमसे मिली तब मुझे एहसास हुआ कि शारीरिक सम्बंध से भी बढ़कर भी कुछ और होता है। क्योंकि मुझे माँ ने बड़े होकर देह समर्पण का पाठ पढ़ाया है।

उस दिन मैंने यह निश्चय कर लिया था चाहे कुछ भी हो जाए हम अपनी आपबीती आपको ज़रूर बताएंगे। मेरी देह आपके लिए पवित्र नहीं है। माँ से शादी से पहले ही कहा था कि हम उनसे मिलकर सारी बात बता देते हैं, उन्हें धोखे में नहीं रख सकते। लेकिन मेरी माँ ने मुझे कसम दे दी और कहा अगर तूने ऐसा किया तो हम अपने आप को खत्म कर लेंगे। इस घर में जब मैंने कदम रखा तब मुझे लगा कि मैंने बहुत ग़लत किया है, अब मैं अपने आप को रोक नहीं पाई, माँ की कसम की परवाह किए बिना मैंने आपको सच बता डाला। मुझे पता है इसका अंजाम क्या होगा लेकिन अब मुझे अंजाम की परवाह नहीं, परवाह मुझे आप जैसे इंसान की है जिन्हें मैं धोखा नहीं दे सकती। अब फैसला आपके ऊपर है आपको जो उचित लगे वह आप करिए। शांतनु आप कुछ बोलिए इतने खामोश मत रहिए रात काफी हो चुकी है। “

मैंने कहा- “नेहा, अब बोलने के लिए कुछ भी शेष नहीं है। मेरी ज़िन्दगी में पहले एक भूचाल आ चुका था, मैं शादी करने को तैयार नहीं था। लेकिन दूसरा झटका मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता। नेहा मैं तुम्हें स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि मेरी आत्मा इस बात को हजम करने के लिए तैयार नहीं। “

नेहा ने कहा- “अंजाम मुझे मालूम था लेकिन मैं आपके सामने वचन देती हूँ अब कभी भी किसी को भी अपनी देह समर्पित नहीं करूंगी। क्योंकि मैंने अग्नि के सात फेरे आपकी अर्धांगिनी के रूप में लिए हैं। जीवन भर आपके साथ रहूँ या न रहूँ इसका निर्वाह करूंगीक्योंकि आप ही की वजह से मैंने सही रास्ते पर चलने का निश्चय किया है या यूं कहिए कि भटके हुए राही को रास्ता मिला है। “

मैंने कहा- “नेहा! तुम यहीं कमरे में आराम करो मैं बाहर जाता हूँ। क्या करना है सुबह निश्चिय करूंगा। “

इतना कहकर मैं कमरे से बाहर निकल आया रात के 2:00 बज रहे थे मुझे कुछ भी सूझ नहीं रहा था। बाहर हॉल में आकर सोफे पर लेट गया।

सुबह जब माँ की नींद खुली तब उन्होंने देखा मैं सोफे पर सो रहा हूँ  तो उन्हें हैरानी हुई, उन्होंने पूछा- “बेटा यहाँ क्यों सो रहे हो? ”

मैं उठा, मैंने कहा- “माँ, बस यूँ ही। “ और फ्रेश होने चला गया।

थोड़ी देर के बाद जब सभी लोग नाश्ता-चाय करके फुर्सत हुए तब हमने मम्मी से कहा-“मामा-मामी को फोन करके बुला लीजिए, कुछबातें करनी है। “

मेरी इस बात से मम्मी बहुत परेशान हो गई और उन्होंने फोन करके मामी को बोला-“रीता! तुम भैया के साथ जल्दी आ जाओ, पता नहीं शांतनु क्या कहना चाहता है? ”

सभी के आने के बाद हमने नेहा से कहा- “नेहा, तुम भी यहीं बैठो और माँ से कहा इनकी मम्मी को भी फोन करो वह भी यहाँ आए। “

थोड़ी देर बाद सभी लोग एकत्र हो गए। मैंने नेहा के द्वारा बताई गई सारी बातें सबके सम्मुख रख दी। इसके तुरंत बाद नेहा की मम्मी उठी और दौड़कर अपनी बेटी को मारने लगी और कहा कितना तेरे को समझाया था चुप रहना, तुम्हें सही ज़िन्दगी मिल रही है लेकिन तुम सत्यवादी हरिश्चंद्र बन गई और आज अपनी ज़िन्दगी नरक बना डाली, चुप रहती तो क्या बिगड़ जाता तेरा और इसके साथ ही दो-तीन थप्पड़ लगा दिए।

तभी मैंने कहा- “आंटी, नेहा ने सच के रास्ते पर चलने का फैसला कर लिया है, वह अपना आज सुधारना चाहती है और आप कैसी माँ हो जो उसको ग़लत राह पर चलने का संदेश दे रही हो, नेहा ने जो किया वह सही किया लेकिन हम पति-पत्नी की तरह जीवन निर्वाह नहीं कर सकते। हाँ, ज़रूरत पड़ने पर हम उसकी मदद अवश्य करेंगे। “

तभी मामी ने कहा- “आप लोगों को देखकर ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगा कि दिखने में चेहरा अलग और चेहरे के पीछे दूसरा चेहरा अलग है। कितना घटिया लिबास पहना है आपने, हमारे लड़के की ज़िन्दगी बर्बाद कर दी। किसपर विश्वास करें किसपर न करें, हमने तो आपको और आपकी बेटी को देखकर सम्बंध तय किया था। “

तभी नेहा की मम्मी ने कहा- “चल अब यहाँ से अभी कुछ और सुनना बाकी है। “

नेहा ने अपने सास-ससुर के पैर छुए और कहा, “मुझे माफ कर देना मेरी माँ ने अगर कसम न दी होती तो हम शादी के पहले ही यह खुलासा कर देते। लेकिन मेरी अंतरात्मा मुझे कचोट रही थी इसलिए मैंने शादी की रात को ही शांतनु को यह सब बताना उचित समझा आप सबको और अपने आप को धोखा नहीं देना चाहती है। “

नेहा ने शांतनु से कहा- “मैं जा रही हूँ, पत्नी न सही अगर एक दोस्त का दर्जा दे सको तो कभी-कभार फोन पर सलाह देते रहना जिससे मैं कभी रास्ता न भटक जाऊँ। मैं जल्दी ही आपको तलाक के पेपर भिजवा दूंगी, जिससे आप अपना जीवन पुनः प्रारंभ कर सकें है। “

नेहा के जाने के बाद मैं फूट-फूट कर रोया और कहा- “माँ, मेरी किस्मत में शादी नहीं है, मैं अब जीवन भर शादी नहीं करूंगा, आप सब की सेवा और अपना काम संभालूँगा। अब आप लोग कभी भी मुझे शादी के लिए बाध्य नहीं करिएगा। “

मेरी नजर मामी पर पड़ी, मैंने उन्हें रोते हुए देखा और कहा- “मामी, आप अपने आप को दोष मत दीजिए दोष मेरी किस्मत का है, आपने तो मेरा भला चाहा था। “

तभी मैंने अपने घर के नौकर को आदेश दिया- “जल्दी ही पूरे घर से लाइटिंग और सारे बंदनवार उतर जाने चाहिए, अब आप सब लोग भी शादी के माहौल से बाहर आ जाइए और अपना जीवन अलग ढंग से शुरू कीजिए। ” इतना कहकर मैं घर से निकल गया।

दिन-महीने गुजरते गए बहुत दिन बाद मामी-मामा ने सोचा जाकर हालचाल ले लिया जाए, घर पहुँचकर देखते हैं कि मेरी बहुत बड़ी दाढ़ी बढ़ चुकी है ऐसा लग रहा था कि मैं बिल्कुल देवदास बन चुका हूँ। मेरे से बात की तो मैंने कहा- “मामी, अब शादी के विषय में बिल्कुल भी बात मत कीजिए, मैंने नेहा को देखकर नेहा से शादी करने का निश्चय किया था उसे ही अपना माना था मेरी किस्मत में उसका सुख नहीं है तो कोई बात नहीं लेकिन मैं किसी और से शादी नहीं करूंगा। “

नेहा जी यही है मेरी आपबीती जो आपके नेहा नाम ने मुझे अतीत के पृष्ठों को पुनः खोलने के लिए बाध्य कर दिया।

नेहा ने कहा- “मैं आपसे एक बात पूछना चाहती हूँ इस दौरान आपकी कभी नेहा से बात नहीं हुई। “

मैंने कहा- “जी, तीन-चार बार हुई, वह पत्थर हो चुकी है उसकी माँ का वही हाल है। माँ के बार-बार कहने पर भी वह अब कहीं नहीं जाती, न ही किसी को घर में आने देती है। उसका कहना है कि एक बार मेरी ज़िन्दगी में खुशियों का झोंका आया, मैं उसकी महक हूँ अब अपवित्र नहीं करना चाहती। आपके साथ मैं शादी के बंधन में बंधी थी। आपके नाम का सिंदूर और मंगलसूत्र अब भी मेरे शरीर पर सुशोभित है, उसे कलंकित नहीं करना चाहती। भले ही आप मेरे साथ नहीं है पर मैं कल्पना मैं आपको वरण कर चुकी हूँ। “

नेहा ने कहा- “शांतनु जी, एक बात आपसे कहना चाहती हूँ, जिस लड़की ने आपको मन से अपना मान लिया है, आपके कारण वह दलदल से निकलकर बाहर आ गई है, क्या अभी भी वह अपवित्र है, सारा जीवन उसने आपके नाम कर दिया, क्या कभी उसे अतीत से निकलने का अधिकार मिलेगा, कौन देगा उसे अधिकार, आप भी उसी की यादों में खोए रहते हैं। क्या अब भी आप उसे माफ नहीं कर सकते, गलती करने के बाद सुधरने का मौका सभी को होता है, मेरे हिसाब से तो एक मौका आप नेहा को भी दे दीजिए, आपकी और उसकी ज़िन्दगी संवर जाएगी। “

“नेहा जी, बारिश थम चुकी है, चाँद बादलों के बीच से झाँक रहा था आज ऐसा लग रहा है कि बरसों पुराने दर्द के बाद पहली बार सुकून आया है। “

“नेहा जी, आपकी बातों ने मेरे तन-बदन में हलचल-सी मचा दी, दिमाग में प्रेरणा का संचार किया है। इस विषय पर मैं विचार अवश्य करूंगा क्योंकि देवदास बनकर जीवन बर्बाद नहीं किया जा सकता। “

मैंने तुरंत फोन उठाया और नेहा को फोन लगाया। नेहा ने तुरंत फोन उठाया और कहा-“शांतनु! बहुत दिनों बाद आपको मेरी याद आई? ‘’

मैंने कहा- “नेहा! यह जीवन दोबारा नहीं मिलता, तुमने अपना प्रायश्चित कर लिया है। शायद तुम और मैं एक-दूसरे के लिए ही बने हैं, मैं तुम्हें अपना नाम देना चाहता हूँ। मैं आ रहा हूँ। “

उधर से बस सिसकियों की आवाज़ सुनाई पड़ रही थी।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments