डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम कथा – ‘ख़ुशहाली ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१३ ☆
☆ कथा-कहानी ☆ ख़ुशहाली ☆
श्री और श्रीमती कौशल सवेरे उठे तो उन्होंने एक दूसरे को बड़े प्यार से चूमा। उस दिन उनकी शादी की पच्चीसवीं सालगिरह थी। श्रीमती कौशल की इच्छा के अनुसार पच्चीसवीं सालगिरह कुछ ख़ास इंतज़ाम के साथ मनायी जानी थी।
श्रीमती कौशल ने शाम की पार्टी में आमंत्रित किये जाने वाले सब लोगों के नाम कार्डों पर लिखे, फिर पति से पूछा, ‘कार्ड बांटने के लिए बंटी को भेज दें? कार लेकर चला जाएगा।’
श्री कौशल ने असहमति में सिर हिलाया, कहा, ‘अभी घंटे भर में धूप तेज़ हो जाएगी। बंटी वैसे ही नाज़ुक मिजाज़ है। बिशन को भेजो। स्कूटर से दो-तीन घंटे में बांट कर आ जाएगा।’
बिशन को बुलाकर कार्ड सौंप दिये गये। उसने पूरी हिफाज़त से कार्ड एक थैले में रखे और स्कूटर लेकर निकल गया। कार्ड बांटने वाले काम की चिन्ता खत्म हुई।
थोड़ी देर में बिजली वाले के दो आदमी आकर बंगले को बल्बों से सजाने लगे। दोनों नयी उम्र के थे। दोनों की पतलूनें मोहरी पर छिनी हुई और खस्ताहाल थीं। कुछ ऐसा ही हाल कमीज़ों का था। उन्होंने बंगले की दीवार पर सीढ़ी टिकायी और बंगले को झालरों से सजाने के काम में मशगूल हो गये। धूप के बढ़ने के साथ उन्हें काम करने में दिक्कत हो रही थी, लेकिन उसके बावजूद वे काम तेज़ रफ़्तार से कर रहे थे।
थोड़ी ही देर में उनका मालिक स्कूटर पर वहां पहुंच गया। वह ठिंगना, तोंदियल आदमी था। उसने स्कूटर पर बैठे-बैठे ही छोकरों के काम पर निगाह डाली। फिर बोला, ‘ज़रा तेज हाथ चलाओ। टाइम से काम पूरा नहीं हुआ तो तुम्हें भी जूते पड़ेंगे और मुझे भी।’
फिर उसने स्कूटर छाया में खड़ा कर दिया और उसी पर बैठकर रूमाल से पसीना पोंछने लगा।
शाम होने से पहले बंगले के दो नौकरों ने सामने की ज़मीन को सींचना शुरू कर दिया। ज़मीन से सोंधी गंध उठने लगी और जल्दी ही आसपास ठंडक महसूस होने लगी। शाम होते ही बंगले पर सजाये लाल-हरे बल्ब जल उठेऔर बंगला बेहद खूबसूरत दिखने लगा। फिटिंग करने वाले दोनों लड़के एक तरफ बैठे बल्बों पर नज़र डाल रहे थे।
कुछ देर बाद गुबरैलों की तरह रेंगती हुई कारें आने लगीं। जल्दी ही बंगले का सामने वाला हिस्सा कारों से भर गया। मेहमानों के बैठने का इंतज़ाम लॉन में ही था। बहुत से लोग कुर्सियों पर बैठ गये और कुछ लोग इधर-उधर चहलकदमी करते रहे। कुछ लोग बंगले में लगे खूबसूरत फूलों को देखने लगे।
श्रीमती अस्थाना श्रीमती कौशल से बोलीं, ‘आपके फूल बहुत खूबसूरत हैं। खूब ‘टेस्ट’ है आपका।’
श्रीमती कौशल खुश होकर बोलीं, ‘थैंक्यू जी। दरअसल यह सब हमारे माली का काम है। हमें तो बगीचे की देखभाल की फुरसत ही कहां मिलती है? सवेरे शाम घूम लेते हैं यही बहुत है।’
माली का ज़िक्र करते समय उन्होंने एक मरियल चुटियाधारी आदमी की ओर इशारा किया जो धारीदार पायजामा पहने चुपचाप एक तरफ खड़ा था।
श्रीमती अस्थाना बोलीं, ‘फिर भी, आपको शौक है तभी तो माली करता है।’
श्रीमती कौशल ने कहा, ‘हां जी, थैंक्यू जी।’
लॉन पर ही ‘ड्रिंक्स’ पेश किये गये। जो शराब नहीं पीते थे उनके लिए ‘सॉफ्ट ड्रिंक्स’ थे। चार-पांच नौकर इस काम में मुस्तैदी से लगे रहे।
श्रीमती सिंह ने टिप्पणी की, ‘आपके नौकर बहुत ‘ट्रेन्ड’ हैं। बहुत कायदे से पेश आते हैं।’
श्रीमती कौशल गद्गद होकर बोलीं, ‘थैंक्यू जी।’
थोड़ी देर बाद श्रीमती कौशल ने सबसे डिनर के लिए अन्दर चलने का अनुरोध किया। सब लोग भोजन से लदी मेज़ो के इर्द-गिर्द इकट्ठे हो गये।
तभी श्रीमती कौशल की छः वर्षीय पुत्री सीढ़ियों से उतरी और ‘ममी! ममी!’ पुकारती हुई उनसे लिपट गयी। श्रीमती कौशल परेशान हो गयीं। बोलीं, ‘ओ डियर! तुम नीचे क्यों आ गयीं? तुम्हारी तबियत अभी ठीक नहीं है।’
फिर उन्होंने आवाज़ दी, ‘जानकी! जानकी!’ सीढ़ियों पर से एक अधेड़ औरत, सफेद साड़ी पहने, नंगे पांव तेज़ी से आयी। श्रीमती कौशल उसे झिड़ककर बोलीं, ‘बेबी को रूम में रखो। उसकी तबियत ठीक नहीं है।’
जानकी बच्ची को लेकर चली गयी।
मेहमान भोजन की तारीफ कर रहे थे। श्रीमती कौशल ने सफाई दी, ‘इसके लिए मेरे कुक को थैंक्स देना चाहिए। मेरा कुक बहुत होशियार है।’
श्रीमती सक्सेना बोलीं, ‘ओह, मिसेज़ कौशल, आप बहुत ‘मॉडेस्ट’ हैं। आप सब चीजों का ‘क्रेडिट’ अपने नौकरों को दे देती हैं। असली ‘क्रेडिट’ तो घर की मालकिन का ही होता है।’
श्रीमती कौशल बोलीं, ‘थैंक्यू जी।’
भोजन के बाद सब लोग फिर लॉन में आ गये और गपशप होने लगी। तभी मुखर्जी साहब ने अपनी कुर्सी के पास उल्टी कर दी। सब की नाकें सिकुड़ गयीं। महिलाओं ने नाक पर रूमाल रख लिये।
श्रीमती मुखर्जी का चेहरा उतर गया। बोलीं, ‘मैं इन्हें इतना समझाती हूं कि ‘लिमिट’ के भीतर ‘ड्रिंक’ करो, लेकिन मानते ही नहीं।’
श्रीमती कौशल ने अपने चेहरे पर आया चिड़चिड़ाहट का भाव दबा लिया। हंसकर बोलीं, ‘कोई बात नहीं जी। हो जाता है।’
फिर उन्होंने आवाज़ लगायी, ‘बिशन!’
बिशन के आने पर उन्होंने कहा, ‘यहां जल्दी से सफाई करके अच्छी तरह धो दो।’
रात के दस बज गये थे। मेहमान विदा लेने लगे। कारें अपनी अपनी बत्तियां जलाकर सरकने लगीं।
श्री वर्मा की कार बार-बार कोशिश करने के बाद भी स्टार्ट नहीं हो रही थी। थोड़ी देर बाद वे कार से बाहर निकल कर पसीना पोंछने लगे। श्रीमती कौशल बोलीं, ‘रुकिए, मैं अपने ड्राइवर को बुलाती हूं।’
उन्होंने आवाज़ दी, ‘अब्दुल!’ तुरन्त खाकी कमीज़-पैंट पहने एक सांवला आदमी उनके सामने हाज़िर हो गया। अब्दुल ने दस पन्द्रह मिनट के परिश्रम से कार स्टार्ट करके श्री वर्मा को सौंप दी।
श्री और श्रीमती सूर्यवंशी कुछ परेशान से श्रीमती कौशल के पास आये। श्रीमती सूर्यवंशी बोलीं, ‘यहां टैक्सी मिल जाएगी? हम टैक्सी से आये थे। हमारी कार गैरेज में है।’
श्रीमती कौशल बोलीं, ‘कैसी बातें करती हैं आप? हम आपको अपनी कार से भिजवा देते हैं।’
उन्होंने फिर अब्दुल को बुलाया, कहा, ‘अब्दुल! साहब को शास्त्री रोड पर छोड़कर आओ।’ और अब्दुल कार में सूर्यवंशी दंपति को लेकर निकल गया।
धीरे-धीरे सब मेहमान विदा हो गये। श्रीमती कौशल थक गयी थीं— कुछ मेहमाननवाज़ी के कारण और कुछ औपचारिकता का मुखौटा पहने पहने। वे पति के साथ अन्दर गयीं और ड्राइंग रूम में ही एक आराम कुर्सी पर फैल कर ऊंघने लगीं। श्री कौशल दूसरी आराम कुर्सी में लेट गये।
आराम कुर्सियों में श्री और श्रीमती कौशल ऊंघ रहे थे। उधर बिशन खाने की मेज़ों की सफाई कर रहा था। ऊपर कमरे में जानकी श्रीमती कौशल की सोयी हुई बच्ची की बगल में बैठी थी। नींद से कई बार उसका सिर लटक जाता था, लेकिन वह फिर आंखें खोल कर देखने लगती थी। रसोईघर में रसोइया और बंगले के दूसरे नौकर उकड़ूं बैठे खाना खा रहे थे। बिजली वाले के दोनों नौकर बाहर अपनी झालरें समेट रहे थे। उधर अब्दुल सूर्यवंशी दंपति को छोड़कर सड़क की छाती पर गाड़ी दौड़ाता हुआ वापस लौट रहा था।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







अत्यंत सहज प्रवाह, आडंबर को उजागर करता व्यंग्य। साधुवाद!
धन्यवाद, बिष्ट जी।