श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१४ ☆ श्री सुरेश पटवा
गुरुद्वारा पत्थर साहिब
श्री गुरु नानक देव जी भूटान, नेपाल, तिब्बत से होते हुए लद्दाख पहुंचे थे। लेह में लोगों से मिलते हुए वह कश्मीर के मट्टन पहुँचे थे। लेह और मट्टन में स्थित गुरुद्वारे श्री गुरु नानक देव जी की याद दिलाते हैं। अगर हम बात लेह की करें तो वहां पत्थर साहिब गुरुद्वारा है। यह गुरुद्वारा लेह से पहले 25 किमी दूर श्रीनगर-लेह रोड पर स्थित है। श्री गुरु नानक देव जी 1517 ई में सुमेर पर्वत पर अपना उपदेश देने के बाद लेह पहुंचे थे। गुरुद्वारे का इतिहास काफी अहम है किंवदंती है कि गुरु जी ने एक राक्षस को सही रास्ते पर लाकर लोगों के दिल से उसका भय दूर किया था। वहां एक पहाड़ पर रहने वाला एक राक्षस लोगों को बहुत तंग करता था। लोगों ने अपने दुख को गुरु जी के सामने बयां किया। गुरु नानक देव जी ने नदी किनारे अपना आसन लगा लिया।
एक दिन की बात है कि जब श्री गुरु नानक देव जी प्रभु की भक्ति में लीन थे, तब राक्षस ने गुरु जी को मारने के लिए पहाड़ से बड़ा पत्थर फेंका। गुरु जी से स्पर्श होते ही पत्थर मोम जैसा मुलायम हो गया। इससे गुरु जी के शरीर का पिछला हिस्सा मोम बने पत्थर में धंस गया। गुरुद्वारे में पत्थर में धंसा श्री गुरु नानक देव जी के शरीर का निशान आज भी पत्थर पर मौजूद हैं। तब राक्षस पहाड़ से नीचे उतरा और गुरु जी को ज़िंदा देखर हैरान रह गया। गुस्से में आकर राक्षस ने अपना दायां पैर पत्थर पर मारा, लेकिन उसका पैर मोम बने पत्थर में धंस गया। तब राक्षस को अहसास हुआ कि उससे गलती हुई है। राक्षस गुरु जी के चरणों में गिर पड़ा। राक्षस के पैर का निशान भी पत्थर पर देखा जा सकता है। गुरु जी ने राक्षस को उपदेश दिया कि बुरे काम मत करो, लोगों को तंग न करो, मानव के कल्याण के लिए काम करो। इस समय गुरुद्वारा पत्थर साहिब की संभाल का जिम्मा भारतीय सेना के पास है।
हमने वाहन से उतर कर देखा तो गुरुद्वारा के सामने से एक रास्ता बग़ल में गया था। लोग वहाँ गरम चाय का सेवन कर रहे थे। वहाँ पर एक नल में बर्फ़ का पानी ठंडा पानी आ रहा था। उसके पीछे देखा तो पाया कि एक बड़ा लम्बा पतला पाइप नल से जुड़ा था और वह पतला पाइप मोटे पाइप से जुड़ा था। जिनमे से होकर बर्फ़ का पानी पिघल कर नल तक आ रहा था। शुद्ध कंचन पानी देख मुँह हाथ धोए और ठंडा पानी पीकर दिन भर से थकी देह से थकान और गर्मी को राहत देकर चाय सेवन के स्थान पर पहुँच चाय ग्रहण करने लगे। तेज हवा चल रही थी। चाय अधिक गरम होने से फूँक-फूँक कर सिप कर रहे थे। तभी हमारे पीछे किसी सज्जन ने चाय ठंडी करने के लिए चाय को दो गिलासों में ऊपर से एक दूसरे में उँडेल कर ठंडी करने की कोशिश की तो हवा के तेज झौंके से हमारी बायीं बाँह कंधे से लेकर कोहनी तक गरम चाय से तरबतर हो गई। हमने मुड़कर उन सज्जन को देखा तो वे मुँह फेरकर दूसरी तरफ़ देखने लगे। अब उनसे क्या बोलते, जिन्हें अपनी गलती का अहसास ही नहीं था। हमने अपनी चाय मेज़ पर रख कर नल से पानी ले बाँह से कंधे तक को धो लिया। ताकि दाग पक्के न हो जायें। ज़रूरी नहीं है कि आपको खुद की ग़लतियों से दाग लगें। कभी-कभी दूसरों की ग़लतियों से भी दाग लग सकते हैं। उन परिस्थितियों में किसी से उलझने की बजाय दाग साफ़ कर लेना ठीक रहता है अन्यथा कपड़ों पर लगे दाग मन मस्तिष्क में पक्के होने की सम्भावना रहती है।
मेगनेटिक हिल
लद्दाख क्षेत्र के लेह के नज़दीक एक ऐसी पहाड़ी है जिसे मैग्नेटिक हिल के नाम से जाना जाता है। सामान्यतौर पर पहाड़ी के ढलान पर वाहन को गियर में डाल और हैंडब्रेक लगा खड़ा किया जाता है। यदि ऐसा नहीं किया जाए तो वाहन नीचे की ओर लुढ़ककर खाई में गिर सकता है लेकिन इस मैग्नेटिक हिल पर वाहन को न्यूट्रल करने खड़ा कर दिया जाए तब भी वाहन ढलान की तरफ़ नहीं जाता। ऊपर की तरफ़ जाने लगता है। यह श्रीनगर-लद्दाख रोड पर लेह से 26.5 किमी पश्चिम में है। आश्चर्य तो तब होता है जबकि वाहन एंजिन बंद होने पर नीचे की ओर नहीं जाकर खुद ब खुद उपर की ओर जाने लगता है। यही तो इस पहाड़ी का चमत्कार है कि वाहन लगभग 20 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ऊपर की ओर चढ़ने लगता है। दूसरा चमत्कार यह कि न सिर्फ गाड़ियां बल्कि आसमान से उड़ने वाले जहाज भी इस पहाड़ी के गुरुत्वाकर्षण से बच नहीं सकते। कोई इसे गुरुत्वाकर्षण शक्ति कहते हैं तो कुछ इसे सिर्फ एक भ्रम मानते हैं लेकिन अब तक इस पहाड़ी का रहस्य सुलझाया नहीं जा सका है।
वैज्ञानिक कहते हैं…मैग्नेट हिल या निमू-लेह मैग्नेट हिल भारत के लद्दाख में लेह के पास स्थित एक गुरुत्वाकर्षण पहाड़ी है। आसपास की भौगोलिक विशेषताओं के कारण, इसमें एक ऑप्टिकल भ्रम है जहां वाहन गुरुत्वाकर्षण की अवहेलना में ऊपर की ओर लुढ़कते हुए प्रतीत होते हैं, जबकि वे वास्तव में पृथ्वी के ढलान पर लुढ़क रहे होते हैं।
विमान चालकों के अनुसार गुरुद्वारा पत्थर साहिब के निकट स्थित इस हिल में गजब की चुंबकीय ताकत है। यही नहीं इसका मैग्नेटिक फील्ड भी काफी बड़े क्षेत्र तक प्रभावित करता है। यदि इस हिल की चुंबकीय ताकत का परीक्षण करना हो तो किसी वाहन के इंजन को बंद करके वहां खड़ा कर दें, वह बंद वाहन धीरे-धीरे पहाड़ी की चोटी की ओर स्वत: ही खिसकना शुरू कर देता है। इस मैग्नेटिक हिल से होकर विमान उड़ा चुके कई पायलटों का दावा है कि इस हिल के ऊपर से विमान के गुजरते वक्त उसमें हल्के झटके महसूस किए जा सकते हैं, इसीलिए जानकार पायलट इस क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले ही विमान की गति बढ़ा लेते हैं ताकि विमान को हिल के चुंबकीय प्रभाव से बचाया जा सके।
जब हम वहाँ पहुँचे तो वहाँ थोड़ा ऊपर पहाड़ी पर जाने के लिए मोटरबाईक किराए पर मिल रही थीं। जहाँ पहुँच कर पर्यटक मैग्नेटिक हिल का करिश्मा देख रहे थे। मुख्य सड़क पर हमने अपना वहाँ खड़ा करके देखा तो कोई वैसा चमत्कार नहीं हुआ जिसका दावा किया जाता है। हमारे पास इतना समय भी नहीं था कि एक हज़ार रुपए देकर चमत्कारी भ्रम का सत्यापन करने मोटरबाईक से ऊपर जाया जाये। पर्यटन उद्योग के नुमाइंदे कुछ पर्यटक पोईंट भ्रम फैलाकर बनाए रखते हैं। हम मैग्नेटिक हिल को दूर से सलाम करके आगे बढ़ गये।
स्पितुक गोंपा
स्पितुक मठ, जिसे स्पितुक गोम्पा या पेथुप गोम्पा भी कहा जाता है, स्पितुक, लेह से 8 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर एक बौद्ध मठ है। इसकी स्थापना 11 वीं शताब्दी में मरियम में आने पर लामा चांगचब ओड के बड़े भाई ओड-डी ने की थी। जब लोत्सेवा रिनचेन ज़ंगपो (अनुवादक) उस स्थान पर आए तो उन्होंने कहा कि एक अनुकरणीय धार्मिक समुदाय वहां विकसित होगा, इसलिए मठ को स्पितुक (अनुकरणीय) कहा जाता था। धर्म राज ग्रगस्पा बम-आइड के समय मठ को लामा लवांग लोदोस द्वारा बहाल किया गया था और टोंसखापा का स्टेनलेस ऑर्डर पेश किया गया था और यह आज तक बरकरार है। रेड हैट संस्था के रूप में स्थापित, मठ को 15 वीं शताब्दी में पीली टोपी संप्रदाय द्वारा ले लिया गया था। वह एक छोटा मठ था। वहाँ थोड़ी देर रुककर अगले पड़ाव की तरफ़ चल दिये।
हाल ओफ़ फ़ेम
कारगिल युद्ध में भारतीय सूरमाओं की गाथा बताने वाला हाल आफ फेम पर्यटकों का सिर गर्व से ऊंचा करने में सक्षम है। टूरिस्ट सर्किट पर महत्वपूर्ण पड़ाव यह हॉल आफ फेम देशभक्ति को प्रदर्शित करता है। भारतीय सैनिकों की बहादुरी और उनकी साहसिक उपलब्धियों का बखान करता है। जैसे ही आप विजय गैलरी से गुजरेंगे तो वहां आपको कारगिल युद्ध में इस्तेमाल किए गए हथियार दिख जाएंगे। सियाचिन ग्लेशियर और अन्य स्थानों पर पहने जाने वाली युद्ध की ड्रेस देखते हैं तो आप उन मुश्किलों का अन्दाज़ लगा सकते हैं, जिनसे हमारे सैनिकों को गुजरना पड़ता है। सैनिकों द्वारा उनके परिवारों को लिखे गए पत्र इस क्षेत्र में लड़े गए युद्धों के दौरान ली गई तस्वीरें और कारगिल युद्ध पर 30 मिनट की डॉक्यूमेंट्री कुछ ऐसे आकर्षण हैं जो पर्यटकों को अपनी ओर खींच ही लेते हैं। इस भवन की दूसरी मंजिल पर भारतीय सेना द्वारा जप्त पाकिस्तानी बंदूकों और अन्य युद्धक शस्त्रों को प्रदर्शित किया गया है। हॉल को भारतीय सेना द्वारा उन सैनिकों के सम्मान में बनाया गया था जो इस क्षेत्र में लड़े गए विभिन्न युद्धों के दौरान शहीद हुए थे।
शांति स्तूप
शांति स्तूप लद्दाख के लेह जिले के चांसपा क्षेत्र में एक पहाड़ी की चोटी पर सफेद गुंबद वाला एक बौद्ध स्तूप (चोर्टेन) है। इसे 1991 में जापानी बौद्ध भिक्षु , ग्योमोयो नाकामुरा और पीस पैगोडा मिशन द्वारा बनाया गया था। स्तूप न केवल अपने धार्मिक महत्व के कारण बल्कि अपने अवस्थिति के कारण भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है जो आसपास के समूचे क्षेत्र का मनोरम दृश्य नज़रों की परिधि में समेटे है। शांति स्तूप से लेह शहर दिखाई देता है, दालान में खड़े होने पर नज़दीक में चांगस्पा गांव, दूर क्षितिज पर नामग्याल त्सेमो पैलेस और आसपास के पहाड़ों के मनोरम दृश्य प्रदान करता है। शांति स्तूप से सूर्योदय और सूर्यास्त को सबसे आकर्षक तरीक़े से देखा जा सकता है। स्तूप रात में रोशनी से जगमगाता है। जिसे लेह शहर से देखा जा सकता है और स्तूप से लेह शहर की रोशनी देखी जा सकती है।
शांति स्तूप का निर्माण अप्रैल 1983 में भिक्षु ग्योम्यो नाकामुरा और भारत सरकार के अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य, पूर्व राजनेता और भारत गणराज्य के पूर्व अंतरराष्ट्रीय राजनयिक लद्दाख के लामा कुशोक बकुला की देखरेख में हुआ था। यह परियोजना लद्दाखी बौद्धों और जापानी बौद्ध, जो भारत को बुद्ध का “पवित्र” जन्मस्थान मानते हैं, की मदद से पूरी की गई थी। भारत की तत्कालीन प्रधान मंत्री, इंदिरा गांधी ने 1984 में स्तूप के लिए एक सड़क के निर्माण को मंजूरी दी थी। राज्य सरकार ने शांति स्तूप के निर्माण के लिए कुछ वित्तीय सहायता भी प्रदान की। वर्तमान दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो ने अगस्त 1991 में शांति स्तूप का उद्घाटन किया।
शांति स्तूप में वर्तमान दलाई लामा की तस्वीर है जिसके आधार पर बुद्ध के अवशेष बताए जाते हैं। स्तूप दो-स्तरीय संरचना के रूप में बनाया गया है। पहले स्तर में प्रत्येक तरफ हिरण के साथ धर्मचक्र है। एक स्वर्ण बुद्ध की छवि “धर्म के टर्निंग व्हील” (धर्मचक्र) को दर्शाते हुए एक मंच पर बैठी है। दूसरे स्तर में बुद्ध के “जन्म”, बुद्ध की मृत्यु (महाननिर्वाण) और बुद्ध को “शैतानों को हराने” को ध्यान में रखते हुए दर्शाया गया है।
शांति स्तूप का निर्माण विश्व शांति और समृद्धि को बढ़ावा देने और बौद्ध धर्म के 2500 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में किया गया था। इसे जापान और लद्दाख के लोगों के बीच संबंधों का प्रतीक माना जाता है। अपने उद्घाटन के बाद से, शांति स्तूप एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण बन गया है। द हिंदू के अनुसार यह लेह के आसपास “सबसे प्रसिद्ध पर्यटक आकर्षण” है। इसकी स्थापत्य शैली लद्दाखी शैली से अलग है।
खारदुंग ला की ओर
लद्दाख भारत के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थलों में से एक है, जो हरियाली विहीन ऊंचे पहाड़ों, झीलों, नदियों, ग्लेशियरों, बौद्ध मठों और धार्मिक स्थलों से परिपूर्ण है। अगर देखा जाए तो लद्दाख में ऐसी एक भी जगह नहीं है, जहां जाने के बाद आपको लगेगा कि मुझे यहां नहीं आना चाहिए था, क्योंकि लद्दाख में स्थित हर एक जगह का अपना अलग ही महत्त्व है, जो पहाड़ों के बीच अपने अलग-अलग रंग-रूप, प्राकृतिक सौन्दर्य और अपने आस-पास के सुन्दर नजारों से भरे पड़े हैं, जिसे देखने के बाद आपको ऐसा लगेगा कि आप एक अलग ही दुनिया में आ गए हैं। आप सिर्फ़ पहाड़ों पर हरियाली की तलाश करने की कोशिश न करें। लद्दाखी पहाड़ों की बारिश से दुश्मनी है। ला याने दर्रे और दाख शब्द दस का अपभ्रंश, याने दसों दर्रों की जगह लद्दाख़ हुआ।
03 जुलाई 2022 को खारदुंग ला (दर्रा) पार करके नुब्रा घाटी पहुँचना है। खारदुंग ला लेह से लगभग 40 किमी. की दूरी पर स्थित है, जिसे विश्व में सबसे ऊंची जगह से गाड़ियों के गुजरने वाली सड़क का दर्जा मिला है। खारदुंग ला की ऊंचाई 5,359 मीटर (17,582 फीट) है। लेह में गरम कपड़े और आक्सीजन सिलेंडर बेचने वाले दर्जनों स्टोर गलत तरीके से इसकी ऊंचाई 5,602 मीटर (18,379 फीट) के आसपास होने का दावा करते हैं। ताकि समुद्र सतह से अधिक ऊँचाई पर होने वाली सम्भावित दिक्कतों के मद्देनज़र पर्यटकों को सामान बेचा जा सके। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस रास्ते से युद्ध के सामानों को भी चीन तक पहुँचाया गया था। अभी भी इस सड़क पर भारतीय सेना के वाहनों को जाते हुए देखा जा सकता है। यहां पर जाने के लिए आपको इनर लाइन परमिट की जरूरत पड़ती है, जिसे आप लेह के डीसी ऑफिस या वहां किसी भी ट्रैवल एजेंट के मार्फ़त बनवा सकते हैं।
खारदुंग ला लद्दाख के सबसे ऊंचे स्थानों की सूची में शामिल होने की वजह से वहां ऑक्सीजन की मात्रा काफी कम रहती है, जिसकी वजह से वहां जाने पर एल्टीट्यूड सिकनेस होने की संभावना बढ़ जाती है। अगर आप खारदुंग ला जा रहे हैं, तो एल्टीट्यूड सिकनेस से बचने के लिए मेडिसिन वगैरह अपने साथ लेकर जरूर जाएं, वरना चिड़चिड़े होकर आप एटीट्यूड सिकनेस का शिकार भी हो सकते हैं। एटीट्यूड सिकनेस से आप सिर्फ़ धैर्य पूर्वक निकल सकते हैं। लद्दाख़ के दर्रों की जानकारी इसे समझने में सहायक रहेगी।
पर्वतों के आर-पार विस्तृत सँकरे और प्राकृतिक मार्ग, जिससे होकर पर्वतों को पार किया जाता है, दर्रा कहलाते हैं| ‘ला’ शब्द तिब्बती भाषा में ‘दर्रे’ का अर्थ रखता है। परिवहन, व्यापार, युद्ध अभियानों और मानवीय आवागमन में इन दर्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हिमालय पर काराकोरम दर्रा, रोहतांग दर्रा, खारदुंग दर्रा, बुर्जिला, जोजिला, पीर पंजाल दर्रा, बनिहाल दर्रा, नाथूला दर्रा प्रमुख दर्रे हैं।
रोहतांग दर्रा (Rohtang Pass) भारत के हिमाचल प्रदेश में कुल्लू घाटी और लाहौल और स्पीति घाटियों के बीच 3,980 मीटर (13,058 फुट) की ऊँचाई पर स्थित है। यह हिमालय की पीर पंजाल श्रेणी के पूर्वी भाग में मनाली से 51 किमी दूर है। यह पूरे वर्ष हिमग्रस्त रहता है। हिमाचल को लद्दाख़ से जोड़ने वाला मनाली लेह राजमार्ग इस दर्रे से गुज़रता है। अब वहाँ अटल सुरंग बन जाने से चार घंटो का सफ़र चौबीस मिनट में पूरा किया जा सकता है। एल्टीट्यूड सिकनेस से बच जाते हैं।
क़ाराक़ोरम दर्रा भारत और चीन द्वारा नियंत्रित शिंजियांग प्रदेश के बीच 4,693 मीटर (15,397 फ़ुट) की ऊँचाई पर स्थित है। यह लद्दाख़ के लेह शहर और तारिम द्रोणी के यारकन्द क्षेत्र के बीच प्राचीन व्यापारिक मार्ग का सबसे ऊँचा स्थान है।
ज़ोजिला या ज़ोजि दर्रा भारतीय लद्दाख क्षेत्र के कारगिल जिले में स्थित कश्मीर घाटी को पश्चिम में द्रास और सुरू घाटियों से जोड़ता है और इसके सुदूर पूर्व में सिंधु घाटी को जोड़ता है। ज़ोजिला दर्रा को अक्सर कश्मीर से लद्दाख के प्रवेश द्वार के रूप में नामित किया जाता है। यहाँ भी सुरंग बनने का काम जोरशोर से जारी है।
पीर पंजाल दर्रा भारत के जम्मू और कश्मीर की पीर पंजाल पर्वतमाला में 3,490 मी॰ (11,450 फीट) की ऊँचाई पर स्थित है। यह कश्मीर घाटी को जम्मू क्षेत्र के राजौरी ज़िले और पुंछ ज़िले से जोड़ता है। इस दर्रे से मुगल काल में बनाई गई सड़क गुज़रती है। कल्हण के अनुसार इसका प्राचीन नाम “पञ्चालधारा” है। “दर्रा” को संस्कृत में “धारा” कहते हैं। इस दर्रे से उत्तर में श्रीनगर और दक्षिण में जम्मू स्थित है।
बनिहाल दर्रा हिमालय का एक प्रमुख दर्रा हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-1 ए इस दर्रे से होकर निकलता है। यही दर्रा कश्मीर घाटी को जवाहर सुरंग के माध्यम से जम्मू से जोड़ता है।
नाथूला दर्रा सिक्किम राज्य को दक्षिण तिब्बत में चुम्बी घाटी से जोड़ता है। यह 14,200 फुट की ऊंचाई पर है। भारत और चीन के बीच 1962 युद्ध के बाद इसे बंद कर दिया गया था। इसे 05 जुलाई 2006 को व्यापार के लिए खोल दिया गया है। बीसवीं सदी की शुरुआत में भारत और चीन के होने वाले व्यापार का 80 प्रतिशत हिस्सा नाथू ला दर्रे के ज़रिए ही होता था। यह दर्रा प्राचीन रेशम मार्ग की एक शाखा का भी हिस्सा रहा है।
खारदुंग ला लेह के उत्तर में सिंधु नदी घाटी और श्योक नदी घाटी को जोड़ता है। उत्तर-पूर्व तरफ़ मुड़ जाओ तो यह नुब्रा घाटी का प्रवेश द्वार भी बनाता है, जिसके आगे सियाचिन ग्लेशियर है। दर्रे के ऊपर से 1976 में एक मोटर चलने योग्य सड़क सैनिक उपयोग हेतु बनाई गई थी, जो 1988 में सार्वजनिक मोटर वाहनों के लिए खोल दी गई। सीमा सड़क संगठन द्वारा रखरखाव वाला यह दर्रा भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका उपयोग सियाचिन ग्लेशियर में आपूर्ति करने के लिए भी किया जाता है। यह सड़क दुनिया की सबसे ऊंची मोटर चलने योग्य सड़कों में से एक है।
1950 के दशक की शुरुआत में, विलियम ओ. डगलस ने वर्णन किया है कि “सिंधु पार करने के बाद पगडंडी का एक रास्ता नदी के किनारे दक्षिण-पर्व की ओर स्पितोक, खलत्से और खारगिल तक जाता है, दूसरा उत्तर की ओर लेह, खरडोंग दर्रा (… ), और सिंकियांग के एक प्राचीन व्यापारिक केंद्र “यारकंद” की तरफ़ जाता है। उन्होंने आगे कहा, “लेह एक ऐतिहासिक कारवां मार्ग पर है जो न केवल सिंकियांग में यारकंद की ओर जाता है बल्कि तिब्बत में ल्हासा तक जाता है। (…) ऊन, चांदी, चाय, कैंडी, खाल, मखमल, रेशम, सोना, कालीन, कस्तूरी, मूंगा, बोरेक्स, जेड कप, नमक उत्तर से नीचे लेह आता था। कपास के सामान, शॉल, ब्रोकेड, अफीम, नील, आलूबुखारा, जूते, मोती, अदरक, लौंग, काली मिर्च, शहद, तंबाकू, गन्ना, जौ चावल, गेहूं नीचे से ऊपर की तरफ़ रेशम मार्ग जाता था।” द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस मार्ग से चीन को युद्ध सामग्री पहुँचाने करने का प्रयास किया गया था।
हम अब लद्दाख़ में सबसे कठिन यात्रा की शुरुआत करने वाले हैं। दिमाग़ में कौतुहल मिश्रित भय है। थोड़ी असुरक्षा भी लग रही है। दो दिनों के लेह प्रवास में दर्रों पर साँस उखड़ने की कठिनाइयाँ सुनने-सुनाने को मिलती रही है। जो खारदुंग ला होकर आते हैं, वे बहादुरी के क़िस्से सुनाते हैं और जो जाने वाले हैं, वे सहमे-सहमे से सुनते रहते हैं।
खारदुंग ला ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मध्य एशिया के लेह से काशगर तक जाने वाले प्रमुख कारवां मार्ग पर स्थित है। इतिहास में इसे सालाना लगभग 10,000 घोड़ों और ऊंटों द्वारा इस्तेमाल किया जाता था। बैक्ट्रियन ऊंटों की एक छोटी आबादी अभी भी पास के उत्तर क्षेत्र हुंडर में देखी जा सकती है। खारदुंग ला लेह सड़क मार्ग से 39 किमी. की दूरी पर है। दक्षिण पुल्लू चेक प्वाइंट से उत्तर पुल्लू चेक प्वाइंट तक के लगभग 15 किमी की दूरी तक के भाग में मुख्य रूप से ढीली चट्टान, गंदगी और यदाकदा पिघली बर्फ के नाले हैं। नुब्रा घाटी की निकटवर्ती सड़क (कुछ स्थानों को छोड़कर जहां शिला स्खलन होता है) बहुत अच्छी तरह से बनी हुई है। दो और चार-पहिया वाहन, भारी ट्रक और मोटरसाइकिल विशेष अनुमति से नियमित रूप से नुब्रा घाटी में यात्रा के लिए जाते हैं।
हम सुबह दस बजे चल दिए। टैक्सी JK 10 9335 चालक तंडुप सहित चल पड़ी। लेह से एक आक्सीजन यूनिट 3,000/- रुपए में किराए पर ली, जिसका उपयोग ज़रूरत पड़ने पर करना था। यात्रा की शुरुआत 12,000 फुट से होना था और उच्चतम बिंदु 17,582 फुट पर था। उसके बाद फिर नीचे उतरना था। पहले साउथ पुल्लु गाँव आया वहाँ से खारदुंग ला 14 किलोमीटर बचा था। खड़ी चढ़ाइयों का सिलसिला शुरू हुआ। ऊपर से सर्पाकार सड़क की कई रेखाएँ नीचे देखने में डर लगता है। साँस में भारीपन महसूस होने लगा। टिस्सु पेपर में लपेट कर कपूर की दो टिकियाँ शर्ट के ऊपरी ज़ेब में रखी हैं। जिनको आक्सीजन की कमी दूर करने के लिए बीच-बीच में निकाल कर सूंघते रहते हैं। चढ़ाई पर आक्सीजन की कमी को पूरा करने के लिए पानी सहित तरल पदार्थ पीना होता है। ऊपर पहुँच कर लोग पेशाबघर ढूँढते रहे। एक जगह दो बाथरूम बने थे लेकिन उनमें ताले डले थे। एक-दो पर्यटक बाथरूम के बाहर ही निस्तार करने लगे तो आर्मी सेनानियों ने उन्हें डाँट पिलाई। डाँट खाने के बाद बाथरूम की अनिवार्यता और बढ़ गई। खारदुंग ला पर गाड़ियों की भारी भीड़ थी। लोग गाड़ियाँ उठाकर आगे बढ़ गए। जहां बर्फ़ जमी थी। पर्यटकों ने बर्फ़ पर खेलना, बर्फ़ उछालना और पेशाब करना आरम्भ कर दिया। अब हम लेह घाटी से निकल कर स्योक घाटी में प्रवेश कर रहे थे।
पर्वतों से पिघलते ग्लेशियर से श्योक नदी की धाराएँ मिलकर एक घाटी का निर्माण कर रही थीं। घाटी में सबसे पहले उत्तर पुल्लू नाम का गाँव आया। फिर खारदुंग नामक गाँव पहुँचे। वहाँ से एक सड़क सियाचीन ग्लेशियर और दूसरी सड़क स्कर्दु की ओर जाती है। आगे बढ़ने पर दाहिनी तरफ़ स्कर्दु घाटी आरम्भ हो गई। खालसार और प्रतापपुर पार करने के बाद स्कर्दू पहुँचे। एक ठीकठाक से दिखते रेस्टौरेंट पर पेशाब की थैली ख़ाली करने का अनुपूरक कार्य निपटाया। कुछ अनुपूरक के साथ मूल निस्तार कार्य से भी निवृत्त होकर फ़्रेश हो प्रसन्नचित्त हुए। फिर नाश्ता और चाय निपटाई।
हिमाच्छादित हिमालय पर्वतमाला से घिरी नुब्रा घाटी तिब्बत और कश्मीर के बीच स्थित है। घाटी का दृश्य मनोरम और मनमोहक है। सर्दियों के दौरान, पूरी घाटी दिन रात चंद्रमा के परिदृश्य से भरी रहती है। दिन में उत्तरायण सूर्य की तेज किरण बर्फ़ पर पड़ने से सफ़ेदी लिए होती हैं और रात में चाँदनी का बर्फ़ के साथ अलहदा करिश्मा दिखटा है।
अलेक्जेंडर कनिंघम ने नुब्रा को लद्दाख के पांच प्राकृतिक और ऐतिहासिक डिवीजनों में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया था। नुब्रा लद्दाख के उत्तरपूर्वी हिस्से पर है, उत्तर में बाल्टिस्तान और चीनी तुर्किस्तान की सीमा और पूर्व में अक्साई चिन पठार और तिब्बत पर चीन का कब्जा है। सियाचिन ग्लेशियर घाटी के उत्तर में स्थित है। सैसर दर्रा और प्रसिद्ध काराकोरम दर्रा घाटी के उत्तर-पश्चिम में स्थित है और नुब्रा को उइघुर (मंदारिन: झिंजियांग) से जोड़ता है। पहले पश्चिमी चीन के झिंजियांग और मध्य एशिया के साथ इस क्षेत्र से बहुत अधिक व्यापार होता था। बाल्टिस्तान के लोगों ने भी तिब्बत जाने के लिए नुब्रा घाटी का इस्तेमाल किया था।
तिब्बती पठार की तरह, नुब्रा नदी के किनारे को छोड़कर दुर्लभ वर्षा और दुर्लभ वनस्पति के साथ एक उच्च ऊंचाई वाला ठंडा रेगिस्तान है। गांव सिंचित और उपजाऊ हैं, गेहूं, जौ, मटर, सरसों और विभिन्न प्रकार के फल और मेवे पैदा करते हैं, जिनमें सेब, अखरोट, खुबानी और यहां तक कि कुछ बादाम के पेड़ भी शामिल हैं। अधिकांश नुब्रा में नुब्रा बोली या नुब्रा स्काट वक्ताओं का निवास है। बहुसंख्यक बौद्ध हैं। नियंत्रण रेखा के पास नुब्रा के पश्चिमी या सबसे कम ऊंचाई वाले छोर पर यानी भारत-पाक सीमा पर श्योक नदी किनारे के गांव तुरतुक के निवासी गिलगित-बाल्टिस्तान के बाल्टी हैं, जो बलती बोलते हैं, और शिया और सूफिया नूरबख्शिया मुसलमान हैं।
नुब्रा घाटी एक तीन भुजाओं वाली घाटी है जो लद्दाख घाटी के उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह श्योक और नुब्रा नदियों के संगम से बनी है। श्योक नदी उत्तर पश्चिम की ओर बहती है और नुब्रा नदी एक न्यूनकोण बनाते हुए इसमें उत्तर-उत्तर पश्चिम से आ कर मिलती है। श्योक नदी आगे जाकर सिन्धु नदी में मिलती है। नुब्रा की केन्द्रीय बस्ती दिस्कित की दूरी लेह से 150 कि॰मी॰ है। दिस्कित अपने बागों, दर्शनीय स्थलों, बैक्ट्रियन ऊंटों और मठों के लिए जाना जाता है। नुब्रा घाटी जम्मू और कश्मीर का सबसे उत्तरी भाग है। नुब्रा घाटी को लद्दाख के बाग के रूप में जाना जाता है और इसे मूल रूप से लदुमरा कहा जाता है जिसका अर्थ है फूलों की घाटी।
नुब्रा घाटी दूर से देखने पर घाटी सूखी लगती है। हालांकि, घाटी में मुख्य रूप से प्रमुख कृषि भूमि शामिल है। तब कोई आश्चर्य नहीं कि घाटी ने लद्दाख का प्रतिष्ठित बाग का सम्मान अर्जित किया है। यह सिर्फ नुब्रा की प्राकृतिक सुंदरता ही नहीं है जो पर्यटकों को आकर्षित करती है। घाटी मुख्य रूप से बौद्ध है और बौद्ध शिक्षा के कई केंद्रों को बसाए है। एन्सा, समस्टेमलिंग, दिस्कित और हुंदर प्रसिद्ध बौद्ध मठ हैं। हम सुमूर, हुंदर और दिस्कित की तरफ़ बढ़ रहे हैं। सबसे पहले सुमूर पहुँचे। श्योक नदी के बहुत चौड़े पाठ के किनारे पर स्थित मठ पर चढ़े तो दोनों तरफ़ नदी का आठ-दस किलोमीटर भाग दिखने लगा। बर्फ़ पिघल कर आते पानी से नदी एक किनारा पकड़ कर बह रही है। नीचे से एक सड़क चीन के खसगर की तरफ़ जा रही है।
नुब्रा घाटी समुद्र तल से 10,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। पर्यटक वर्ष के किसी भी समय यात्राओं की योजना बना सकते हैं। जुलाई और सितंबर में, जब यहाँ पतझड़ का मौसम होता है, नुब्रा घाटी की यात्रा करने का सबसे अच्छा समय है। यहाँ पेड़ नहीं होते इसलिए पतझड़ में पत्ते नहीं झड़ते अपितु बर्फ़ पिघलती है। उसे बर्फ़झड़ कहा जा सकता है। नुब्रा घाटी की जलवायु साल भर अनुकूल रहती है। यहां तक कि गर्मी के मौसम के दौरान न्यूनतम और अधिकतम तापमान क्रमशः 4 डिग्री सेल्सियस और 30 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है। हालाँकि मौसम साल भर शीतल और सुखद रहता है, सर्दियों के मौसम के दौरान तापमान न्यूनतम -40 डिग्री तक गिर सकता है। दिसंबर और जनवरी के महीने आम तौर पर सबसे ठंडे होते हैं, जब पूरी घाटियाँ और दर्रे बर्फ़ से ढँककर समतल हो जाते हैं।
हम सुमूर पहुँच रहे हैं। लद्दाखी में ‘सुम’ का अर्थ तीन है और ‘यूर’ का अर्थ है धारा या चैनल। कहा जाता है कि इस गांव में तीन प्रमुख धाराएं बहती हैं और इसी से यह नाम सुमूर पड़ा है। कुछ लोग यह भी अनुमान लगाते हैं कि यह Sum_Yul है, जिसका अर्थ है तीन गाँव। Sum_Yul ही सुमूर है। ऐतिहासिक रूप से यह गांव चीन के खसगर को लद्दाख से जोड़ने वाले प्राचीन व्यापार मार्ग पर है। मठ के ठीक ऊपर पहाड़ी की चोटी पर एक प्राचीन किला है। मठ नुब्रा घाटी में सबसे बड़ा है, जिसे लामा त्सुल्टिम नीमा ने 1830 के आसपास स्थापित किया था। 8-9वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व की विशाल चट्टान की लालसा है। पूरे साइचेन बेल्ट में जनसंख्या के मामले में सबसे बड़ा गांव है। लंबी सर्दियों के दौरान गांव के लोग विभिन्न पारंपरिक सांस्कृतिक प्रथाओं का पालन करते हैं।
सुमूर से श्योक नदी पार करके पर्वत को काट कर बनाए मार्ग पर चलने लगे हैं। रास्ता कभी नदी के बीच से होता है और कभी किनारे से पहाड़ पर चढ़ जाता है। नुब्रा घाटी में ठहरने के लिए दिस्कित के पास बजट रेंज में गेस्टहाउस हैं। कैंपिंग के लिए टेंट भी उपलब्ध कराते हैं। सुमुर में सभी बुनियादी सुविधाओं के साथ डीलक्स कैंप हैं। हंडर में अच्छे होटल भी हैं। नुब्रा घाटी में खाने के लिए सबसे अच्छी जगह होटल और गेस्ट हाउस भारतीय, चीनी, महाद्वीपीय और यूरोपीय भोजन परोसते हैं। हमारा एक रात का डेरा हुंदर के सैंडलवुड कैम्प में अर्थात् पर्यटक टेंट में था। पंद्रह टेंट के गोलाकार घेरा के बीच एक पार्क में चारों तरफ़ पहाड़ियों से घिरे बैठकर भोजन का आनंद लिया। फिर हुंदर पहुँचे।
हुंदर लद्दाख के लेह जिले का एक गाँव है जो रेत के टीलों, बैक्ट्रियन ऊंटों के लिए प्रसिद्ध है। यह नुब्रा तहसील में श्योक नदी के तट पर स्थित है। हुंदर कभी पूर्व नुब्रा साम्राज्य की राजधानी थी। कई बर्बाद इमारतें हैं, जिनमें राजा के महल के खंडहर, लंगचेन खार (“हाथी महल”) शामिल हैं। पहाड़ी की चोटी पर एक किला है, जिसे गुला कहा जाता है। हुंदर में दो बौद्ध मंदिर भी हैं: सफेद मंदिर (लखांग कार्पो) और लाल मंदिर (लखांग मारपो)। हुंदर और दिस्कित के बीच रेत के टीले हैं।
दिस्कित और हुंदर के बीच का ठंडा रेगिस्तान पर्यटकों के लिए एक आकर्षण है। पर्यटक रेत के टीलों को देखने और बैक्ट्रियन ऊंटों की सवारी करने के लिए ठंडे रेगिस्तान में आते हैं। राजस्थान और भारत के अन्य हिस्सों में पाए जाने वाले एकल-कूबड़ वाले ऊंटों के विपरीत, मध्य एशिया के स्टेपीज़ मूल के बैक्ट्रियन ऊंट के दो कूबड़ होते हैं। बैक्ट्रियन ऊंट, केवल हुंदर में पाए जाते थे। जब लद्दाख मध्य एशिया के साथ प्राचीन व्यापार मार्गों पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, तब बैक्ट्रियन ऊंट परिवहन का मुख्य साधन थे। प्राचीन रेशम मार्ग पर एक प्रमुख पड़ाव, नुब्रा अभी भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पश्मीना ऊनी वस्त्रों और बागवानी फसलों का एक प्रमुख व्यापार केंद्र है। स्थानीय लोग सेब, अखरोट, खुबानी, बादाम और मुख्य फसलों जैसे गेहूं, जौ आदि का उत्पादन करते हैं।
दिस्कित मठ
नुब्रा घाटी में दिस्कित मठ न केवल अपने अविश्वसनीय स्थान के लिए, बल्कि मठ के ठीक नीचे स्थित 106 फीट मैत्रेय बुद्ध प्रतिमा के लिए जाना जाता है। नुब्रा घाटी में दिस्कित मठ खालसर-पनाकिल मार्ग से 15 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में 10,308 फीट की ऊंचाई पर ठंडे रेगिस्तान के किनारे स्थित है। यह पार्थपुर और उन को जोड़ती सड़क के किनारे एक पहाड़ी के ऊपर खड़ा है।
दिस्कित मठ के अंदरूनी भाग इसके बाहरी हिस्से की तरह ही सुंदर हैं, क्योंकि वे जटिल थंक़ा भित्तिचित्रों से सजाए गए हैं। प्रार्थना कक्ष, जिसे दुखंग कहा जाता है, बौद्ध संरक्षक देवताओं के विशाल ड्रम और सुंदर छवियों का घर है। मठ का भंडार कई मंगोलियाई और तिब्बती धार्मिक ग्रंथों को संरक्षित करता है। मठ के ठीक ऊपर लाचुंग मंदिर है, जो बौद्ध धर्म के गेलुगपा संप्रदाय के संस्थापक सोंग खापा की बड़ी मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है। इसे नुब्रा घाटी के सबसे पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है। दिस्कित मठ का प्रांगण दिस्कित गांव और आसपास के परिदृश्य के सुंदर दृश्य प्रस्तुत करता है।
नुब्रा घाटी में एक प्रमुख आकर्षण मैत्रेय बुद्ध की 108 फीट की मूर्ति है, जो को आश्चर्यचकित करती है। सोने और लाल रंग की मूर्ति पाकिस्तान की ओर श्योक नदी का सामना करती एक पहाड़ी के ऊपर दिस्कित मठ के ठीक नीचे स्थित है। पाकिस्तानी अधिकृत कश्मीर के गाँव सामने की दिखती पहाड़ी के पार स्थित हैं। श्योक नदी उसी तरफ़ जा रही है। काराकोरम पहाड़ पर सिंधु से मिलेगी। माना जाता है कि मूर्ति के सौंदर्य और आध्यात्मिक महत्व के अलावा, तीन विचारों को शामिल किया गया है: दिस्कित गांव की सुरक्षा, विश्व शांति को बढ़ावा देना और पाकिस्तान के साथ युद्ध की रोकथाम करना।
दिस्कित मठ में मनाया जाने वाला मुख्य त्योहार दोस्मोचे, या देस्मोचे है, जिसका अर्थ है, “बलि का बकरा का त्योहार।” यह नुब्रा घाटी के गांवों के लोगों की बड़ी भीड़ को आकर्षित करता है। त्योहार का मुख्य आकर्षण छम नृत्य है, जो पर्यटकों के बीच मुखौटा नृत्य के रूप में अधिक प्रसिद्ध है। ये नृत्य मठ के लामाओं द्वारा किए जाते हैं। किसी भी आपदा की घटना को रोकने के लिए आटे से बने चित्र भी फेंके जाते हैं, और हर जगह शांति और समृद्धि का स्वागत करते हैं।
इस मठ का निर्माण त्सोंग खपा के एक शिष्य चंग्ज़ेम त्सेराब जंगपो ने 14 वीं शताब्दी में करवाया था, जिसके अंदर अलग-अलग तरीके से तिब्बती चित्रकारियाँ की हुई हैं, जो देखने में काफी खूबसूरत लगती है। इस मठ में प्रवेश करने के लिए ₹ 30 देना पड़ता है और अगर कोई व्यक्ति यहां ड्रोन उड़ाना चाहता है, तो उसे अलग से ₹.500 देना पड़ेगा। एक घंटा मठ का अवलोकन करके रुकने के स्थान हुंदर तरफ़ कूच किया। पूरा रास्ता श्योक नदी के बीच से होकर है। नदी एक कोने से बह रही है। नदी की किनारे घने घुमावदार कूचों में एक घंटा भटकने के बाद तय स्थान मिला।
हमारे रुकने का इंतज़ाम टेंट हाऊस में था। चारों तरफ़ पहाड़ों से घिरे छोटे से मैदान में 14 टेंट हाऊस बने थे। बीच में एक बगीचा में बीस-पच्चीस कुर्सियाँ डली थीं। उन पर चाँदनी छनकर आ रही थी। रात को आठ बजे के लगभग तीस दक्षिण भारतीय पर्यटक और आ गए। उनकी धमाचौकड़ी देर रात तक चलती रही। रात बारह बजे तक बर्फीले पहाड़ों से उतरती चाँदनी का आनंद लेकर शयन को चले गये।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




