श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २१९ – गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम… ☆
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गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम।
आजादी की जली मशालें,गाया वंदेमातरम।।
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बंकिमचंद्र चटर्जी जी ने, लिखी वंदना राष्ट्र की।
गाया हम सबने मिल करके, मंत्रित वंदेमातरम।।
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हमने जननी जन्म भूमि को, माँ का दर्जा दिया सदा।
मातृभूमि की बलिवेदी में, वंदित वंदेमातरम।।
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उत्तर पूरब पश्चिम दक्षिण, दश दिशाओं को भाया।
भाषा की टूटी दीवारें, गूँजा वंदेमातरम।।
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धर्म कहाँ तब आड़े आया, दिल को आजादी भाई।
मिल कर गाया एक स्वरों में , सबने वंदेमातरम।।
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सुदृढ़ अब अर्थ व्यवस्था, देश प्रगति करता यारो।
विश्व अग्रणी बने देश यह, गाएँ वंदेमातरम।।
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© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
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