श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – सतपुड़ा वन भ्रमण – भाग- ३१ ☆ श्री सुरेश पटवा
6.सतपुड़ा वन भ्रमण
पाँच जनवरी को सुबह उठे तो मादीखो गेस्ट हाउस से ही तवा मालिनी केसला संगम एक बड़े तालाब सा दिख रहा था। उसका आनंद ले रहे थे तभी चौकीदार ने बताया कि एक आदमी इसी जगह रहेगा और दो आदमी नाव से उस तरफ़ जाकर वहाँ की गणना में शामिल होंगे। एक साथी श्रीकृष्ण मादीखो ट्रेल पर सुबह छः बजे निकल गए। बाक़ी दो लोगों को एक नाव में बैठकर संगम पार जाना पड़ा। वे जब तक मोटर बोट से दूसरी तरफ़ पहुँचते तब तक वहाँ के चौकीदार और वन सेवक गणना पर निकल चुके थे। जंगल में अकेले जाने की मनाही है। वहाँ एक बहुत अच्छा साकोट रेस्ट हाउस है। साकोट नामक गाँव विस्थापित होकर पहचान खो चुका है। उसके कोई भी चिन्ह नहीं दिखते। विद्वान कहते हैं नाम में क्या रखा है, यहाँ तो सिर्फ़ नाम ही बचा है, अस्तित्व लोप हो गया। जो भी कुछ है नाम में ही बचा है। इसलिए अच्छे कर्म करो, हो सकता है तुम्हारे लोप होने के बाद कुछ दिन नाम रह जाये। हमने उसी साकोट रेस्ट हाउस में डेरा जमाया। संगम आर-पार जाने हेतु एक मोटर बोट उपलब्ध है। मदन यादव उसके परिचालक हैं। उन्होंने बिना दूध की लेमन चाय पिलाई। उनसे आज का भोजन बनाने की बात करके साथ लाया सामान की एक बोरी उनके सुपुर्द कर दी।
गेस्ट हाउस बहुत ही मनमोहक लुभावनी पहाड़ी पर बना है। सामने खुला मैदान है। मैदान समाप्त होते ही तवा नदी का भराव लहरें मार कर तटों को छेड़ता रहता है। चारों तरफ़ से खुला है। सामने की तरफ़ ऊँची बालकनी जैसी जगह है जहाँ से एक सौ अस्सी डिग्री गर्दन घुमाकर नज़रों से झिलमिल जलराशि पर खेलती सूर्य किरणों को देख कर मन प्रसन्न हो जाता है।
पहाड़ अभी कुछ-कुछ उदास से दिख रहे हैं। जीव जंतुओं की स्थिति भी उनके जैसी ही लग रही है। रात भर ठंड में ठिठुरे जीव-जंतु सूरज निकलने का इंतज़ार कर रहे हैं ताकि धूप में तपकर बदन में रात की ठंड से निपटने के लिए गर्मी संजो कर रख सकें। पहाड़, पेड़-पौधे, जीव-जंतु और पक्षी-पखेरू बारिश के मौसम में खिले रहते हैं। उनका उत्साह वसंत से आरम्भ होता है जो कि शरद ऋतु तक शबाब पर रहता है। सूर्य की किरणें अब समुंदर से भरे तवा जलभराव पर पसरने लगी हैं। हिंसक पशु भी रात के शिकार के बाद गहराइयाँ तलाश रहे हैं। तभी शाकाहारी जीव-जंतु खुली हवा और धूप का आनंद उठाने निकल आए हैं। लंगूरों का एक दल बेचैनी से उछलकूद कर रहा है। उसे कुछ अजीब सी गंध या चीज़ नज़र आ रही है। उनकी हरकत पर पक्षी भी सचेत होकर आवाज़ें निकाल रहे हैं।
वन सेवक ने एक शेर के पैरों के निशान देखे हैं जो अभी-अभी वहाँ से गुजरा है। एप खोलकर उनके फ़ोटो लिए और दर्ज कर लिए। सभी जानकारियों को एप में दर्ज करना है। गणना ऑनलाइन हो रही है। पहले एप में राज्य चुने, फिर अभयारण्य, फिर क्षेत्र के साथ बीट का चयन करें। उसके बाद वन सेवक और वालेंटियर्स के फ़ोटो उतार कर दर्ज करें। उसके बाद गणना के सबूत दर्ज करते जाएँ।
जीव पैदाइशी रूप से मांसाहारी या शाकाहारी हैं। हाँ कुछ आदमियों की तरह दोनों तरह के होते हैं। जंगल में सबके लिए सब कुछ है। भूख के अलावा किसी अन्य चीज़ के लिए लड़ाई नहीं होती। इसलिए थाने-पुलिस, अदालत-वकालत, जिरह-निर्णय वग़ैरह कुछ नहीं होता। जब भूख लगी तब जंगल से निकाल कर खा लिया। समेटने या सहेजने की ज़रूरत नहीं होती है। सब कुछ साझा है। स्वामित्व का बोध ही नहीं है। इसलिए संग्रह नहीं तो बैंक नहीं, विनियोग नहीं, प्रॉपर्टी नहीं और उनके लिए गुणा-भाग नहीं। जंगली जीवों का दिमाग़ भूख, सृजन और सुरक्षा तक ही चलता है इसलिए अध्यात्म और ईश्वर भी उनके लिए उपयोगी विचार नहीं होता। वे साथियों को मरते देख कर अन्दाज़ लगाते हैं कि उन्हें भी मरना होगा। वे मोक्ष के बारे में भी नहीं सोचते। पाप-पुण्य निर्वाण-मोक्ष उनके दिमाग़ में ही नहीं आते। उनमें धर्म नहीं है तो धार्मिक भेद भी नहीं है, इसलिए जानवरों के सोचने में नहीं आता कि किसकी कितनी जनसंख्या बढ़ या घट रही है। वे एक दूसरे को धर्म बदलने को मजबूर भी नहीं करते। शेर कभी हिरण से नहीं कहता कि वह शेर बन जाये। सब अपने चोले में मस्त रहते हैं। शेर कभी नहीं कहता कि बंदर उसे आरक्षण की दारू के बदले वोट दे। हिरणों के लिए चारा भी राशन से नहीं मिलता। जंगल धूप छाँव पानी सभी पर साम्यवादी साझा हक़ है। कहते हैं आदमी भी पहले ऐसे ही पशु थे। उन्होंने सामाजिक पशु के रूप में विकास करके बहुत सी झंझटें मोल ले लीं हैं।
साकोट रेस्ट हाउस तीन तरफ़ तवा बाँध से थमे डूब क्षेत्र से घिरा है। नहा धो कर ध्यान में बैठे तो ऊँचाई पर निर्मित रेस्ट हाउस से ऐसा लगा जैसे बीच समुद्र में धुनी रमाए बैठे हैं। ग्यारह बजे के क़रीब दो टिक्क याने मोटी रोटी, कनकी और तुअर दाल का भोजन करके आराम किया। पता चला कि साकोट से चूरना गेस्ट हाउस की दूरी मात्र 14 किलोमीटर है जबकि भौंरा से अस्सी किलोमीटर दूरी पर चूरना स्थित है। लेकिन वन विभाग की अनुमति के बग़ैर कोई भी इस रास्ते से तवा डूब क्षेत्र को पार करके चूरना नहीं जा सकता। उस हिसाब से यदि बाघ गणना प्रोजेक्ट में शामिल न होते तो कभी भी इस अविस्मरणीय अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य के दर्शन नहीं कर सकते थे। शाम को रेस्ट हाउस की छत पर सुहावने मौसम का मज़ा लेने गए तो लहरों से पता चला कि हवा का रुख़ उत्तर से दक्षिण की तरफ़ है। जबकि गर्मियों और बारिश में हवा दक्षिण से बादलों को लेकर उत्तर की तरफ़ चलती है।
छः जनवरी सुबह पाँच बजे नियमत: जाग गये। आज जंगल के उस इलाक़े में जाना था जहाँ शेरों की सर्वाधिक आबादी है। एक अनुमान के अनुसार चालीस शेर इस जंगल में होंगे। सेवक चौकीदार मदन यादव ने बताया कि एक महीना पहले एक शेर रेंजर साहिब की जिप्सी पर लपका और उनका पीछा किया था। सब घबरा गए थे। हमको थोड़ी घबराहट हुई और जिम कार्बेट की “जंगल की कहानी” (Jungle Lore) पुस्तक की सावधानियाँ याद आने लगीं।
- पहली-बात तो घबराना नहीं है। उसके लिए साँस पर ध्यान केंद्रित करके गिनती गिनना शुरू कर दो।
- दूसरा- एक तो शेर आपके सामने नहीं आता। उसकी स्मृति में भी शिकारी नुमा आदमियों का डर रहता है।
- तीसरा-यदि शेर दिख जाए तो आप पेड़ की आड़ में हो जायें। उसे निकल जाने दें।
- चौथा-यदि शेर से अचानक सामना हो जाए तो एक बाजु हटकर उसे निकल जाने दें।
- पाँचवाँ- भागें नहीं, हल्ला न मचाएँ, लेट जायें।
आज सबसे ख़तरनाक इलाक़े में शेरों की गिनती का कार्यक्रम था। इसलिए तीन वन कर्मी ईश्वर दास यादव वल्द रामनाथ यादव, साकिन नया खखरापुरा इटारसी स्थायी कर्मी (9399004517), संग्राम सिंह ठाकुर (कोरकु) वल्द मुंशी लाल साकिन टेकापार मढ़ई, सुरक्षा श्रमिक (6265940126) और कमल सिंह ककोड़िया (गोंड) वल्द बालचंद साकिन नया साकोट सेमरी हरचंद, मोटरबोट चालक (9165085944) सुबह छः बजे मुस्तैद मिले। हम भी बख्तर बंद होकर मुहिम पर उनके साथ निकल पड़े।
कमल सिंह ने हमें एक अपने क़द से ऊँची लाठी पकड़ा दी। उन्होंने बताया कि कोई भी जंगली जानवर अपनी ऊँचाई से ऊँची चीज़ से डरता है। इसीलिए लाठी ऊँची हो तो वह पास नहीं आता। दूसरा लाठी थोड़ी बन्दूक़ सी दिखती है। जानवर बन्दूक़ से डरता है। उसके दिमाग़ में पीढ़ी दर पीढ़ी बन्दूक़ की छवि है। जानवरों में भी सुरक्षात्मक श्रुति-स्मृति शास्त्र संग्रहित हैं।
ईश्वर यादव हमारे साथ चल रहे थे। अचानक एक शेर के पंजे का निशान मिला। उन्होंने बारिकियाँ बताईं कि यह बूढ़े शेर के पंजे का निशान है। इसे कैमरे में क़ैद कर लो। संग्राम सिंह के पास एप मोबाईल था। उन्होंने फ़ोटो खींच कर संरक्षित कर लिया। हमने पूछा अब अगला निशान भी उसी शेर का हो सकता है। आप कैसे पहचानोगे कि वह अलग शेर है। उन्होंने पहले नर और मादा के पंजों के निशान में भेद बताया। नर शेर के पंजे की उँगलियाँ गद्दी से जुड़ी रहती हैं जबकि मादा शेरनी की उँगलियाँ औरतों की लम्बी बातों की तरह लम्बी होती हैं। उम्र के अनुसार जानवर का पंजा छोटा-बड़ा या पसरता जाता है। बूढ़े शेर का पंजा फैल जाता है। बच्चे का पंजा छोटा और उँगलियाँ सटी होती हैं। आगे चीता और भालू के पंजों के निशान मिले। तीन किलोमीटर चलने के बाद दाहिनी तरफ़ मुड़े तो सामने तवा नदी दिखी। अब उसी के किनारे-किनारे वापस गेस्ट हाउस पहुँचना था। बहुत ही ऊबड़-खाबड़ पथरीली ज़मीन पर ट्रैकिंग करना पड़ा।
हमारे साथ जो तीन लोग चल रहे थे। वे सभी सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व को स्थापित करने में विस्थापित परिवारों से हैं। विस्थापन दो तरह का वरदान लेकर आया है। एक तो कोर क्षेत्र से गाँवों का विस्थापन इटारसी और होशंगाबाद शहरों के आसपास हुआ है इसलिए उनके बच्चों को शिक्षा और स्वास्थ्य की उत्तम सुविधाएँ मिली हैं। उनको टाइगर रिज़र्व में रोज़गार मिले हैं। दूसरी ओर सतपुड़ा में जंगली जानवरों की संख्याओं में बढ़ोतरी होने से वन स्वयं शासित हुए। अब वहाँ शिकार और लकड़ी चोरी की वारदातें नहीं के बराबर होती हैं। लेकिन रेत और मत्स्य आखेट की मिलीभगत या अन्यथा चोरी में कोई कमी न होकर बढ़ोतरी ही हुई है।
जंगल में प्रत्येक जीव-जंतु आपको आदिम जीवन के मूलभूत सिद्धांत “भूख-भोजन, थकान-आराम, निद्रा और सृजन धर्म” का पालन करते दिखेगा। जंगल के वातावरण को भूख नियोजित करती है। एक ही नियम दृष्टिगोचर होता है कि ताकतवर कमजोर को खा जाता है। वहाँ इस सिद्धांत के अलावा न कोई नियम है, न विधान, न साहित्य, न संस्कृति, न रसिक के मन को मथते रस-छंद-अलंकार, न मिलते पुरस्कार और न अन्य किसी प्रकार की चिंता, न कोई तनाव। आप सतपुड़ा के मनमोहक जंगल में एक खूबसूरत सफारी शुरू कर रहे हैं। वन्यजीव उत्साही लोगों के साथ एक दुर्लभ यात्रा आपके पास रहस्यों से भरे एक सम्पूर्ण वन्य जीव पार्क में दिन बिताने का शानदार अवसर है।
यह इलाक़ा पहले बाघों के लिए नहीं जाना जाता था, हालांकि अब जंगल के इस विस्तृत विस्तार में एक पूरा बाघ निवास है। टाईगर रिजर्व के अन्य हिस्सों में आप सामान्य रूप से जो देखते हैं, यह उससे बिल्कुल अलग प्रकार का जंगल है। यहां जो कुछ भी रेंगता, उड़ता, घूमता या लुढ़कता है वह सब यहीं फलता-फूलता है और यही ख़त्म होकर भी कभी ख़त्म नहीं होता। यही प्रथम कृति याने प्रकृति है। यह स्थान जीवन से भरपूर है। पूरे जंगल में सैकड़ों जलधाराएँ बहती हैं। जो जंगल के पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों को पोषित करती हैं। यह जंगल हमेशा अलौकिक सौंदर्य का ख़ज़ाना है, वन्य पशुओं के विचरण के मनोहारी दृश्य, झरनों का कल-कल निनाद, पक्षियों का कलरव और बहुत सारी कभी न भूलने वाली स्मृतियों के अलावा यहाँ से आप कुछ निकाल कर ले जा नहीं सकते। ये संरक्षित जंगल हैं। शेर से लेकर ख़रगोश तक सब सुरक्षित हैं, बस भूख भर न लगी हो या उनके जीवन पर संकट न हो, नहीं तो आप सुरक्षित नहीं हैं। जंगली कुत्ते बहुत ख़तरनाक हैं, वे झुंड में रहते हैं और जंगल का राजा शेर भी उनकी एकता से ख़ौफ़ खाता है। इनकी नज़रों का बहाशियाना अन्दाज़ आपकी रीढ़ की हड्डी में झुरझुरी पैदा कर सकता है। फन फैलाए कोबरा और डंक पर डेरा उठाए बिच्छू कभी भी कहीं से रेंगते दिख सकते हैं।
यह अनुभव अपने आप में विस्मयकारी है। हरे-भरे जंगल में घास के मैदानों का विशाल विस्तार बाघों के देश में इस यात्रा को एक रोमांचक अनुभव बनाता है। सतपुड़ा के घने जंगल में शानदार बाघ, चालाक तेंदुआ, सुस्त भालू, भारी भरकम गौर और विशालकाय गिलहरी इस रमणीय दुनिया में सभी खुलेआम घूमते हैं। यह जंगल हमेशा शानदार जीवों की बपौती नहीं है। सतपुड़ा सैकड़ों तितलियों का भी घर है और एक सुंदर रेतीले पानी की धारा पर तितली को देखा जा सकता है। वही जल धारा पक्षियों और विशाल गिलहरियों की एक अद्भुत आबादी को जीवन देती है, इसलिए पेड़ की छतरियों को भी देखते चलें। लंगूर आपको कौतूहल से निहार रहे हैं कि ये हमारे बिगड़े स्वरुप कहाँ से आ गये।
जंगल का आनंद लेने के लिए आपको जंगली होने की कोई ज़रूरत नहीं है, उल्टा आपको रहमदिल होना चाहिए। घने जंगल में वन विभाग के स्थायी और अस्थायी कर्मचारी बिना परिवार के मोटी टिक्क रोटियों और पतली दाल के साथ एक उदास ज़िंदगी बिताते हैं। स्थायी वन पाल कर्मचारियों की तनख़्वाह तो फिर भी 25,000-30,000 रुपयों के बीच होती है परंतु कच्चे कर्मचारियों को कमीशन कटपिटकर महीने के 8,000 के आसपास मिलते हैं। हाँ पक्के होने के इंतज़ार में बेगारी और बेचारी उनके जीवन से जुड़ी नज़र आती हैं।
पहले तो वे बिचारे कुछ और भी कामधाम करके अलग से कमाई का जुगाड़ कर लेते थे परंतु आजकल जीपीएस से ट्रैकिंग के कारण उन्हें तैनाती स्थल पर ही रहना होता है। आज से 160 साल पहले इन जंगलों पर देवगढ़ (छिन्दवाड़ा) गोंड रियासत में एक कोरकु मालगुज़ार भभूत सिंह का एकक्षत्र राज्य था। वह राजा नहीं था परंतु किवदंतियाँ में वह आज भी राजा माना जाता है। किसी की अहमियत इस बात से नहीं आंकी जाती कि वह किस पद पर है। बल्कि इस बात से आंकी जाती है कि लोगों के दिल में उसका क्या जज़्बा है। जैसे अकबर इतिहास का महान बादशाह माना जाता है जबकि भारतियों के दिलों में जो सम्मान राणा प्रताप को प्राप्त है, आज अकबर उसका पासंग भी नहीं ठहरता। जन भावना पद को नहीं सिरजती, स्वाभिमानी को दिल में सजाती-बसाती है। हम तीन दिवसीय वन भ्रमण उपरांत थके शरीर परंतु प्रफुल्लित मन से भोपाल लौट आए।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





