डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय व्यंग्य “बाढ़ में बन्दर-बाँट“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य # १३ ?

? बाढ़ में बन्दर-बाँट… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

एक बाढ़ आई… दर्जनों पुल ढहे… सैकड़ों घर डूबे… हजारों बहे…लाखों मरे… करोड़ों का नुक़सान हुआ…अरबों की मदद चाहिए… l… नतीज़ा ?.. अरबों की मदद सेंक्शन हुई… करोड़ों जमा हुए… लाखों बाँटे गये… हजारों बँटे… सैकड़ों हिस्से में आये… दर्ज़ेनों में बन्दर-बाँट हुआ… एक… सिर्फ़ एक पल्ले पड़ा है… उसी एक रूपये की रेवेन्यु टिकट लेकर आम आदमी लाइन में खड़ा है… l

आपदा प्रबंधन, बाढ़ राहत कोष, हवाई सर्वेक्षण और बाढ़ आकलन पुनर्वास… इन चार स्कन्धों पर बाढ़-ग्रस्त अभिशप्त जनों की लाशें ढोई जाने की रस्में बख़ूबी अदायगी होती हैं l पूर्व चेतावनी प्रणाली, नियंत्रित संरचना ये सब इस शव-यात्रा में अनिवार्यतः शामिल होते हैं.. l…

“ज़नाज़े में बहुत हैं तमाशाई देखो

चूना लगाके अहा!रोशनाई देखो”

 नज़ारा देखो… कितने स्कूलों की छत भरभराकर नौनिहालों की इहलीला समाप्त कर गई… सरकारी निर्माण को परखने, एन.ओ.सी. देने हेतु विशेषज्ञ अभियंता हैं… तो बीच में विश्वसनीय मापक बन काहे टाँग अड़ाती हैं ये अतिवृष्टि एवं बाढ़..?

 “पुलिया टूटी, सड़क बही,

 हर ओर तबाही का मंज़र

 सीधी – सादी आबादी,

 आँसू पीने की आदी है”

चमचासान की मुद्रा में बैठे, मौक़ा-परस्त चमचे नियमों को परास्त कर, लोकतंत्र के गाल पर तमाचा जड़ने में ज़रा भी नहीं हिचकते… आपको तो विदित है ही कि, “चमचा जिस बर्तन में रहता है, उसे खाली कर देता है… l “क्या कुछ ग़ायब नहीं हो जाता…?…

गोदाम से ग़ायब हुआ, अनाज देखिये,

‘राजेश’ इस वतन का उफ़ रिवाज देखिये…!

 

“चले केन्द्र से पूरे एक सौ

आते-आते पचपन ग़ायब

सावन ग़ायब, बचपन ग़ायब

मेल-जोल अपनापन ग़ायब”

किसी को रूखा-सूखा नसीब हुआ है, इसका तात्पर्य ही यही है कि कोई कथरी ओढ़कर घी चुपड़ी हथिया चुका है—

“जिनके हिस्से बारिश आई, सर से पाँव तर-बतर हुए

आम आदमी के हिस्से में केवल बूँदा-बाँदी है”

बाढ़ आकर तबाही मचाकर अलविदा हो जाती है… परन्तु ऐसे बहुतायत हैं, जिनकी आँखों में निश-दिन बाढ़ है, जिनका जीवन ही बारामासी आषाढ़ है…!

बाढ़ आई-गई, अपनी बला से!…तथाकथितों के सर कड़ाही में और पाँचों उँगलियाँ घी में सराबोर रहे! तभी तो इस व्यंग्यकार ने उवाचा है —

“चमचे पहले चाँदी के थे,

अब चमचों की चाँदी है”

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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