श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग- २४ ☆ श्री सुरेश पटवा
ऋषिकेश-हरिद्वार
सामान्यत: ऋषिकेश जाने के लिए लोग हरिद्वार से होकर जाते हैं। देहरादून से एक सीधा रास्ता भी हरिद्वार जाता है। मसूरी से भी ऋषिकेश जाना चाहें तो पहाड़ों से गुज़रते आप ऋषिकेश पहुँच सकते हैं। मसूरी से आप सीधे यमनोत्री भी जा सकते हैं। वापसी लौटते समय पौंथी से रास्ता बदल कर टेहरी गढ़वाल से गंगोत्री भी जा सकते हैं। वहाँ से वापस ऋषिकेश आकर रुद्रप्रयाग पहुँचिए। रुद्रप्रयाग से केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा की जा सकती है। इस तरह ऋषिकेश छोटे चार धाम का प्रवेश द्वार है। ऋषिकेश (संस्कृत : हृषीकेश) उत्तराखण्ड के देहरादून जिले का एक हिन्दू तीर्थस्थल है। यह गढ़वाल हिमालय का प्रवेश्द्वार है। ऋषिकेश, हरिद्वार से 25 किमी उत्तर में तथा देहरादून से 43 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित है।
ऋषिकेश
28 जुलाई 2021 को हम ग्यारह बजे के लगभग देहरादून से निकले। दाहिनी तरफ़ मैदान और बाईं तरफ़ हिमालय के पहाड़ बहुत सुंदर चित्रमय झांकी प्रस्तुत कर रहे थे। देहरादून से ऋषिकेश के रास्ते में एक स्थान थानो और भोगपुर गाँव के बीच एक पहाड़ी बड़ा झरना बरसाती पानी से बह रहा था। सामने से एक कार आती दिखी वह इस पार निकल आई। उसे निकलती देख हमारी टेक्सी के ड्रायवर मुबारक खान ने हमारी गाड़ी भी झरना पार करने को आगे बढ़ा दी। लेकिन हमारी तरफ़ पानी का बहाव तेज था। गाड़ी के आगे पानी का सैलाब बढ़ता गया और गाड़ी निकलने के पहले गाड़ी के चकों ने ज़मीन छोड़ दी और चके रेत में फ़्री घूमने लगे। गाड़ी में पानी भरने लगा। ड्राईवर को गाड़ी का एंजिन चालू रखने बोलकर तुरंत कार का दरवाज़ा खोलकर नीचे उतरना मुनासिब समझा क्योंकि कार के भीतर तेज़ी से पानी भरने लगा था। यदि आटोमेटिक लॉक बंद हो जाए और गाड़ी में पानी भरता रहे तो जान के लाले पड़ सकते थे। इसलिए कार का गेट खोलकर जैसे ही बाहर निकले कार के अंदर तेज़ी से पानी भर गया। सभी को बाहर निकालना पड़ा। सबने मिलकर खूब धक्के लगा कर गाड़ी निकालने की कोशिश की। राहगीरों की भीड़ लगने लगी। दो लड़के मोटर साईकिल से भोगपुर की तरफ़ जा रहे थे। उन्होंने आकर गाड़ी को धक्का देकर निकालने में मदद की। लेकिन गाड़ी हिली तक नहीं।
गाड़ी को धक्का लगाने के प्रयास में हमारा एक मोबाईल पानी में गिर गया। बहुत ढूँढा पर नहीं मिला। सब घबरा गए। बहुत कोशिश की गाड़ी नहीं निकली। दूसरे मोबाईल से उत्तराखंड राज्य के रेस्कू टीम को 112 पर खबर दी। इसके पहले उनकी टीम आए। आठ दस लोग आ गए। उनमें एक बड़ी बोलेरो लोडिंग गाड़ी भी थी। पास में ही जुगाड़ का तार मिल गया। कार को तार से बांध कर गाड़ी खींच कर बाहर निकाली। जान में जान आयी।
धक्का लगाने वालों में एक लड़के का नाम न्यूटन आस्टिन था। वह ईसाई प्रचारक था। उसे पानी में गिरे मोबाईल मिलने पर सूचना देने हेतु अपना नम्बर देकर हम ऋषिकेश की तरफ़ बढ़ गए। ऋषिकेश पहुँचने पर उसका संदेश आया कि हमारा मोबाईल मिल गया है। उसे लेने बीस किलोमीटर दूर उनके घर पहुँचना होगा। हम ऋषिकेश भ्रमण करके उनके घर पहुँचे। उन्होंने चाय नाश्ता कराया और हमारा मोबाईल हमें दिया। हमने उन्हें मिठाई के लिए पाँच सौ रुपए देकर उनसे बिदा ली। गाड़ी में पानी भरने से लग़ेज में रखे हमारे सारे कपड़े गीले हो गए। एक भी कपड़ा सूखा नहीं बचा।
ऋषिकेश हिमालय का प्रवेश द्वार है। जहाँ गंगा पर्वतमालाओं को पीछे छोड़ समतल धरातल की तरफ तेज़ी से आगे बढ़ती जाती है। ऋषिकेश का शान्त वातावरण कई विख्यात आश्रमों का घर है। उत्तराखण्ड में समुद्र तल से 1360 फीट की ऊँचाई पर स्थित ऋषिकेश भारत के पवित्र तीर्थस्थलों में एक है। हिमालय की निचली पहाड़ियों और प्राकृतिक सुन्दरता से घिरे इस धार्मिक स्थान से प्रवाहित गंगा नदी इसे अतुल्य बनाती है। ऋषिकेश को केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रवेशद्वार माना जाता है। हर साल यहाँ के आश्रमों में बड़ी संख्या में तीर्थयात्री ध्यान लगाने और मन की शान्ति के लिए आते हैं। विदेशी पर्यटक भी यहाँ आध्यात्मिक सुख की चाह में नियमित रूप से आते रहते हैं।
ऋषिकेश से सम्बन्धित अनेक धार्मिक कथाएँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि समुद्र मन्थन के दौरान निकला विष शिव ने इसी स्थान पर पिया था। विष पीने के बाद उनका गला नीला पड़ गया और उन्हें नीलकण्ठ के नाम से जाना गया। शिव ने केदार में गंगा को जटा में इसी स्थान पर ऋषि स्वरुप धारण कर केश से गंगा को हरिद्वार में अवतरित किया था। जहाँ गंगा ने विष्णु की चरण वंदना कर मैदान में प्रवेश किया था। एक अन्य अनुश्रुति के अनुसार भगवान राम ने वनवास के दौरान यहाँ के जंगलों में कुछ समय व्यतीत किया था। रस्सी से बना लक्ष्मण झूला इसका प्रमाण माना जाता है। विक्रमसंवत 1996 में लक्ष्मण झूले का पुनर्निर्माण किया गया। यह भी कहा जाता है कि ऋषि रैभ्य ने यहाँ ईश्वर के दर्शन के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान हृषीकेश के रूप में प्रकट हुए। तब से इस स्थान को ऋषिकेश नाम से जाना जाता है।
गंगा नदी के एक किनारे को दूसरे किनारे से जोड़ता लक्ष्मण झूला नगर की विशिष्ट पहचान है। इसे विक्रम सम्वत् 1996 में वर्तमान रूप दिया गया था। कहा जाता है कि गंगा नदी को पार करने के लिए लक्ष्मण ने इस स्थान पर जूट का झूला बनवाया था। झूले के बीच में पहुँचने पर वह हिलता हुआ प्रतीत होता है। 450 फीट लम्बे इस झूले के समीप ही लक्ष्मण और रघुनाथ मन्दिर हैं। झूले पर खड़े होकर आसपास के खूबसूरत नजारों का आनन्द लिया जा सकता है। लक्ष्मण झूला के समान राम झूला भी नजदीक ही स्थित है। यह झूला शिवानन्द और स्वर्ग आश्रम के बीच बना है। इसलिए इसे शिवानन्द झूला के नाम से भी जाना जाता है। ऋषिकेश मैं गंगाजी के किनारे की रेत बड़ी ही नर्म और मुलायम है, इस पर बैठने से यह माँ की गोद जैसी स्नेहमयी और ममतापूर्ण लगती है, यहाँ बैठकर दर्शन करने मात्र से असीम शान्ति और रामत्व का उदय होने लगता है। ऋषिकेश में स्नान करने का प्रमुख घाट है जहाँ प्रात: काल में अनेक श्रद्धालु पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं। इसी स्थान से गंगा नदी दायीं ओर मुड़ जाती है। गोधूलि वेला में यहाँ की नियमित पवित्र आरती का दृश्य अत्यन्त आकर्षक होता है।
स्वामी विशुद्धानन्द द्वारा स्थापित आश्रम ऋषिकेश का सबसे प्राचीन आश्रम है। स्वामी जी को ‘काली कमली वाले’ नाम से भी जाना जाता था। इस स्थान पर बहुत से सुन्दर मन्दिर बने हुए हैं। यहाँ खाने पीने के अनेक होटल हैं जहाँ केवल शाकाहारी भोजन ही परोसा जाता है। आश्रम के आसपास हस्तशिल्प के सामान की बहुत सी दुकानें हैं।
लगभग 5,500 फीट की ऊँचाई पर स्वर्ग आश्रम की पहाड़ी की चोटी पर नीलकण्ठ महादेव मन्दिर स्थित है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने इसी स्थान पर समुद्र मन्थन से निकला विष ग्रहण किया था। विषपान के बाद विष के प्रभाव से उनका गला नीला पड़ गया था और उन्हें नीलकण्ठ नाम से जाना गया था। मन्दिर परिसर में पानी का एक झरना है जहाँ भक्तगण दर्शन करने से पहले स्नान करते हैं।
भरत मंदिर ऋषिकेश का सबसे प्राचीन मन्दिर है जिसे आदि गुरू शंकराचार्य ने बनवाया था। भगवान राम के छोटे भाई भरत को समर्पित यह मन्दिर त्रिवेणी घाट के निकट ओल्ड टाउन में स्थित है। मन्दिर का मूल रूप 1398 में तैमूर आक्रमण के दौरान क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। हालाँकि मन्दिर की बहुत सी महत्वपूर्ण चीजों को उस हमले के बाद आज तक संरक्षित रखा गया है। मन्दिर के अन्दरूनी गर्भगृह में भगवान विष्णु की प्रतिमा एकल शालीग्राम पत्थर पर उकेरी गई है। आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा रखा गया श्रीयन्त्र भी यहाँ देखा जा सकता है।
लक्ष्मण झूले को पार करते ही कैलाश निकेतन मन्दिर है। 12 खण्डों में बना यह विशाल मंदिर ऋषिकेश के अन्य मन्दिरों से भिन्न है। इस मंदिर में सभी देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं।
ऋषिकेश से 22 किलोमीटर की दूरी पर 3,000 साल पुरानी वशिष्ठ गुफा बद्रीनाथ-केदारनाथ मार्ग पर स्थित है। इस स्थान पर बहुत से साधुओं विश्राम और ध्यान लगाए देखे जा सकते हैं। कहा जाता है यह स्थान भगवान राम और बहुत से राजाओं के पुरोहित वशिष्ठ का निवास स्थल था। वशिष्ठ गुफा में साधुओं को ध्यानमग्न मुद्रा में देखा जा सकता है। गुफा के भीतर एक शिवलिंग भी स्थापित है। यह जगह पर्यटन के लिये बहुत मशहूर है।
राम झूला पार करते ही गीता भवन है जिसे 2007 में श्री जयदयाल गोयन्दकाजी ने बनवाया था। यहां रामायण और महाभारत के चित्रों से सजी दीवारें इस स्थान को आकर्षण बनाती हैं। यहां एक आयुर्वेदिक डिस्पेन्सरी और गीताप्रेस गोरखपुर की एक शाखा भी है। प्रवचन और कीर्तन मन्दिर की नियमित क्रियाएँ हैं। शाम को यहां भक्ति संगीत का आनन्द लिया जा सकता है। तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए यहाँ सैकड़ों कमरे हैं।
ऋषिकेश से नीलकण्ठ मार्ग के बीच मोहनचट्टी स्थान आता है जिसका नाम है फूलचट्टी, यह स्थान बहुत ही शान्त वातावरण का है यहाँ चारो और सुन्दर वादियाँ है। नीलकण्ठ मार्ग पर मोहनचट्टी आकर्षण का केंद्र बनता है |
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान का अस्पताल परिसर 400 मीटर के दायरे में फैला है देखने योग्य भव्य ईमारत है, इसके कई भाग हैं-ट्रॉमा सेण्टर, Emergency आदि।
ऋषिकेश घूमकर आठ बजे रात को हरिद्वार लेवल होटल में रुके। होटल के चारों तरफ़ खाने-पीने की दुकानों का अम्बार लगा था लेकिन बाहर निकलने को कपड़े ही नहीं थे इसलिए होटल के ज़रूरत से ज़्यादा महँगे मीनू कार्ड से भिंडी मसाला और चपाती का सेवन कमरे में किया।
जब सामान खोल कर देखा तो सभी कपड़े और अन्य सामान पानी से तरबितर मिले। यह तय किया कि सभी कपड़ों की गीज़र के गर्म पानी में निथार कर सुखाए जाएँ। दस-बारह हैंगर मंगा कर उनमें कपड़े फँसाकर पंखे की हवा में सूखने डाले। कपड़ों से टपकता पानी देख श्रीमती जी ने एक लम्बी रस्सी ढूँढ निकाली उसे कमरे में आरपार बांधने की कोशिश दो घंटे होती रही लेकिन कपड़ों के वज़न से रस्सी टूट जाती थी। हारकर कपड़ों को यहाँ वहाँ फैलाया। सौम्या ने एक प्रेस करने वाली स्त्री मंगा ली। दूसरे दिन पहनने के लिए एक जींस और दो टॉप प्रेस से सुखा लिए। दो बजे रात तक यही सब चलता रहा।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





