डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘असली नास्तिक की पहचान‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१४ ☆
☆ व्यंग्य ☆ असली नास्तिक की पहचान ☆
स्वर्ग-नरक के विशाल स्वागत-कक्ष में भारी भीड़ जुटी थी। तिल धरने को जगह नहीं थी। मृत्युलोक से पहुंची आत्माओं के रिकॉर्ड खंगालने में चित्रगुप्त जी के आठ दस असिस्टेंट लगे थे। रिकॉर्ड के आधार पर स्वर्ग और नरक के अलॉटमेंट की लिस्टें निकाली जा रही थीं। आत्माएं दम साधे अपने कर्मों का फैसला सुनने के लिए खड़ी थीं। कई पाप-कर्म वाले भी इस उम्मीद में थे कि शायद एकाध पुण्य-कर्म के बदौलत स्वर्ग की लिस्ट में नाम आ जाए।
लिस्टें लगीं तो हल्ला-गुल्ला बढ़ गया। स्वर्ग की लिस्ट में जगह पाने वाले खुशी से ‘चित्रगुप्त जी जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे तो नरक की लिस्ट में ढकेले गये विलाप करके उसे अन्याय और भेदभाव बता रहे थे।
हल्ला-गुल्ला सुनकर यमराज वहां घूमते हुए आ गये। चित्रगुप्त जी से हाल-चाल पूछा । चित्रगुप्त जी ने जवाब दिया, ‘सब काम ठीक चल रहा है, प्रभु, लेकिन ये दो-तीन आत्माएं बड़ी देर से बहस कर रही हैं। बार-बार पूछती हैं कि उनका नाम नरक की लिस्ट में कैसे रखा गया।’
यमराज ने पूछा, ‘इनके रिकॉर्ड में क्या है?’
चित्रगुप्त जी बोले, ‘ये घोर नास्तिक हैं। भगवान के अस्तित्व पर ही प्रश्न उठाते हैं। कभी मंदिर नहीं गये, कभी भगवान की पूजा नहीं की। कहते हैं भगवान के अस्तित्व का किसी ने कभी प्रमाण ही नहीं दिया। ‘मान लो’ ‘विश्वास करो’ कहने से काम नहीं चलता। इनका सवाल है कि बिना प्रमाण-सबूत के कैसे मान लें? अब बताइए इनको नरक में न भेजें तो क्या करें? एकदम ओपिन एंड शट केस है।
‘इनका यह भी कहना है कि वे नास्तिक नहीं, तर्कवादी हैं। असली नास्तिक वे हैं जो ऊपर से भगवान को मानने का ढोंग करते हैं, लेकिन भीतर से उन पर बिल्कुल विश्वास नहीं करते। जो भगवान का नाम जपते हैं, लेकिन धर्मस्थलों के दान-पात्रों से सारा चढ़ावा, बिना भगवान से डरे, गायब कर देते हैं। इनकी नज़र में नास्तिक वे नेता भी हैं जो जनता को दिखाने के लिए मंदिर में पूजा करते हैं, मंदिर बनवाते हैं, लेकिन जनता को मूर्ख बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जो दिन भर झूठ बोलते हैं, झूठे आश्वासन देते हैं। नास्तिक वे धर्मगुरु हैं जो धर्म को धंधा समझते हैं, जो भगवान पर भरोसा करने का उपदेश देते हैं लेकिन अपने साथ सशस्त्र सुरक्षाकर्मी लेकर चलते हैं। ये सब भगवान की मूर्ति को मिट्टी के पुतले से ज़्यादा कुछ नहीं समझते। इनकी नज़र में असली नास्तिक वे हैं जो भगवान का नाम लेकर हत्या और अपराध करते हैं।’
सयाने यमराज बोले, ‘ये लोग गलत नहीं कहते। शंका करने मात्र से कोई नास्तिक नहीं हो जाता। अगर कोई उनकी शंका का समाधान नहीं कर पाता तो उसमें उनका क्या दोष है? असली नास्तिक वही है जो ऊपर से ईश्वर को मानने का दिखावा करता है, लेकिन भीतर से नहीं मानता। यदि इन शंकालु लोगों ने कोई अन्य पाप नहीं किया, किसी को लूटा सताया नहीं, समाज का अहित नहीं किया, तो इन्हें नरक में भेजना उचित नहीं। इन्हें ऐसी जगह स्थान दिया जाए जहां इन्हें हमारी व्यवस्था को समझने का अवसर मिले और इनकी शंकाओं का समाधान हो। आगे से यह भी ध्यान रखें कि मुंह में राम और बगल में छुरी रखने वाले ढोंगी स्वर्ग में जगह न पा जाएं।’
चित्रगुप्त जी को ऐसी हिदायत देकर यमराज आगे बढ़ गये।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






