श्री श्याम खापर्डे
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जिंदगी दुश्वार हो गई है…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६२ ☆
☆ # “जिंदगी दुश्वार हो गई है…” # ☆
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जिंदगी कितनी दुश्वार हो गई है
झूठ ही झूठ है यहां
सच की तो हार हो गई है
जो सपने दिखाए जाते हैं
वह हमको बहुत भाते हैं
वह कभी पूरे नहीं हो पाते हैं
उम्मीदें ना उम्मीदों में बदल
पेचदार हो गई हैं
जिंदगी कितनी दुश्वार हो गई है
सूनी आंखें आसमान में तकती है
ऊपर वाले से कितनी आशाएं रखती है
चोट खाकर भी नहीं थकती है
यह परंपरा अब हर बार हो गई है
जिंदगी कितनी दुश्वार हो गई है
आम आदमी अब करें तो क्या करें
किसका भरोसा या एतबार करें
कब तक अच्छे दिनों का इंतजार करें
टूटती आकांक्षाएं, चाहत की भरमार हो गई है
जिंदगी कितनी दुश्वार हो गई है
जनमानस का सब्र छूटता जा रहा है
हर पल हर घड़ी वो लुटता जा रहा है
कशमकश में उसका दम घुटता जा रहा है
विद्रोह की छुरी अब धारदार हो गई है
जिंदगी कितनी दुश्वार हो गई है
झूठ ही झूठ है यहां
सच की तो हार हो गई है /
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© श्याम खापर्डे
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