श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “महाशिवरात्रि: अध्यात्म, आधुनिकता और प्रकृति से जुड़ाव…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २७७ ☆ महाशिवरात्रि: अध्यात्म, आधुनिकता और प्रकृति से जुड़ाव… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
☆ ॐ नमः शिवाय ☆
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भोले भंडारी भरें, भक्तों के भंडार ।
भस्म लगा धूनी रमा, कैलाशी सरकार ।।
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शिव सह गौरा सोहतीं, कार्तिकेय, गणराज ।
बाघम्बर धारण किए, बाजे डमरू साज ।।
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बम- बम भोले बोलिए, शिव शम्भू कैलाश।
सच्चे मन से प्रार्थना, रोके सभी विनाश।।
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शीष विराजे चंद्रमा, केशों गंगा धार ।
भस्म रमा धूनी सहित, गले सर्प का हार।।
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शिव शंकर जग मोहते, माॅं गौरा के साथ।
अपने भक्तों पर कृपा, करते दीना नाथ।।
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आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में युवा मन अक्सर बाहर की दुनिया में उलझा रहता है—कैरियर, स्क्रीन, प्रतिस्पर्धा और लगातार बदलती अपेक्षाएँ। ऐसे समय में महाशिवरात्रि हमें एक सरल लेकिन गहरा संदेश देती है: बाहर नहीं, भीतर लौटो। शिव किसी दूर बैठे देवता नहीं, बल्कि हमारे भीतर की स्थिरता, संतुलन और सजगता का नाम हैं।
अध्यात्म का अर्थ दुनिया से भागना नहीं, बल्कि दुनिया में रहते हुए भी अपने मन को स्पष्ट और शांत रखना है। यह बात आज की युवा पीढ़ी के लिए और भी ज़रूरी है। महाशिवरात्रि की रात हमें याद दिलाती है कि थोड़ी देर रुककर, मोबाइल की स्क्रीन से नज़र हटाकर, अपने भीतर झाँकना भी उतना ही ज़रूरी है जितना आगे बढ़ना।
शिव की पूजा में प्रयुक्त वस्तुएँ—बेलपत्र, धतूरा, भांग, फूल,फल, दूध, दही,घी, शहद, भस्म, धूप,दीप—सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़े रहने का सुंदर प्रतीक हैं। ये चीज़ें सरल हैं, सहज हैं और हमें “ग्रीन मोटिवेशन” देती हैं कि जीवन की मूल ज़रूरतें दिखावे में नहीं, सादगी में पूरी होती हैं। प्रकृति के साथ यह तालमेल ही असल में शिव का संदेश है—संतुलन, संयम और स्वीकार।
आज का युवा अगर शिव को इस रूप में समझे—एक आंतरिक शक्ति, एक स्थिर चेतना और प्रकृति से जुड़ा जीवन-दर्शन—तो महाशिवरात्रि सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर दिशा देने का अवसर बन सकती है। क्योंकि जब भीतर स्थिरता आती है, तभी बाहर की दुनिया भी सही मायनों में सँवरती है।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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